साहस – श्याम आठले : Moral Stories in Hindi

सुबह के समय उषारानी अपने बेटे के साथ खेल रही थी जब उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसने फोन उठाया तो एक अंजान नंबर से कॉल थी। दूसरी तरफ से एक गंभीर आवाज़ ने उससे सवाल किया, “उषारानी बोल रही हैं?”

“हाँ, मैं ही बोल रही हूँ। आप कौन हैं?” उषारानी ने आश्चर्य से पूछा।

उधर से महिला की आवाज़ आई, “मैं कौन हूँ, यह महत्वपूर्ण नहीं है। जो बात मैं बताने जा रही हूँ, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। आपकी माँ, शांति देवी जी, को संभाल लीजिए। उनकी हालत बहुत खराब है। उनके साथ क्रूर व्यवहार हो रहा है।”

“आप कौन हैं? नाम बताइए,” उषारानी ने हैरानी और गुस्से में कहा।

महिला ने उत्तर दिया, “मेरा नाम जानना ज़रूरी नहीं है, लेकिन आपकी माँ की हालत वाकई दिन-ब-दिन बिगड़ रही है। यह बात आप तक पहुँचना बहुत ज़रूरी थी।” इतना कहकर महिला ने फ़ोन काट दिया।

फोन रखने के बाद उषारानी का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसके दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आने लगे। उसे अपनी माँ के चेहरे की उदास छवि याद आने लगी। उसके मन में वो दिन भी ताजा हो उठा जब उसकी माँ के साथ दुर्व्यवहार होते उसने खुद देखा था। उसे याद आया कि उसके पापा, केवल एक बेटे की चाहत रखते थे, लेकिन उनकी यह उम्मीद पूरी नहीं हुई और उसकी माँ ने एक बेटी को जन्म दिया – वह बेटी जो खुद उषा थी।

उसकी माँ, शांति देवी, का जीवन तब और भी दुखदायी हो गया जब डॉक्टर ने बताया कि उषा के जन्म के दौरान कुछ जटिलताओं के कारण अब माँ दोबारा गर्भवती नहीं हो सकतीं। यह बात सुनते ही पापा के व्यवहार में और भी ज्यादा कठोरता आ गई। पहले वे अपनी पत्नी के प्रति उदासीन रहते थे, परंतु अब उनका गुस्सा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। माँ पर लगातार ताने-तिश्नें और आरोपों की बारिश होने लगी। उषा का बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहाँ वह अपने पिता से हमेशा डरती रहती थी।

वक्त बीता, उषा की शादी चंद्र प्रकाश से हो गई और वह अपने ससुराल चली गई। शादी के बाद उसके पिता ने अपनी पहली पत्नी को छोड़े बिना ही दूसरी शादी कर ली। इस नए संबंध से भी उन्हें दो बेटियाँ ही हुईं, लेकिन फिर भी उनके व्यवहार में कोई सुधार नहीं आया। उनके अंदर की कटुता और नफरत अभी भी शांति देवी के प्रति कायम थी। उषा को उसके मायके आने की इजाजत नहीं दी जाती थी, और माँ से भी उसकी बातचीत न के बराबर होती थी।

अब, जब अचानक यह फोन आया तो उषा का मन बेचैन हो उठा। उसे अपने पति चंद्र प्रकाश का सहारा महसूस हुआ, और उसने उनसे अपनी माँ की हालत के बारे में बात की। चंद्र प्रकाश ने उसे भरोसा दिलाया कि वह माँ को लेने के लिए पूरी तरह तैयार है। उषा के मन में उम्मीद की किरण जागी, और वह अपने पति के साथ मायके के लिए निकल पड़ी।

मायके पहुंचकर उसने देखा कि उसकी माँ की हालत बहुत ही दयनीय है। चेहरे पर चोट के निशान, हाथ-पैर में सूजन और आँखों में गहरी उदासी। उसे देखकर उषा का दिल भर आया, लेकिन माँ ने उसे देखकर धीरे-धीरे मुस्कुराया। उषा ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अब वह अपनी माँ को और दुःख सहने नहीं देगी।

