अतुल और हीनल की मुलाकात दिल्ली के एक मैनेजमेंट कॉलेज में हुई थी। इसके बाद, दोनों की नियुक्ति गुड़गांव में एक मल्टीनेशनल कंपनी में हो गई। दोनों परिवारों की सहर्ष सहमति से अक्टूबर में उनका विवाह हुआ, और दिल्ली की रहने वाली मीनल, अपने ससुराल गुड़गांव आ गई। क्रिसमस के बाद वीकेंड पर, वह अतुल के साथ दिल्ली अपने मम्मा-डैडी से मिलने आई। यहाँ, बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
“ससुराल कैसा होता है, मुझे नहीं पता, मम्मा! गुड़गांव तो मेरा दूसरा मायका है। मम्मी-पापा जब से न्यूयॉर्क घूमने गए हैं, कितना मिस कर रही हूँ उन्हें! अतुल से भी ज्यादा मेरे मम्मी-पापा बन गए हैं वे दोनों। अतुल तो पहले से ही मेरा है, ये तो आपको पता ही है,” हीनल ने अपनी मम्मा से कहा, जब उसकी मम्मा ने उससे ससुराल के बारे में पूछा।
“हां, हां! इसने मेरे मम्मी-पापा को मुझसे छीन लिया है,” जैसे ही अतुल ने कहा, वातावरण में खुशी का अहसास छा गया।
“पर मम्मा, अतुल की दादी से मेरी बिल्कुल नहीं पटती। कितनी बंदिशें लगाती हैं! मैंने तो उनसे बात करना ही बंद कर दिया है,” हीनल ने आगे कहा।
“अतुल की दादी? ये क्या होता है, हीनल बेटा? अतुल तुम्हारा है, अतुल के मम्मी-पापा तुम्हारे हैं, फिर अतुल की दादी तुम्हारी क्यों नहीं? और कैसी बंदिशें लगाती हैं वे तुम पर? मैं भी तो जानूं!” हीनल की मम्मा ने अपनी बेटी से सवाल किया।
“उनके हिसाब से सुबह जल्दी उठना, जींस की जगह साड़ी पहनना, गहनों से लद कर और मेकअप थोप कर रहना, उनके हिसाब से सारा दिन खाते-पीते रहना! इतना बंधन, मम्मा! मुझसे नहीं होता! जब मेरे मम्मा-डैडी ने मुझे हमेशा अपने हिसाब से रहने की स्वतंत्रता दी है, तो मैं उनके बंधन में क्यों रहूं?” हीनल की बातों में खीज थी।
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“ओह! मैं अब समझी। जब बच्चों को अकेले रहने की आदत हो जाती है, तो बड़े-बुजुर्गों से उन्हें बंधन दिखाई देने लगता है। हीनल बेटा, तुम्हारे डैडी और मैं दोनों नौकरीशुदा हैं। और तुम हमारी अकेली संतान हो। तुम्हारे दादा-दादी तुम्हारे जन्म से पहले ही इस दुनिया को छोड़ गए थे। इसलिए तुम्हें शुरू से ही अकेले रहने की आदत रही है। यही कारण है कि तुम्हें ससुराल में दादी का प्यार समझ नहीं आ रहा है,” हीनल की मम्मा ने समझाते हुए कहा।
“पर मम्मा, मुझे अपने नियंत्रण में रखने से उन्हें क्या मिलता है?” हीनल का रोष जारी था।
“बच्चों की खुशी में अपनी खुशी अनुभव करती हैं वे! हीनल बेटा, जिस प्यार को तुम नियंत्रण और बंधन समझ रही हो, वो सब दादी मां की अपनी लक्ष्मीस्वरूपा पौत्रवधू के अटल सुहाग की कामना है। वे तुम्हें सजा-धजा, खाते-पीते और खुशी से चहकते देखना चाहती हैं। बहू के सौभाग्य की इतनी चाहत रखने वाली दादी नसीब वालों को मिलती है,” मम्मा ने प्यार से समझाया।
“ऐसा है क्या, मम्मा! सिर्फ दादी ही ये सब क्यों कहती हैं? ससुराल में मम्मी-पापा और यहां आप दोनों, मम्मा-डैडी तो ये सब निर्देश नहीं देते,” मीनल ने सवाल किया।
