सांप भी मर गया लाठी भी नही टूटी – संगीता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

” मम्मी जी कल मेरे पापा आ रहे हैं !” नई बहु शिवानी चहकती हुई अपनी सास आशा जी से बोली।

” अरे तो इसमें इतना खुश होने वाली बात क्या चौबीस साल बिताए हैं तुमने अपने पापा के साथ यहां तो तुम्हे आए चौबीस दिन ही हुए हैं । वैसे भी बहु हो तुम इस घर की यूं बच्चों की तरह खुश होना शोभा नही देता तुम्हे !” आशाजी ये बोल चली गई।

” मम्मी जी चौबीस साल बिताए हैं पापा के साथ तभी तो उनसे दूरी के ये चौबीस दिन चौबीस जन्मों से लग रहे हैं !” आंख में आंसू भर शिवानी बोली पर उसे सुनने वाला वहां कोई ना था।

” पापा इतना सारा सामान लाने की क्या जरूरत थी अभी शादी में तो इतना खर्चा हुआ ही था!” अगले दिन पिता के आने पर शिवानी उनके गले लगते हुए बोली।

” बिल्कुल सही कह रही है शिवानी अरे इतना सब कौन खाता है आजकल!” मिठाइयों के डिब्बों और आम की टोकरी पर सरसरी निगाह डालती हुई आशा जी बोली।

” समधन जी शिवानी तो नासमझ है पर हमे तो रिवाज निभाने होते है बेटी के घर कोई खाली हाथ थोड़ी जाया जाता है !” शिवानी के पिता राकेश जी हाथ जोड़ते हुए बोले।

” हां ये भी ठीक कहा आपने !” आशा जी हंसते हुए बोली। 

राकेश जी के जाते ही आशा जी ने सभी सामान को अच्छे से नापा तोला।

” बहु तुम्हारे पापा को सामान लेना नही आता इतनी घटिया फल मिठाई लेकर जाया जाता है क्या बेटी के और ये आम तो देखो हमारे यहां तो कोई ऐसे आम खाए भी ना बेकार पैसे भी खर्च हुए और सारा सामान भी बेकार जायेगा !” आशा जी बोली।

” वो मम्मी जी मेरी मम्मी तो है नही तो पापा को जो सही लगा ले आए !” शिवानी आंसू भरी आंखों से सास को देखते हुए बोली। कहना तो वो बहुत कुछ चाहती थी पर पापा की दी सीख के कारण चुप थी। 

अगले दिन आशा जी को एक सत्संग में जाना था शिवानी का पति हितेश और ससुर रमेश जी फैक्ट्री चले गए ।शिवानी को उसके पिता द्वारा लाई चीजों का आशा जी द्वारा किया गया अपमान रह रह याद आ रहा था। अचानक उसने कुछ सोचा और कैब बुक कर दी।

” अरे बहु कहां से आ रही हो तुम ऐसे पड़ोस में चाभी दे घूमने जाना तुम्हे शोभा देता है क्या ?” कुछ देर बाद शिवानी लौटी तो आशा जी बोली असल में वो सत्संग से वापिस आ चुकी थी।

” वो क्या है ना मम्मीजी मुझे एक जरूरी काम याद आ गया था इसलिए जाना पड़ा !” शिवानी मुस्कुरा कर बोली।

” ठीक है चलो अब खाना बना दो जल्दी से इतने मैं आम काट देती हूं !” ये बोल आशा जी ने फ्रीज खोला।

” अरे सारे आम कहां गए ?” फ्रीज में एक भी आम ना पाकर आशा जी चौंकते हुए बोली।

” अरे मम्मी जी आपने ही तो बोला था ऐसे सस्ते फल मिठाई यहां कोई नही खाता इसलिए मैं उन्हे  अनाथाश्रम में बच्चों को बांट आई वहाँ मैं शादी से पहले भी अपना जन्मदिन मनाने जाया करती थी   ।

और पता है मम्मीजी वो उन सस्ते फल मिठाई को भी देख इतने खुश हुए की बस पूछो मत …सच में मम्मीजी जो सामान आपके लिए बेकार था वो उन मासूमों के चेहरे पर खुशी ले आया …फल मिठाई खाकर बहुत खुश हुए वो !” शिवानी मुस्कुराते हुए बोली।

” क्या तुम सारी मिठाई और फल बांट आई …पर क्यों ?” आशा जी थोड़ा गुस्से में बोली।

” क्यों क्या मम्मीजी आपने ही तो बोला हमारे यहां ऐसे आम और मिठाई कोई नही खाता तो पहले तो मैंने सोचा फेंक दू फिर सोचा बेकार क्या करनी चीज इसलिए बांट आई देखा आपकी बहु कितनी समझदार है

चीज बेकार भी नही हुई और ढेरों दुआएं भी ले आई और पता है मैने पापा को भी बोल दिया है अब वो यहां फल मिठाई ना लाया करे उन्हे इस घर के हिसाब की खरीदनी तो आती नही फिर क्यों पैसे बेकार करने  !” शिवानी मुस्कुराते हुए बोली।

” क्या !!” आशा जी सिर पकड़ कर बैठ गई उन्होंने तो सास का रुतबा दिखाने को बहु के पीहर से आई चीजों को बेकार बताया था पर यहां तो दाव उल्टा पड़ गया । अभी का आया सामान तो गया ही ऊपर से भविष्य में आने का भी रास्ता बंद हो गया। अब वो बहु से कुछ कह भी नही सकती थी क्योंकि बुराई तो उन्होंने ही की थी समान की।

शिवानी भी आशा जी की हालत का मजा ले रही थी साथ ही अपनी समझ पर इतरा रही थी क्योंकि बिना सास का अपमान किए उसने बार बार अपने पिता को अपमानित होने से जो बचा लिया। इससे सांप भी मर गया और लाठी भी नही टूटी। 

#अपमान

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल

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