Moral Stories in Hindi : परिवार में खुशियाँ आने वाली हैं पर मालती तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता नही झलकती,क्या कोई परेशानी है?मुझे बताओ ना, मालती कोई ना कोई बात तो है?प्लीज मालती मुझसे कुछ मत छिपाओ।कहते कहते मनीष ने मालती को अपने गले से लगा लिया।
मालती मनीष के गले से लगकर फफक फफक कर रो पड़ी।मनीष सांत्वना देता रहा,काफी देर बाद मालती सामान्य हो पायी।उस दिन मनीष ऑफिस नही गया,उसने उस दिन मालती के साथ ही दिन बिताने का निर्णय कर लिया।मनीष जानना चाहता था आखिर मालती को क्या दुःख खाये जा रहा है?माँ तो खुद मालती को बेइंतहा प्यार करती है, वे मालती को कुछ भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में भी कटु बोल ही नही सकती।वे खुद एक दूसरे को खूब प्यार करते ही हैं तो फिर मालती उदास क्यों रहती है,मनीष सोच सोच कर परेशान था,मालती कुछ बता नही रही थी।
मालती और शेखर भाई बहन थे।शेखर मालती से दो वर्ष छोटा था।रवि और सुधा की ये ही दो संतान थी।रवि का अच्छा कारोबार चल रहा था,घर में किसी चीज की कोई कमी नही थी।बस सुधा को पता नही क्यों जबसे शेखर का जन्म हुआ तब से मालती की उपेक्षा करने लगी।अजीब सी बात यह थी कि माँ का प्यार रुझान सदैव बेटी की ओर विशेष होता है,पर यहाँ स्थिति विपरीत थी।प्रारम्भ में मालती को इस पक्षपात का बच्चे होने के कारण पता ही नही चला,पर कुछ बड़ी होने पर उसे अहसास होने लगा।
एक बार रवि मालती और शेखर के वास्ते खिलाने लाया। दोनो बच्चो को उनके उनके खिलोने दे दिये गये।पर अगली सुबह शेखर ने मालती के खिलौने को उठा लिया,मालती ने लेना चाहा तो उसने नही दिया।इतने में ही सुधा आ गयी और उसने मालती को बुरी तरह डांट दिया अरे तू बड़ी है अगर छोटे ने खिलोना ले लिया तो क्या हो गया,क्या मर जायेगी?
मालती बड़ी जरूर थी पर थी तो बच्ची ही,उसे समझ ही नही आया,कि माँ उसे ही क्यो डांट रही है?फिर तो अक्सर होने लगा कि मालती को ही घर मे गैर जैसा बना दिया।रवि कभी कभी कहता भी सुधा मालती भी तो अपनी बेटी है, तुम उसके साथ ऐसा क्यों करती हो?पर सुधा कोई उत्तर न देकर दूसरे कमरे में चली जाती।अपने ही घर मे अपनी ही माँ के सामने मालती सहमी सहमी रह कर ही बड़ी हो गयी।
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रवि ने मालती के लिये रिश्ता खोजना शुरू कर दिया,आखिर मालती विवाह योग्य हो गयी थी।अचानक सुधा में एक परिवर्तन आया अब वो मालती का ध्यान रखने लगी थी,उसे अपने से चिपटा कर रखती,घर का काम काज सिखाती,परिवार की ऊंच नीच समझाती।मालती अपनी माँ के इस व्यवहार से आश्चर्यचकित भी थी और खुश भी थी।चलो घर से विदाई पूर्व ही सही माँ का भरपूर प्यार अब तो मिल रहा है।
मालती जैसे ही घर मे घुसी और अपने कमरे की ओर जाने लगी तो सुधा के रोने और बात करने की आवाज सुनाई दी,माँ पापा से कह रही थी,कि तुमने आसानी से कह दिया कि मैंने मालती से प्यार नही किया,पर जानते भी हो ऐसा क्यों हुआ,क्यों मैं पथ्थर हो गयी,पेट मे थी अपनी मालती तो अम्मा जी बोली देख बहू हमें पोता चाहिये,पोती नही।
बताओ क्या ये मेरे हाथ मे था।एक बोझ लिये हॉस्पिटल गयी,वापस आयी तो पोती को लिये।उनकी वितृष्णा मुझे अंदर तक चीर गयी।आज माँ नही रही,पर उनकी तिरष्कृत निगाहे उनके जीते जी मुझे आतंकित करती रही। वो तो शेखर के आने के बाद वातावरण बदला।
मेरे मन के किसी कोने में यह बैठ गया रवि कि मालती का होना उसके वजूद को खत्म करने वाला है।इस विचार को जितना मैं झटकती उतना ही वो मुझ पर हावी हो जाता।मेरी मनोदशा को मेरी बच्ची ने भी भुगता है। रवि आज अपनी मालती जब दूसरे घर जाने को तत्पर है तो मुझे अपने दिन याद आते हैं, मैं नही चाहती मेरी बच्ची उस दर्द को भुगते जो मैंने भुगता है।मैं उसे बहुत प्यार देना चाहती हूं,रवि।
मालती सुन रही थी,मां की ग्रंथी खुल चुकी थी,पर उसका बचपन तो भेंट चढ़ चुका था, आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे,पर किस काम के।अब नये घर मे उसके साथ क्या होगा?बेटी होना क्या इतना बड़ा गुनाह है ?
