आज राशि इधर से उधर सजीधजी इधर से उधर काफी भाग दौड़ कर रही थी, पूरा घर भी मेहमानों से भरा हुआ था। चारों तरफ बहुत हंसी-खुशी का माहौल था, हो भी क्यों ना आज राशि और उसके पति की कई सालों की तपस्या का परिणाम था कि वो इतनी अच्छी सोसायटी के सभी सुविधाओं से परिपूर्ण घर में प्रवेश कर रहे थे। आज उनकी गृहपूजा थी
सभी मेहमान खुले मन से राशि और उसके पति की तारीफ कर रहे थे। राशि भी सबसे बहुत प्यार से मिल रही थी, किसी को भी देने लेने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सबको विदा करते करते शाम हो गई थी। आज राशि और उसके पति के लिए बहुत खास दिन था। रात को राशि जब सोने के लिए बिस्तर पर आई तो नींद उसकी आखों से कोसों दूर थी। आज रह रह कर उसे अपना शादी के बाद ससुराल में प्रवेश के बाद का समय याद आ रहा था उसे याद आ रहा था कैसे ये ही रिश्तेदार जिसमें उसकी सास और ननद भी शामिल हैं आज उसके मुंह पर उसकी तारीफ के पुल बांध रहे हैं। यही सब शादी के बाद से ही कुछ समय तक तानों रूपी भाषा में उसका स्वागत करते थे।
असल में जब राशि की शादी हुई तो वो काफी समय से ही हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही थी और फिर नौकरी लगते ही उसकी 22-23 साल की उम्र में ही शादी हो गई। कहने का मतलब है कि वो काफी समय से अपने घर से दूर थी। जब उसकी शादी तय हुई तब उसकी होने वाली सास और घर के दूसरे लोगो की ये मानसिकता थी कि लड़की काफी समय से बाहर रही है और नौकरी करती है तो घर के काम काज में बिल्कुल अनाड़ी होगी।उस समय उनके जान पहचान में कोई बहू अभी तक नौकरी वाली आई भी नही थी।
उन्होंने बिना उसको जाने-पहचाने ही उसके बारे में राय बना ली थी। ये लोग तो फिर भी थोड़ा सा पुराने विचारों के थे,पर उसकी ननद जो उसकी ही हमउम्र थी, वो भी राशि का सहयोग न करके पीठ पीछे उसके घर के काम ना आने की, उसे ठीक से तैयार ना होने की आदत का बढ़ चढ़कर गुणगान किया करती थी। राशि को ससुराल में प्रवेश करते ही एक असहयोग आंदोलन वाले रैवये का सामना करना पड़ा था।
राशि अपनी तरफ से हर काम अच्छा करने की पूरी कोशिश करती पर बदले में उसे यही सुनना पड़ता कि कभी काम किया नहीं ना और अपनी मम्मी से भी नहीं सीखा। सास को कुछ ठीक भी लगता तो ननद और सास की जो रोज़ाना फोन पर बात होती, पूरा विवरण एक दूसरे के साथ बांटा जाता उससे ठीक काम में भी कमी निकल जाती। जब सास और ननद के ही ऐसे तेवर थे तो बाकी रिश्तेदार तो वैसे भी मज़े ही लेते हैं। वो भी जब राशि से मिलते तो उसको ढंग से रहने की और नौकरी के साथ साथ अब घर पर भी ध्यान दो ऐसी नसीहत दे जाते। राशि अंदर ही अंदर कही खो रही थी, शादी से पहले तो अपने दोस्तों में और हॉस्टल में सबसे उसने हमेशा तारीफ ही पाई थी।
उसे नहीं समझ आ रहा था कि अब ऐसा क्या हो गया जो उसको हर कोई ये जताकर चला जाता है कि उसको कुछ नहीं आता। वो अपनेआप में सिमट रही थी। वो सबके बीच अपने आपको बहुत अकेला महसूस करती। अपने मम्मी-पापा से भी वो इन सब बात का जिक्र नहीं करती क्योंकि पीठ पीछे किसी की बुराई करना उसके संस्कारों में नहीं था। वैसे भी उसको लगता था कि ये अब उसकी लड़ाई है जिसे उसे ही लड़ना होगा और सामना करना होगा।
