सावन की फुहार: – मुकेश कुमार (अनजान लेखक)

बारिश तो वैसे भी हो ही जाती है, सावन से पहले भी और बाद में भी। लेकिन सावन की बरशात की बात ही कुछ अलग होती है। पता भी नही चलता और बारिश शुरु, कभी-कभी तो दिन भर बारिश होती है। कुछ देर मुसलाधार बारिश के बाद हल्की सी फुहार शुरु हो जाती है जो पुरा दिन या पुरी रात चलती है। ऐसे मौसम में बिमार भी लोग बहुत पड़ते हैं, लेकिन इसके बिपरित होते हैं कुछ लोग जो ऐसे फुहारों का जम कर मज़ा लेते हैं।

बिंध्या ऑफ़िस से आते-आते लगभग भीग ही चूकी थी, पहले तो सोचा की गाड़ी से जाने पर भीगुँगी नही, लेकिन गाड़ी से उतर कर सरकारी बंगले तक पहुँचते भीग गई।

कपड़े बदल कर लॉन में रखी कुर्सी पर बैठ गई, तब तक काका अदरक वाली चाय ले आए। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बारिश की फुहारों को देखने लगी और पुरानी यादों में खो गई:

योगेश थोडी देर और रुको ना।

स्कूटर स्टार्ट करते हुए पुछा था… क्यों?

बारिश पुरी तरह ख़त्म हो जाने दो ना।

योगेश पहले तो शरारत भरी मुस्कान से देखा और बोला:

ज़ालिम, भीग कर तो देखो मेरे साथ।

उस से क्या हो जाएगा?


बिंध्या ग़ुस्से में बड़बड़ाते हुए स्कूटर पर बैठी थी, आधे रास्ते तक बड़बड़ाती ही रही।

योगेश नें बिंध्या के भीगे कमर पर अपना एक हाथ फिरा दिया था, बिंध्या अचकचा कर रह गई थी, सँभलने के बाद योगेश के गर्दन पर हल्के से दाँत गड़ाते हुए बोली:

कहीं भी शुरु हो जाते हो, कोई देख लेगा तो?

तो क्या? मैं कौन सा किसी ग़ैर को छु रहा हुँ, पत्नी हो तुम मेरी।

इस बार बिंध्या के हाथेली को कस के पकड़ लिया था… उसकी हथेली की गर्मी बारिश में भी पता चल रही थी। बिंध्या  अपनी साड़ी ठिक से लपेटते हुए योगेश के और भी करिब बैठ गई… बारिश की फुहार और बिंध्या के शरीर से महसूस होती गर्मी योगेश को मतवाला बना रही थी।

योगेश क्लेक्टर की परिक्षा हम दोनों ने पास कर ली, कल ही ट्रेनिंग के लिए निकलना है, तुमसे दूरी कैसे बर्दाश्त कर पाऊँगी?

बिंध्या मैं भी वही सोच रहा था।

लेकिन यहि तो हमारा सपना था न योगेश?

हाँ, सपना तो पुरा हो गया, अब आगे देखते हैं… कुछ न कुछ तो उपाय निकाल ही लेंगे।

लेकिन छ: महिने की ट्रेनिंग और उसके बाद छ: महिने और तब जा कर हमलोग साथ रह पाएँगे।

हाँ बिंध्या, ये बात तो है।


बातों ही बातों में बिंध्या ने योगेश के कमर को अपने हाथ से घेर लिया।

अरे, गिराओगी क्या, थोड़ा काबु रखो, घर आने में ज्यादा देर नही है।

इस बार बिंध्या ने शरारत में योगेश के कान को हल्के दाँत से काट लिया।

बिंध्या और योगेश दोनों ही प्राइवेट कंपनी में काम करते थे, वहिं दोनों को प्यार हुआ और घरवालों को मना कर शादी कर ली। लेकिन दोनों का सपना बड़ा था इसलिए वैवाहिक जीवन त्याग कर दोनों ने जी तोड़ मेहनत की और क्लेक्टर की परीक्षा पास कर ली।

अब वैवाहिक जीवन जीने के लिए और त्याग करने की जरुरत नही बची थी।

प्यार और शरारत के रंग में रंगे दोनों को पता भी नही चला और घर की गली आ गई। मकान मालीक ने स्कूटर रखने के लिए जगह थोडी दुर दी थी… स्कूटर पार्क करने के बाद योगेश बिंध्या को कंधे से सटा कर सिढियों तक लाया, इधर-उधर देखा फिर बिंध्या को गोद में उठा कर सिढियों से होता कमरे तक लाया।

दरवाजा बंद करते ही दोनों एक रंग में रंग गए, शादी के बाद पहली बार दोनों ने जी भर कर एक-दूसरे को प्यार किया। योगेश मदहोशी में सोया रहा और बिंध्या मिठे दर्द से उठ कर खाना बनाने चली गई। रात को खाना खाने के बाद दोनों ऐसे सोए की कुछ होश ही नहीं रहा। घड़ी के अलार्म से दोनों की निंद टूटी… जल्दी से दोनों नें नहा-धो कर बैग पैक किया।

निकलते हुए बिंध्या उलझे बिस्तर को ठिक करने की कोशीश करने लगी।

योगेश नें आग़ोश में लेते हुए कहा: इसे ऐसे ही रहने दो वापस आएँगे तो यादें बन कर दिखेंगी।

दोनों की ट्रेनिंग पुरी होने के बाद पाँच महिने गुज़र चुके थे… इस सावन फिर से दोनों मिलेंगे और साथ रहेंगे ये सोच कर बिंध्या मुस्कुराने लगी।


तभी काका आ कर बोले:

मैम साहब सावन का पहला दिन है, पनीर के पकौड़े तल दुँ?

नहीं काका, अब तो पकौड़े साहब के साथ ही खाऊँगी।

मुकेश कुमार (अनजान लेखक)

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