मालती का विवाह सम्पन्न हो गया,रवि ने अपनी मालती का विवाह धूम धाम से किया,मनीष भी लाखों में एक था।मनीष और मालती एक दूसरे को देख पहली नजर में ही एक दूसरे की ओर आकर्षित हो गये थे।हर्ष उल्हास के साथ दोनो ने अपने हनीमून के लिये शिमला को चुना।पूरे एक सप्ताह वहाँ रहकर वापस आये।
मन में शंका के विपरीत मनीष की माँ बिल्कुल देवी प्रतीत होती थी।किसी भी बात में कोई हस्तक्षेप नही।शांत और स्नेहिल व्यवहार था माँ का।मालती पर तो जान छिड़कती।इसी सुखद वातावरण में दिन व्यतीत होते जा रहे थे कि मालती गर्भवती हो गयी।मनीष और माँ खुशी से झूम उठे।माँ कह रही थी कि अब मैं दादी बन जाऊंगी।
पर मालती को अपनी माँ सुधा के साथ घटित घटना याद आ गयी,जब उनकी सास ने उन्हें पोता ही चाहिये कि हिदायत दी थी,पोता न होने पर कैसे माँ ने तिरष्कृत नजरो का सामना किया था और उनका मनोविज्ञान ही बिगड़ गया था,जिसे अपनी शादी तक उसने उपेक्षा झेली थी।अगर इस मां ने भी ऐसा किया तो?यही प्रश्न चिन्ह मालती को बेचैन भी करता और उदास भी रखता।
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अपनी व्यथा को मनीष से भी कैसे कहे?एक काल्पनिक डर उसके मन मे बैठ गया था।मनीष की सोच थी कि यदि मालती ऐसे ही उदास रही तो उसकी सेहत तो खराब होगी ही साथ ही उसके पेट मे पल रहे बच्चे पर भी दुष्प्रभाव पड़ेगा।उस दिन मनीष ऑफिस न जाकर मालती के पास ही घर रुक गया,मनीष ने सोच लिया था कि वह मालती के मन की गांठ को आज हर हालत में खोलने का प्रयत्न करेगा।
मनीष मालती के पास बैठ गया उसको रोते देख मनीष की आंखों में भी आंसू आने को थे।मालती के बालों को सहलाते हुए भावुक स्वर में मनीष बोला मालती तुम्हे मेरी कसम है आज तुम मुझे अपने मन के दुःख में मुझे भी शामिल कर लो।मालती ने फिर रोते रोते अपने चेहरे को मनीष की गोद मे छुपा लिया।मनीष की सांत्वना ढ़ाढस बधाने पर मालती ने अपने मन की व्यथा अपने काल्पनिक डर को मनीष के सामने उगल ही दिया।
मनीष कुछ कह पाता इतने में ही मनीष की माँ ने कमरे में आकर कहा वाह बेटी मुझे बिल्कुल पराया ही कर दिया।मेरी बच्ची इतने दिनों में तू अपनी इस मां को बिल्कुल भी ना समझी,मुझे सास ही समझती रही ना।मालती बेटी मेरी बच्ची अरे तू तो गृहलक्ष्मी है, अगर पोती आती है तो वो भी तो लक्ष्मी का पदापर्ण होगा।अपनी इस माँ के बारे में ये कैसी सोच बना कर बैठी थी।
माँ की बात सुन मालती को लग रहा था,बहुत समय से जमी बर्फ पिघल गयी है।चहुँ ओर मानो हरियाली छा गयी है।आज मनीष का सीना माँ की बातों से चौड़ा हो गया था और मालती उठकर मां की गोद मे समा गयी।
बालेश्वर गुप्ता, नोयडा
मौलिक एवं अप्रकाशित।