सफ़र पीहर का  – पूनम वर्मा

सुबह आँख खुली तो सामने तांबे-सा लाल  सूरज अपनी आँखें खोल रहा था । यही वक्त था जब उसकी आँख से आँख मिलाई जा सकती थी । हमारी नज़रें मिलीं भी । कुछ जाना-पहचाना-सा लगा सूरज । आज सूर्योदय देखकर मुझे अपना बचपन याद आने लगा । इतने करीब से सूरज को तभी देखा था शायद ।

बरगद के नीचे सुबह-सुबह सूरज के सामने खड़े होकर सूरज को देखती और फिर पीछे मुड़कर अपनी लम्बी परछाई को । परछाई की लंबाई से खुद के लम्बे होने का सुखद एहसास होता । 

तभी झटके से गाड़ी खुल गई । मैं बचपन से वापस अपने सफर में आ गई । गाड़ी आगे बढ़ने लगी और पेड़-पौधे, खेत-पोखर सब पीछे छूटते जा रहे थे । साथ चल रहा था तो बस मेरा अपना-सा सूरज । मैं अपने सूरज को अभी भी निहार रही थी । इतने में  भाई-बहनों का वीडियो कॉल आ गया  ।

मैं बातों में मशगूल हो गई । भाई ने पूछा- “कहाँ पहुँची दीदी ?” मैंने कहा- “पता नहीं रे ! अभी-अभी नींद खुली है, पर बड़ा सुखद एहसास हो रहा है । अपना गाँव, अपना बचपन याद आ रहा है । वही लहलहाते मकई के खेत, वही पोखर, वही हवा, वही सूरज ! सब कुछ अपना-अपना-सा-सा लग रहा है ।”

“लो ! दीदी फिर पहुँच गई बचपन में ।” बहन ने टोका, पर मैं कहाँ लौटनेवाली थी । चल पड़ी मायके की सैर पर । 

“कितना प्यारा था हमारा बचपन ! जीवन का स्वर्णिम क्षण ! बरगद की छाँव, कुइयाँ का पानी, अँगने बिराजी थीं तुलसी महरानी । दादी और बाबा, गैया-मरैया, और वो चायवाली की झोपड़ी, बगइचा-बसबाड़ी, ठाकुरबाड़ी के बदरी बाबा, सिमरी वाली और नंदन काका। कितनी यादें हैं ! अब सब छूट गया रे। इस रेलगाड़ी की तरह हम आगे भागते गए और सब पीछे छूटता गया । जाने कितने बरस हो गए अपनी जन्मभूमि को देखे हुए ।”

भाई-बहनों से बातें करते हुए मैं भावुक हुई जा रही थी । फोन रखकर मैं फिर खिड़की की तरफ मुँह करके बैठ गई । गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी तो कुछ लोग चढ़ने-उतरने लगे ।  तभी मेरे पतिदेव की नींद खुली और मुझसे पूछा- 

“कौन-सा स्टेशन है ?” 

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मैंने अनमने ढंग से कहा-” “ध्यान नहीं दिया।पता नहीं कौन-सा स्टेशन है !”

उन्होंने खिड़की से मेरी उल्टी तरफ देखा और मुस्कराते हुए कहा- “तो अब देख लीजिए !”

गाड़ी खुल चुकी थी । मैं छूटते स्टेशन को ध्यान से देखने लगी । सहसा मेरी नज़र उस बोर्ड पर पड़ी जहाँ स्टेशन का नाम लिखा था ‘दलसिंहसराय’ ! मेरी आँखें चमक उठीं । यह तो मेरे गाँव का स्टेशन था ! ओह ! अब वह पीछे छूटता जा रहा था । मैं थोड़ी मायूस हो गई । गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली थी। मेरा मायका छूटता जा रहा था ।

ऐसा लगा मानो भगवान ने मनचाहा वरदान देकर अगले ही पल वापस ले लिया हो । मैं बेचैन-सी हो गई । मेरा हाथ खाली रह गया था । फिर मन को सन्तोष दिलाया “चलो दूर से ही सही ! गाँव की मिट्टी की सुगंध तो मिली ।

गाँव तो पीछे छूट गया पर सूरज अब भी साथ चल रहा था । मैंने मन ही मन अपने गाँव के सूरज से वादा किया- “भाई मेरे! अब तू लौट जा घर । वादा करती हूँ जल्द ही आऊँगी पीहर ! वह फिर भी कुछ देर साथ चलता रहा और मैं अपने गाँव और बचपन की यादों में खोई रही । अभी लम्बा सफ़र तय करना बाकी था ।

अब सूरज भी खिड़की से ऊपर चढ़ चुका था और गाड़ी भी गाँव से बहुत दूर निकल चुकी थी ।तभी अचानक बादल घिर आये और मन्द-मन्द हवा चलने लगी । दिन चढ़ने पर भी बैसाख की तपन बिल्कुल महसूस नहीं हो रही थी । यह खुशनुमा मौसम सफर को और सुखद बना रहा था । यह मौसम शायद कुछ क्षण के लिए पीहर से गुजरने के बदले गाँव के सूरज की तरफ से दी गई विदाई थी ।

-पूनम वर्मा

राँची, झारखण्ड ।

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