प्रेम विवाह में बंधी औरत उस नवजात पिल्ले (puppy) की तरह होती है जिसे कोई बच्चा मोहपाश में बंधकर अपने घर उठा लाता है लेकिन उसके मां-बाप उसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं… कहां से लाए हो… किसका है… हम अपने घर में नहीं रख पाएंगे.. जहां से लेकर आए हो वहीं छोड़ आओ…. हम तुम्हारे लिए अच्छी ब्रीड का ले आएंगे ।
बच्चा अगर जरा सा भी दब्बू हुआ तो उसे वापस वही छोड़ आता है जहां से लेकर आया था और प्रेम वहीं दम तोड़ देता है…
अगर कहीं बच्चा हठी हुआ तो मांँ बाप अपने बच्चे के मोंह में उसे घर पर तो रख लेते हैं लेकिन स्वीकार नहीं कर पाते और उस पिल्ले को हमेशा यही डर लगा रहता है कि अब बेघर हुए थे कि तब बेघर हुए क्योंकि अब तो उसे उसकी मां भी शायद न स्वीकारें।
माता-पिता को उसे घर पर रखने में कोई खुशी नहीं होती है…… ना ही कोई उत्साह उनके द्वारा दिखाया जाता है बल्कि शर्म से वह जमीन में गड़े जाते हैं कि यह उनके स्टैंडर्ड को मैच नहीं कर रहा है। अगर किसी ने पूछ भी लिया तो मरी सी मुस्कान के साथ यही जवाब देते हैं कि बच्चे का मन था तो रख लिया…
वहीं अगर अच्छी ब्रीड का लाए होते तो पूरे मोहल्ले में उसका दिखावा होता और शान से उसका गुणगान भी किया जाता है…. वो माता पिता कि शान का एक हिस्सा होता लेकिन इस देसी ब्रीड के लिए ना तो कॉलर आता है.. ना डॉग फूड… ना डॉग हाउस.. ना ही उसे घर में घुसने की अनुमति होती है और ना ही उसे कोई दुलराता है.. ना कोई उसके नखरे सहने वाला होता है… एक बोझ की तरह मां-बाप उसे झेलते रहते हैं।
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अब मां बाप के आगे कोई विकल्प भी नहीं रहता है…. जब तक यह वाला घर से जाएगा नहीं… तब तक कोई दूसरा लाया नहीं जा सकता है तो वह बच्चे को झांसा भी देते रहते हैं कि देखो फलाने के घर लैबराडोर है…. फलाने के घर जर्मन शेफर्ड है….. फलाने के घर हस्की है तो फलाने घर पवेलियन है…… तुम इसको वहीं छोड़ आओ तो हम तुम्हारे लिए भी बढ़िया ब्रीड का ले आएंगे…साथ में अच्छी चीज़ें भी लाएंगे… . देसी कौन पालता है।
अगर बच्चा बात मान गया तो ठीक… वरना मां-बाप प्रेम के बाद दूसरे हथकंडे भी अपनाते हैं जिसमें वह उस बेचारे पिल्ले की सौ कमियांँ बच्चे को गिनाते रहते हैं और खुद को हो रही परेशानी बताते रहते हैं…. देखो.. उसने ये किया.. वो किया …. ये बात नहीं मानता… यह घर में सब को परेशान करता है…. इसे तुम ही संभालो….. वरना इसके साथ तुम भी बाहर निकलो…
वैसे ज्यादातर बच्चे इसी स्टेप पर फेल हो जाते हैं लेकिन अगर बच्चे का प्रेम प्रचंड है तो बातइमोशनल ड्रामा तक पहुंच जाती है। वह छोटा पिल्ला जो अब ना घर का है ना घाट का…. उस छोटे बच्चे के प्रेम पर विश्वास कर उसके साथ उसके घर तक आता है और उसके माता-पिता की सारी अवहेलनाओं को सहन करते हुए भी प्रेम की एक मुस्कान के इंतजार में अपने आत्मसम्मान की भेंट चढ़ा चढ़ा कर जबरदस्ती उस फैमिली में फिट होने का प्रयास किया करता है।
भले ही कुछ समय बाद माता-पिता अपने बच्चे के हठ के कारण उसे घर से नहीं निकाल पाते लेकिन उनके मन में एक अच्छी ब्रीड और उसके साथ जुड़ी शान हमेशा टीस मारती रहती है।
वैसे इसमें कई माँ बाप अपवाद भी हैं जो पहली नजर में ही उस छोटे पिल्ले को स्वीकार कर लेते हैं और अपने बच्चे की खुशी के साथ साथ खुश हो जाते हैं।
मौलिक
स्वरचित
अंतरा