उसने पिता से माँ को अपने साथ ले जाने की बात कही। उसके पिता ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “अरे, तो अब तुम्हारी माँ पर बड़ा प्यार आ रहा है। ले जाना है तो ले जाओ, लेकिन फिर कभी यहाँ वापस मत लाना। वो तो एक बिना वेतन की नौकरानी है, जो मेरे घर के काम के अलावा कुछ और नहीं करती।”

उषा का मन भर आया, उसने सख्त लहजे में कहा, “पापा, मेरी माँ कोई नौकरानी नहीं हैं। वह आपकी पहली पत्नी हैं और मेरी माँ भी हैं। अब वह इस घर में नहीं रहेंगी, बल्कि मेरे साथ मेरे घर चलेंगी।”

उषा ने अपने पति के साथ माँ को घर ले जाने का निर्णय लिया। अब उसकी माँ एक नए जीवन की ओर कदम बढ़ाने के लिए तैयार थी।

घर पहुँचकर उषा ने माँ को आराम से रहने का आश्वासन दिया। उसका दो वर्षीय बेटा शिवांश भी अपनी नानी के आने से बहुत खुश था। वह दिन-भर अपनी नानी के साथ खेलता, कहानियाँ सुनता और उनकी गोद में सो जाता। शांति देवी के चेहरे पर धीरे-धीरे सुकून और खुशी के भाव लौटने लगे।

कुछ ही समय बाद, उषा के पिता का फोन आया। उन्होंने सख्त लहजे में आदेश दिया, “शांति को कल सुबह वापस भेज देना। मुझे उसकी जरूरत है, कामकाज में कमी पड़ रही है।”

उषा ने कठोरता से जवाब दिया, “वह मेरी माँ है, आपकी नौकरानी नहीं। वह अब यहीं मेरे पास रहेंगी, अपनी इज्जत और सम्मान के साथ। वह एक पढ़ी-लिखी औरत हैं और आत्मनिर्भर भी हैं। अब उनका हर निर्णय उनका अपना होगा।”

पिता ने धमकी भरे लहजे में कहा, “ऐसे कैसे उसे ले जा सकती हो? हमारा तलाक नहीं हुआ है, वो मेरी पत्नी है।”

उषा ने कड़े शब्दों में उत्तर दिया, “तब तो बिना पहली पत्नी को तलाक दिए दूसरी शादी करने के जुर्म में आपको जेल भी हो सकती है। आपकी यही सजा होगी कि अब से आप अपनी जिंदगी खुद संभालें और माँ को उनके अधिकार के साथ जीने दें।”

फोन काटकर उषा ने अपनी माँ को आश्वासन दिया कि अब उनकी जिंदगी में कोई और मुश्किल नहीं आएगी। धीरे-धीरे शांति देवी ने खुद को नए माहौल में ढाल लिया। अब वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही थीं। उषा की मदद से उन्होंने खुद के लिए कुछ छोटी-छोटी चीजें करना शुरू किया, जो कभी उनके सपने हुआ करते थे।

कुछ महीनों बाद, उषा ने अपनी माँ के लिए एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया, जिससे वह अपनी आर्थिक स्थिति को भी सुधार सकें। शांति देवी अब अपनी नई ज़िंदगी में खुश और संतुष्ट थीं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में अपनी पहचान बना ली थी, और उषा की हिम्मत और प्यार ने उन्हें नई ज़िंदगी दी थी।

अब उषा की माँ को किसी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं थी। वह आत्मनिर्भर होकर अपने जीवन का हर पल जीने लगीं। उषा ने उनके आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया था। इस तरह उषा ने न केवल अपनी माँ का मान बढ़ाया, बल्कि उनके लिए एक नई पहचान भी बनाई, जो अब किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान के साथ खिलखिलाती थीं।

मौलिक रचना 

श्याम आठले (बैंगलुरु)

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