“बेटा, हम लोग बीच की पीढ़ी हैं। हमने समयानुसार बच्चों से प्यार करने के अपने तरीके में बदलाव कर लिया है। बच्चों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, ये हमारे लिए सर्वोपरि है। लेकिन दादी एक पीढ़ी पहले की हैं।बिल्कुल अलग परिवेश में उनका पालन-पोषण हुआ। इसलिए उनके लिए परंपराएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर तुम उनकी भावनाओं का ख्याल रखोगी, तो उनकी खुशी देखकर तुम्हें अथाह खुशी मिलेगी,” मम्मा ने अपनी बेटी को प्यार से समझाया।
“सॉरी मम्मा, मैंने उन्हें समझने में गलती की। मैं वापस जाकर दादी मां के प्यार के बंधन में बंध जाऊंगी,” हीनल ने प्यार भरा आश्वासन दिया।
“ये हुई न मेरी बेटी वाली बात!” जैसे ही मम्मा ने कहा, “तो पत्नी किसकी है!” खुशी से अतुल ने कहा।
“पत्नी तो है तुम्हारी! पर इसे अपने रंग में पूरी तरह नहीं रंगा है तुमने। तुम्हारी दादी को भी हीनल तुमसे छीन ले, इसके लिए कुछ उपाय करो, अतुल बेटा,” हीनल के डैडी ने चुटकी ली।
“समझ गया, डैडी। अगली बार आपका दिया टारगेट पूरा करके ही हम आपसे मिलने आएंगे,” अतुल ने डैडी का इशारा समझते हुए कहा।
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गुड़गांव वापस आने पर, हीनल दादी मां को पूरा सम्मान देने लगी थी। लेकिन अभी आंतरिक जुड़ाव होना बाकी था। अतुल सही अवसर की तलाश में था।
31 दिसंबर की सुबह, हीनल ने सिरदर्द की शिकायत की। अतुल ने उसका सिर दबाया, दवा भी दी, लेकिन उसे ज्यादा आराम नहीं मिल रहा था। उसे सर्दी लग गई थी।
कमरे में थोड़ी धूप आ जाए, इसके लिए जैसे ही अतुल ने खिड़की का पर्दा हटाया, उसे बाहर लॉन में धूप में अपने बालों में तेल लगाती दादी दिखाई दी।
उसे एक तरकीब सूझी और वह हीनल को बाहर धूप में ले गया। फिर तुरंत दादी के पास पहुंच गया, “दादी मां, मेरे सिर में भी तेल लगाओ न। कितने दिन हो गए हैं, आपके हाथ से मसाज करवाए हुए!”
“हां, हां! बैठ न!” दादी ने खूब प्यार से अपने लाडले की मसाज की।
इसके बाद, अतुल ने हीनल से कहा, “आओ, अब मैं तुम्हारे सिर की मसाज करता हूं। सिरदर्द कहां गया, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।” और जानबूझकर उल्टे-सीधे हाथ चलाने लगा।
यह देखकर दादी से न रहा गया, “चल हट, मेरी प्यारी बहू के सिर में और भी दर्द करेगा क्या?” और दादी ने प्यार से हीनल के सिर की मसाज की।
पहली बार हीनल को यह सुखद अहसास हुआ था। आंखों में अपनेपन के अश्रु लिए, हीनल दादी से लिपट गई, “दादी मां, आपके हाथों में जादू और दिल में अथाह प्रेम का सागर है।”
अतुल की तरकीब काम आई। उसने चुपके से वीडियो कॉलिंग कर हीनल के मम्मा-डैडी को सब दिखाया।
अगले दिन नववर्ष की सुबह, दादी के निर्देशन में मीठी खीर बनाकर, प्रभु को भोग लगाकर, हीनल ने अपने पति की दादी को छीनने का नया अध्याय शुरू कर दिया।
-सीमा गुप्ता (मौलिक व स्वरचित)
प्रतियोगिता वाक्य: #जब बच्चों को अकेले रहने की आदत हो जाती है, तो बड़े-बुजुर्गों से उन्हें बंधन दिखाई देने लगता है।