प्रेरणा – कंचन श्रीवास्तव 

मनीष के द्वारा पकड़े कागज के पुलिन्दे  ने मेरे होश उड़ाए दिए।

“सब कुछ संभला रहे तो पुरुष की वाह वाही

जरा सा कुछ बिगड़ जाए तो ……………।”

इन्हीं दो पाटों के बीच जिंदगी पिस कर रह जाती है 

हां यही तो सुनती आ रहीं हूं वर्षों से,मुझे याद है जब भाई (रमेश) हाईस्कूल की परीक्षा पास किया था तो तारीफियों का तांता लग गया था घर पर ,हां तांता वो भी पापा की।

अरें भाई फलाने का बेटा टॉप किया ।

फिर क्या पूरे एक हफ्ते घर पर  लोगों का आना जाना लगा हुआ था ।

उसे भी मां ने ही संभाला,हां मां ने अरे – पापा और भाई तो बैठ जाते थे अपनी बड़ाई सुनने और रसोई से नाश्ता बनाकर मां देती।अरे मैंने तो कुछ ऐसे भी प्रशंसक भी देखे  जो एकबार फर्जदआई में खाने के लिए कह दो तो  रुक जाते और खा कर ही जाते।

फिर मां तमाम तरह के व्यंजन बनाती और विधिवत परोस कर खिलाती ।

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ये सब करते करते रात के दो बज जाते ,अरे भाई जाने वाला जाएगा फिर ना मां रसोई समेटेगी। नहीं समेटेगी तो सुबह। सबको समय से नाश्ता ,चाय और खाना कैसे देगी।




तीन पीढ़ियों का संगम था मेरा मायका।

दादी-दादा, मम्मी-पापा और हम तीन भाई बहन।और इन सबकी जिम्मेदारी सिर्फ एक औरत पर थी।

पापा कमाते,हम सब पढ़ते  ,रही बात  दादा दादी की तो दादा जी बीमार रहते और दादी बूढ़ी हो चली थी।

सो किसी काम से मतलब नहीं था।

हुई ना मां अकेली सबको संभालने वाली। फिर भी कभी मैंने उन्हें झुंझलाते हुए नहीं देखा,  वो हमेशा सबकी पसंद का ख्याल भी रखती थी और हंसती भी रहती। क्या मजाल कि उनके चेहरे पर उदासी की झलक भी मिल जाए।

पर तब मुझे बड़ा बुरा लगा जब मेरे नम्बर थोड़े कम आए। 

तो उसकी वजह मम्मी को ठहराया गया। कि वो ध्यान नहीं दी , हर समय पड़ोसिन से बात करती रहती है वगैरा वगैरा।

और तो और पापा भी उन पे बरस पड़े कि हां सही ही कह रहे  लोग ,तुमने ध्यान दिया होता तो अच्छे नम्बर से मैं पास होती।

देखो न तुम्हारी वजह से लोग कितना भला बुरा कह रहे।

ये सुन मैं सन्न रह गई।

पर मां अपने कामों में लग गई।

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फिर मैंने पूछा मां तुमने पलटकर जवाब क्यों नहीं दिया कि मेरी अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण मेरे नम्बर कम आए हैं उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।

इस पर वो बोली बेटा अभी तुम नादान हो कुछ नहीं समझती ,जब तुम्हारी शादी होगी तो धीरे-धीरे सब समझ जाओगी।




ज्यादा जवान खोरी करने से घर बिगड़ता है और फिर एक समय के बाद कोट कचहरी तक के चक्कर काटने पड़ते हैं।

यहां तक की तलाक तक की नौबत आ जाती है।

जैसा कि आज के समाज में हो रहा है । अरे पढ़ाई लिखाई स्वाभिमान सिखाता है अभिमान नहीं, जो आज के युवा जोड़े में साफ देखने को मिल रहा । स्वाभिमान ने अभिमान का रूप ले लिया है।

और रिश्ते घर परिवार सब टूटकर बिखर रहे है । फिर ब्याह के बाद अपना घर ही अच्छा होता है चाहे जैसा हो कम ज्यादा तो चलता रहता है।

 ऐसे में अपने ही मुंह मोड़ लेते हैं समाज की तो बात छोड़ो।

तलाकशुदा औरत की घर समाज कहीं भी कोई इज्जत नहीं होती।

कहती हुई वो रसोई में चली गई।और मैं सोचने लगी वाह रे स्त्री

महान है तू

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कितना कुछ सहती  है फिर भी खुश  रहती है।और कुछ बिगड़ जाए तो संभाल लेती है।

सोचते हुए चार साल पहले हुई मनीष के साथ शादी के बाद काफ़ी जद्दोजहद वाली जिंदगी जीने के बाद भी  हाथ में पकड़े हुए कागज को फाड़ते हुए मनीष को तलाक देने का फैसला रद्द कर दिया।

और मन ही मन ऐसी प्रेरणा स्वरूप मां देने के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया।

स्वरचित

कंचन श्रीवास्तव आरजू

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