पश्चिम बंगाल का एक शहर, वहां रहने वाले चार दोस्तों में वहां के घने जंगल के आसपास पिकनिक पर जाने का प्लान बनाया। इस घने जंगल में बहुत सी हत्याएं हो चुकी थी और स्थानीय लोगों ने कई बार अजीबोगरीब, डरावनी चीजें महसूस की थी। कई बार आत्माओं की उपस्थिति का भी उन्हें आभास हुआ था। लेकिन बच्चों को जो काम ना करने के लिए कहा जाए, वे उसे जरूर करते हैं।
उज्जवल, आशीष, नेहा और प्रिया इन सब को घर वालों ने उन जंगलों में जाने से सख्त मना किया था। चारों बच्चे 12वीं पास करके कॉलेज में आ चुके थे और पिकनिक के नाम से बेहद उत्साहित थे।
चारों अपने-अपने बैग में खाने पीने का सामान और कपड़े लेकर निकल पड़े। चारों शहर के मुख्य चौराहे पर मिले और एक टैक्सी में बैठकर चल पड़े। जंगल से काफी पहले वे लोग टैक्सी से उतर गए और फिर पैदल चल पड़े। चलते चलते काफी दूर निकल गए। चारों तरफ सुनसान पहाड़ियां, घना जंगल और जंगल में पेड़ पौधों की सुंदरता निहारते निहारते वे लोग एक तालाब तक पहुंच गए।
तालाब के सामने एक झोपड़ी भी बनी हुई थी। पहले तो उन्हें जंगल में झोपड़ी देखकर आश्चर्य हुआ, पर जल्दी ही सब कुछ भूल कर झोपड़ी के दरवाजे पर अपने बैग रखकर तालाब के पानी में खेलने लगे। पानी में मस्ती करते करते कब दोपहर से शाम हो गई, उन्हें ध्यान भी ना रहा। सूरज डूबने वाला था और अंधेरा होने पर इस जंगल में रहना खतरे से खाली नहीं था। लेकिन अब वहां से निकलने का समय भी बीत चुका था इसीलिए चारों दोस्तों ने उसी झोपड़ी में रात भर रुकने का फैसला किया।
झोपड़ी में अंदर जाकर वे लोग उसे बड़े ध्यान से देख रहे थे। झोपड़ी की दीवारों पर जंगल के दृश्य और किसी औरत आदमी के चित्र बने हुए थे और एक कोने में सीढ़ी भी थी, जिसे देखकर वे चारों चकित थे।
उन्होंने सोचा पहले पेट पूजा कर लेते हैं और फिर सीढ़ी से छत पर जाकर जंगल का अद्भुत दृश्य देखेंगे। सबने अपने-अपने बैग खोलें और खाने-पीने की चीजें मिल बांट कर खाने लगे।
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उसके बाद चारों छत पर पहुंचे। छत की तीनों ओर की दीवारों पर एक एक बड़ा सा सुंदर सा शीशा लगा था और छत से बिल्कुल शांत नीरव आसमान डरावना लग रहा था। चमगादड़ और झींगुर डरावनी आवाजें कर रहे थे।
चारों सिहर उठे और नीचे जाने लगे, तभी उनके पीछे की ओर से एक अत्यंत मधुर आवाज सुनाई दी, “रुको बच्चों।”
आवाज सुनकर चारों की घिग्घी बंध गई।वे सोचने लगे कि हमारे अलावा तो छत पर कोई नहीं था तो यह आवाज किसकी है? चारों ने एक-दूसरे का हाथ कस कर पकड़ लिया और बहुत हिम्मत करके आवाज की तरफ मुड़े।
उन्होंने देखा कि शीशे में से तेज रोशनी निकल रखी है और फिर रोशनी धीरे-धीरे कम हुई तो उन्हें सामने एक सुंदर औरत खड़ी हुई दिखाई दी। फिर उन्हें याद आया कि इसी औरत की तस्वीर झोपड़ी की दीवार पर बनी हुई है। चारों बच्चों का पसीना छूट रहा था।
औरत ने कहा-“प्रिया, यहां आओ मेरे पास।”बच्चे हैरान थे कि इसे नाम कैसे पता लगा? प्रिया अपने में गुम उस औरत की तरफ बढ़ने लगी। बच्चों ने उससे चिल्ला चिल्ला कर कहा-“प्रिया, उसकी तरफ मत जाओ, लेकिन जब उसने नहीं सुना, तब जोर से उसके हाथ को झटका और वह रुक गई। यह देखकर उस औरत को गुस्सा आ गया और उसने अपनी आंखों की शक्ति से ऐसा प्रभाव डाला कि चारों बच्चे उस शीशे में समा गए और वह औरत डरावनी चुड़ैल बन गई।