यही सब चल रहा था तभी राशि के पति को अच्छे पैकेज पर दूसरी जगह बैंगलोर से नौकरी का ऑफर आया, राशि की कंपनी की भी एक ब्रांच वहां पर थी इस तरह राशि को भी वहां पर नौकरी मिल गई। अब वो अपने पति के साथ दूसरे शहर आ गई। राशि को तो जैसे नए पंख मिल गए, अब उसे हर बात पर कसौटी पर परखने वाले माहौल से थोड़ा छुटकारा मिल गया था। यहां आकर उसको नई तरह से सोचने का मौका मिला।
उसने अपनी नई शुरुआत की, अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने सुंदर भविष्य की नीव रखी, जिसका परिणाम ये आज उनकी मेहनत से बनाया घर था। वैसे भी जब कोई भी रिश्तेदार उनके पास बैंगलोर में किसी काम से आता तो राशि ने उसको भी पुरानी कड़वाहट भुलाकर पूरा सम्मान दिया। जब रिश्तेदार उनके पास आते तो उनको लगता कि उन्होंने राशि के बारे में जो धारणा बनाई थी वो तो गलत थी।वैसे भी राशि ने अपने काम और घर दोनों के सामंजस्य बनाकर खुद को इतना व्यस्त कर लिया था कि अब उसके पास बुराई भलाई के सोचने समझने का भी समय नहीं था।
उसके दो प्यारे प्यारे बच्चे भी हो गए थे, जिसको उसने बहुत अच्छे संस्कार दिए थे। जो रिश्तेदार थे उनके भी घर में बहुएं आ गई थी अब उनको भी अपने किए का एहसास होता था। रही बात सास ननद की तो अब अगर वो राशि को कुछ गलत बात कहती थी भी तब राशि उनको बहुत ही विन्रमता के साथ स्पष्ट शब्दों में उनके सामने ही उसका एहसास दिला देती थी।
राशि ये सब सोच तो रही थी साथ-साथ उसको ये भी लग रहा था कि अब तो फिर भी समय बदल गया है पर रिश्तों का ताना बाना कितना जटिल है जो प्यार भरे रिश्तों को भी स्वार्थी बना देता है। मां अपने बेटे की शादी तो करवाना चाहती है पर शायद वो अपने बेटे को बांट नहीं पाती और ननद जो कि घर की बेटी होती है वो बचपन से वहां रही होती है तो उसको लगता है कि उसका हक लेने वाला कोई आ गया इसलिए कई बार बुरे ना होते हुए भी वो लोग अपना परिवार छोड़कर उनके घर रहने आई उस नई लड़की को मन से नहीं अपना पाती।
कई बार तो उसके साथ इतना बुरा व्यवहार कर देती हैं कि समय के साथ साथ भी दिल पर लगे भाषा के वो व्यंग बाण नहीं मिट पाते। काश रिश्तों में इतना स्वार्थ ना होता। दामाद को जिस तरह से मान सम्मान मिलता वैसे ही अगर बहु को भी मिलता तो शायद रिश्तों का स्वरूप ही दूसरा होता।
दोस्तों इस कहानी के माध्यम से मेरा सिर्फ ये कहना है कि एक तो जरुरी नहीं जो लड़कियां हॉस्टल में रहकर पढ़ी हों और नौकरी करती हों वो घर का काम नहीं जानती, दूसरा कोई भी रिश्ता हो वो हर होड़ और स्वार्थ से दूर होना चाहिए। हर रिश्ते को समय देना चाहिए। राशि की तो फिर भी किस्मत अच्छी थी कि उसके पति की दूसरी जगह नौकरी लग गई थी पर हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता। एक दूसरे के साथ किया गया अपनत्व का व्यवहार ही आने वाले नए रिश्तों की नीव रखता है। रही बात स्वार्थ की तो वो तो हम सभी ही कहीं ना कहीं हैं क्योंकि हम लोग तो भगवान की पूजा भी किसी फल प्राप्ति के लिए ही करते हैं। वाणी और दुर्भावना पर नियंत्रण हमारी कई समस्या को हल कर सकता है।
#स्वार्थ
डॉ. पारुल अग्रवाल,
नोएडा
Same to same meri story, Aisa lagta hai jaise mujhe hi dhyan me rakhkar likhi gayi ho. Mujhe bhi bar bar sunana padta tha ki hostel me rahne ke karan mujhe kuch nhi aata par aaj mere bhi relatives ki rai mere liye badal chuki hai ,behave bhale hi na badla ho, Main bhi apne do bachcho ke sath apni naukri, ghar, bachche rishtedari sab bahut achche se manage karti hoon .