” ये क्या शुभम!! तुमने कहा था शादी के बाद हम विदेश घूमने जाएंगे…. लेकिन ये मनाली की टिकट…. !!!!! तुम्हें पता है मेरे भईया – भाभी अपनी शादी के बाद स्विट्जरलैंड गए थे…. और मेरी फ्रैंड भी अपने हनीमून पर आस्ट्रेलिया गई थी । सब मेरे बारे में क्या सोचेंगे….?? ,, पिहू नाराज होते हुए बोली।
” पिहू, अभी शादी में भी काफी खर्च हो गया है …. अभी मेरा इतना बजट नहीं की हम विदेश जा सकें। लेकिन मैं वादा करता हूं कि जल्दी ही हम विदेश भी घूमने जाएंगे …. ,, शुभम ने अपनी नई नवेली पत्नी को मनाते हुए कहा।
बहुत मुश्किल से पिहू मनाली जाने के लिए राजी हुई। एक हफ्ते बाद दोनों वापस घर आ गए।
पिहू के ससुराल में उसकी सास, दो ननदें और वो दोनों पति पत्नी थे। छोटा सा मध्यमवर्गीय परिवार था । शुभम अकेला कमाने वाला था लेकिन परिवार में किसी चीज की कमी महसूस नहीं होती थी क्योंकि सब एक दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखते थे।
पिहू एक सम्पन्न परिवार की बेटी थी। वो और शुभम एक दूसरे को पसंद करते थे। जब पिहू ने अपने परिवार वालों को शुभम के बारे में बताया तो वैसे तो उन्हें कोई एतराज़ नहीं था क्योंकि शुभम एक नेक और ईमानदार लड़का था। लेकिन उन्होंने पिहू को समझाने की कोशिश जरूर की थी कि शुभम की छोटी सी तनख्वाह में गुजारा कैसे करोगी ??”
लेकिन पिहू उस समय कुछ सुनना नहीं चाहती थी। प्यार की खुमारी में उसे उस वक्त हैसियत और स्टेटस नजर नहीं आ रहा था।
ससुराल में पिहू के दिन तो गुजर रहे थे लेकिन हर चीज में वो अपने ससुराल की तुलना अपने मायके से करती रहती थी। कभी खाने की वैरायटी पर बहस करती तो कभी घर की सुख सुविधाओं पर सवाल करने लगती। बात बात पर वो रूठ कर अपने मायके चली जाती थी या मायके वालों के सामने अपनी मांग रख देती थी।
गर्मी आते ही पिहू को अपने ए. सी . वाले कमरे की याद आने लगी ,” शुभम, मुझे गर्मी में रहने की आदत नहीं है…. मेरे मायके में तो हर जगह ए. सी. लगे हैं ….। ,,
शुभम का अभी बजट नहीं था फिर भी पिहू के लिए उसने कमरे में ए सी लगवा दिया। क्योंकि उसे डर था कि कहीं पिहू अपने मायके वालों से ए सी भी ना मांग ले …. शुभम एक स्वाभिमानी व्यक्ति था और उसे इस तरह पिहू का अपने मायके से चीजें लेना पसंद नहीं आता था।
अगले महीने पिहू का जन्मदिन था और वो बहुत उत्साहित थी। सुबह उसकी सास ने बहू बेटे के साथ आरती की और पिहू को जन्मदिन की बधाई दी। पिहू सोच रही थी कि उसके मायके की तरह यहां भी उसके जन्मदिन पर बहुत बड़ी पार्टी होगी लेकिन शाम को शुभम उसे सिर्फ डिनर पर लेकर चला गया तो पिहू का गुस्सा फूट पड़ा ,” शुभम… तुमने तो मेरा सारा मूड ही खराब कर दिया। पता है मेरे पापा मेरे जन्मदिन पर कितनी बड़ी पार्टी रखते थे!! मैं जो मांगती थी मुझे गिफ्ट में मिल जाता था। लेकिन यहां तो किसी को मेरी कोई कद्र ही नहीं है । मैं जा रही हूं अपने मायके … ।,,
कहते हुए वो अटैची मैं कपड़े डालने लगी तो उसकी सास ने समझाते हुए कहा, ” बहू.… अब ये तुम्हारा घर है…… लड़की को अपने ससुराल में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। अपने पति की जेब देखकर उसका साथ देना पत्नी का कर्तव्य होता है। मानते हैं तुम्हारे मायके की तुलना में यहां तुम्हें सुख सुविधा कम मिलती है लेकिन हम सब तुमसे बहुत प्यार करते हैं बेटा…. शादी के बाद मायके में बेटियां मेहमान होती हैं …. इस तरह छोटी- छोटी बातों पर मायके जाना अच्छी बात नहीं है। ,,