चारों ने वापस भागने की कोशिश की लेकिन शीशे वाला रास्ता बंद हो चुका था। चारों आगे की तरफ भागने लगे।
3 बच्चे आगे भाग गए लेकिन प्रिया चुड़ैल के हाथ आ गई और चुड़ैल ने एक खंजर से बड़ी बेरहमी से प्रिया की गर्दन पर वार किया और वह वहीं गिर गई। बच्चे डर के मारे थरथर कांप रहे थे।
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आगे भागते भागते उन्हें एक आदमी दिखाई दिया। उन्होंने पुकारा-“अंकल हमें बचाओ, हमारी मदद करो।”वह आदमी जैसे ही पलटा तो बच्चे और ज्यादा डर गए क्योंकि वह आदमी वही था जिसका चित्र झोपड़ी की दीवार पर बना हुआ था। मैं आदमी जोर जोर से हंसता हुआ बच्चों के पीछे भागने लगा और बच्चों ने देखा कि उसकी आंखें ऐसी थी मानो आंखों के स्थान पर दो दहकते हुए अंगारे रखे हो।
उसने आशीष को घूर कर देखा तो दो आग के शोले आशीष की तरफ आए और उसके पेट में समा गए, आशीष वहीं पर गिरकर तड़पने लगा।
उज्जवल और नेहा यह सब देखकर डर के मारे रोने लगे और खुद को बचाने के लिए लगातार भागते रहे। भागते भागते उज्जवल गिर पड़ा और उस आदमी ने उज्जवल को पकड़ लिया। उसने उसने पैरों से बांधकर पेड़ पर उल्टा लटका दिया और उसके शरीर पर अपने नाखूनों से वार करने लगा। वह उज्जवल का मांस नोच रहा था।
इतना भयानक दृश्य नेहा बर्दाश्त नहीं कर पाई और अंधाधुंध भागने लगी। भागते भागते वह एक गहरे कुएं में गिर गई। उसके गिरते ही उस कुएं में रहने वाले सांपों ने उसे लपेट लिया।
भयानक रात बीत चुकी थी और सुबह की पहली किरण धरती पर उतर चुकी थी।
आधे घंटे बाद जब धूप की गर्मी ने शरीर को से लाया तब सबसे पहले नेहा की आंख खुली। रात वाली घटना याद आते ही वह रोने लगी और उसे लगा कि उसके सारे दोस्त मर चुके हैं। उसे इतना भी ध्यान नहीं रहा कि वे तीनों उसके पास ही ढेर पड़े हैं।
उसके रोने की आवाज से उज्जवल उठा और उसने आशीष और प्रिया के चेहरे पर पानी छिड़क कर उन्हें भी उठाया।
चारों उठकर आंखें मलमल कर एक दूसरे को प्रश्न भरी निगाहों से देख रहे थे। प्रिया अपने गले को छूकर देख रही थी।
आशीष अपने पेट पर हाथ घुमा रहा था। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
फिर उन्होंने चारों तरफ नजर घुमाई, तो उन्हें वहीं तालाब दिखाई दिया लेकिन झोपड़ी कहीं नजर नहीं आई।
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किसी में भी दोबारा तालाब तक जाने की हिम्मत नहीं थी। चारों ने अपने बैग उठाए और सिर पर पैर रखकर वहां से भागे ताकि सूर्यास्त से पहले अपने अपने घर सही सलामत पहुंच जाएं।
आज बहुत वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें यह समझ नहीं आया है कि वह सब क्या था? वह हकीकत थी या सपना। यदि वह सच था,तो वे लोग बच कैसे गए? उन्हें यह पिकनिक जीवन भर याद रहेगी।
(दोस्तों, मैंने अपनी पांचों कहानियों में पांच भाव, पांच रस, दर्द, खुशी, हंसना, सबक और डर सब से आपका मनोरंजन करने का प्रयास किया है आशा है आपको मेरी पांचों कहानियां पसंद आई होंगी)
#5वां_जन्मोत्सव
धन्यवाद गीता वाधवानी दिल्ली