*प्रायश्चित* – बालेश्वर गुप्ता : Moral Stories in Hindi

       देखो,अजीत मुझे अब अपने बेटे की पढ़ाई के लिये अपनी जमीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ेगा,सो अब मेरी जमीन को बैंक से मुक्त करा दो।

       वो तो ठीक है,पर सुशील मेरे पास अभी रुपयों की व्यवस्था नही है, इसलिये बैंक से अभी जमीन मुक्त नही हो पायेगी।

       पर अब तो तुम्हारा काम काज बढ़िया चल रहा है, तुमने एक वर्ष के लिये ही तो मेरी जमीन की बैंक को जमानत देकर कर्ज लेने को बोला था।अब तो चार वर्ष होने को हैं।मेरा क्या कसूर है भाई?जमीन का टुकड़ा नही बेचूंगा तो अपने बेटे को उच्च शिक्षा नही दिला पाऊंगा।कुछ तो ख्याल करो।

       अजीत को पैकेजिंग मैटीरियल निर्माण की फैक्ट्री लगानी थी,जिसके लिये बैंक से लोन लेना था।बैंक किसी संपत्ति की जमानत मांग रहा था।अजीत के पिता ने जमानत देने से मना कर दिया तब उसे ध्यान आया कि उसके मित्र सुशील के पास कृषि भूमि है,जो अब आबादी के निकट आने के कारण काफी महंगी हो गयी है,

अजीत ने सुशील से अपने बैंक लोन लेने के लिये जमानत देने का आग्रह किया।हालांकि अजीत ने सुशील को एक वर्ष के लिये ही गारंटर बनने को बोला था,उसने वायदा किया था कि वह एक वर्ष में दूसरी व्यवस्था करके उसकी जमीन बैंक से मुक्त करा देगा।सुशील ने दोस्त पर भरोसा करके जमानत दे दी।

अब चार वर्ष होने को थे कि अजीत सुशील की भूमि को किसी न किसी बहाने बैंक से मुक्त कराने में बहाने बाजी कर रहा था।आज तो अजीत ने साफ साफ कह दिया कि जब तक उसके पास लोन चुकाने लायक धन नही होगा तब तक वह उसकी भूमि मुक्त नही करा पायेगा।

     सुशील ने समझ लिया कि उसके साथ दगा हुआ है, अपना काम निकालने के लिये उसके ही दोस्त ने छल करके एक प्रकार से उसकी भूमि को हड़प ही लिया है।उसे अपने बेटे के भविष्य की चिंता थी।अजीत से टका सा जवाब मिलने पर सुशील बस इतना ही बोल पाया,अजीत मैंने तो तुम्हारे साथ कुछ बुरा नही किया था,फिर तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो,भगवान से तो कुछ डरते?अजीत कोई उत्तर न देकर चला गया।

       सुशील ने अपने घर को गिरवी रख कर बेटे की शिक्षा हेतु धन की व्यवस्था की।इस घटना के बाद अजीत ने सुशील से सबंध लगभग समाप्त ही कर लिये।सुशील अजीत के इस बेईमानी भरे व्यवहार से बेहद दुखी हुआ,पर किया कुछ नही जा सकता था।

       समय अपनी गति से चलता रहा।सुशील का बेटा अपनी शिक्षा पूरी कर अच्छे पद पर अच्छे वेतन पर नियुक्त हो गया।अजीत द्वारा किये धोखे को सुशील ने भुला दिया था,अब उन्हें किसी बात की कमी नही रह गयी थी।

      एक दिन अजीत का कर्मचारी सुशील के घर आया और उसने बताया कि भाई जी को लकवा मार गया है,वे आपको बहुत याद कर रहे हैं, उन्होंने आपको आज ही बुलाया है।सुशील को अजीत के साथ दोस्ती भरे दिन याद आ गये, वह तुरंत ही अजीत के घर की ओर दौड़ लिया।वहां पहुंच सुशील अजीत का हाल देख उससे लिपट गया।अजीत लकवाग्रस्त होने के कारण स्पष्ट रूप से बोलने में असमर्थ था।

पर दोनो एक दूसरे के भाव तो समझ ही रहे थे।अजीत बार बार आकाश की ओर हाथ उठा रहा था,शायद कह रहा था कि सुशील के साथ बुरा करने के कारण ही भगवान ने उसे ये सजा दी है।

      अजीत ने धीरे से अपने तकिये के नीचे से कुछ कागज निकाल कर उन्हें अपने माथे से लगा कर हाथ जोड़कर उन कागजो को सुशील को पकड़ा दिया।सुशील ने देखा कि ये कागज तो उसकी जमीन के थे,जिसे अजीत ने बैंक से मुक्त करा कर सुशील को सौंप दिये थे।यह शायद अजीत का प्रायश्चित था।जमीन के कागज फर्श पर पड़े थे और दो दोस्त एक दूसरे से चिपट कर अपने आंसुओ से एक दूसरे के कंधों को गीला कर रहे थे।

बालेश्वर गुप्ता, नोयडा

मौलिक एवं अप्रकाशित

*#भगवान की लाठी में आवाज नही होती* मुहावरे पर आधारित लघुकथा:

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