” मम्मी जी, जब से इस घर में आई हूं एडजस्ट ही तो कर रही हूं … अपने मायके के सारे ऐशो- आराम छोड़कर यहां आई थी लेकिन यहां किसी को मेरी कोई परवाह ही नहीं है। ,,
शुभम ने भी पिहू को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो समझने को तैयार ही नहीं थी।
मायके गए हुए पिहू को पंद्रह दिन हो गए थे। इस बार शुभम भी उसे मनाने नहीं गया। पिहू की मां भी बेटी की ज़िद से परेशान थी लेकिन उसे जाने को कैसे कहती … लेकिन पिहू की भाभी को पिहू का इस तरह मायके में धरना देना सुहाता नहीं था।
पिहू इन सब से बेखबर पहले की तरह ही मायके पर अपना अधिकार समझती थी।
एक दिन जब वो अपनी भाभी को खाना परोसने के लिए बोलने उसके कमरे की तरफ जा रही थी तो अचानक से फोन पर भाभी की बात सुनकर ठिठक गई।
उसकी भाभी अपनी मां से बातें कर रही थी, ” मां, मेरी ननद तो यहां आकर ही बैठ गई है… जाने का नाम भी नहीं लेती। हर चीज में टांग अड़ाती रहती है। मेरा तो जीना दुभर कर दिया है …. जब से शादी हुई है तब से हर रोज कोई ना कोई फरमाइश रख देती है …. उसे तो अपने पति की इज्जत का भी ख्याल नहीं है। अरे , अब हम कब तक उसकी जरूरतें पूरी करते रहेंगे?? आखिर मायके पर भी एक हद तक ही अधिकार जताया जाता है….. लेकिन उसने तो कभी ससुराल को अपनाया ही नहीं। ऐसा ही था तो शादी ही क्यों की थी उस मिडिल क्लास लड़के से!!! ,,
पिहू के कदम वहीं जड़ हो गए थे। गला सूखने लगा था और आंखे बरस पड़ी थीं। दिमाग में अपनी सास की कही बातें गूंज रही थीं…. सासु मां की ठीक ही कह रही थीं….. अब ससुराल ही मेरा घर है। जिस मायके पर मैं पहले की तरह अपना अधिकार समझती थी वो अधिकार तो कब का खत्म हो गया। मायके में भी तभी इज्जत मिलती है जब हम
अपने ससुराल वालों की इज्जत करते हैं। सच में शादी के बाद बेटियां मेहमान बन जाती हैं….. गलती तो मेरी ही थी कि मैंने कभी वास्तविकता को स्वीकारा ही नहीं…. नहीं मैं अपना और अपने पति का अपमान नहीं होने दूंगी। मेरा ससुराल चाहे जैसा भी हो लेकिन वहां मैं हक से तो रहती हूं …. ,,
उसी दिन पिहू ने शुभम को फोन किया, ” शुभम, मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है , मुझे यहां से अपने घर ले चलो … ,,
ये सुनते ही शुभम का चेहरा खिल उठा…. वो बहुत खुश था आखिर अब सही मायने में उसका घर बसने वाला था …..
दोस्तों, कई घरों में ऐसा होता है कि बहुएं अपने ससुराल की तुलना मायके से करती रहती हैं लेकिन हर घर- परिवार की अपना अलग परिवेश और अलग स्थिति होती है। खुद को उस हिसाब से ढाल लेना एक स्त्री का हुनर होता है जो गृहस्थ जीवन को मजबूत बनाता है। हां… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारे सामंजस्य स्त्री को ही बैठाने चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों का कर्तव्य बनता है कि एक दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखें……
सविता गोयल