पसंद बेटे की तो सजा बहू को क्यो ? – संगीता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

उसके विनम्र स्वभाव ने सबका दिल जीत लिया था। वो थी भी तो कितनी प्यारी जो उससे एक बार मिल ले उसका होकर रह जाता था हमेशा चहकती रहती थी मजाल है जो उसके चेहरे पर शिकन भी नजर आए। पर आज कैसे शांत पड़ी थी अस्पताल के बेड पर। बाहर घर वालों के साथ साथ पड़ोसियों का भी मजमा लगा था। सब दुआ मांग रहे थे उसके लिए कि वो जल्दी से ठीक हो जाए।

आप सोच रहे होंगे कौन है वो जिसके बारे में मैं इतनी बातें कर रही हूं और उसमे ऐसा क्या है कि घर वालों के साथ सारे पड़ोसी भी उसके लिए दुआ कर रहे है।

तो आइए मिलते हैं मेरी कहानी की नायिका मुस्कान से…

अपने नाम के अनुरूप जिसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी गरीब परिवार की लड़की अमीर घर में बहू बनकर आती है तो कितना कुछ सहना पड़ता है उसे यही मुस्कान के साथ हुआ। एक फंक्शन में घर के बेटे अभिषेक ने मुस्कान को देखा और उस पर फिदा हो गया उसने अपने घर वालो से साफ बोल दिया शादी करूंगा तो इसी से वरना किसी से नहीं।

अब घर का लाडला बेटा कुछ मांगे और वो ना मिले ऐसा मुमकिन ही नहीं। मुस्कान के घर परिवार का पता लगा रिश्ता भेज दिया गया। हालाकि मुस्कान के पापा आशंकित थे इतने बड़े घर से रिश्ता आने पर पर सबकी सलाह पर हामी भर दी और मुस्कान ढेरों सपने लिए आ गई अभिषेक की दुल्हन बन।

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यहां इच्छा घर के बेटे की थी मुस्कान से शादी करने की पर सजा भुगतनी पड़ी मुस्कान को वो भी उस गलती की जिसके बारे में पता तक नहीं था उसे। फिर भी मुस्कान अपने चेहरे पर मुस्कान सजाए सबका दिल जीतने में लगी थी।

” बहू ये कैसे कपड़े पहने हैं तुम्हारे गरीब खानदान में ये चलते होंगे हमारे यहां नहीं जाओ बदलो इन्हे !” सास अक्सर ताना देती फिर भी मुस्कान बिना ना नुकुर किए चुपचाप कपड़े बदल आती।

” भाभी ये कैसी सब्जी बनाई है तेल आ रहा ऊपर आपके घर में ऐसी सब्जी खाई जाती होगी हमारे घर में ये अनहैल्दी खाना कोई ना खाए!” ननद अक्सर बात बनाती।

” अभी ठीक करके लाती हूं दीदी ” मुस्कान मुस्कुराते हुए कहती। फिर भले ही उसे चम्मच से चला तेल मिला कर ले आती मुस्कान और सब खा भी लेते पर ननद के चेहरे पर विजयी हंसी उभर आती मानो भाभी को नीचा दिखा जंग जीत ली हो उसने ।

” यूं अडोस पड़ोस में खड़े हो बतियाना बड़े घर की बहुओ को शोभा नहीं देता!” ससुर जब भी किसी से बात करते देखते तो बोलते।

” जी पापा जी आगे से ऐसा नहीं होगा !” वो सिर झुका के बोलती।

जाने क्यों सबको मुस्कान को नीचा दिखा एक आत्मसंतुष्टि मिलती और मुस्कान बेचारी उनके बेटे और भाई की पसंद होने की कीमत चुकाए जा रही थी। बिन शिकायत किए बिन थके इस आस से कि एक दिन तो सबका दिल जीत लेगी वो।

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” क्यों सहती हो भाभी आप इतना सब भैया से शिकायत क्यो नही करती हो क्यो चुप रहती हो  !” अक्सर उसकी हमदर्द कामवाली रमिया बोल जाती उसे।

” रमिया ये सब मेरे अपने ही तो हैं इनकी क्या शिकायत करूँ वैसे भी शिकायत करके होगा क्या अभिषेक जी ने कहीं अलग होने का ऐलान कर दिया तो परिवार तोड़ने का धब्बा भी लग जायेगा मुझपर। अगर उन्हें ऐसा कर खुशी मिल रही तो होने दो खुश वैसे भी गरीब की बेटी की डोली जब उठती है तो उसे यही कहा जाता है अब तेरा ससुराल ही तेरा सब कुछ है तो बता क्या कर सकती है एक बेटी !” मुस्कान यहां भी मुस्कुरा देती।

पड़ोसी , घर के काम वाले और अभिषेक सब उसकी सादगी अच्छाई और मुस्कुराहट के कायल हो गए थे पर बाकी घर वालों के दिलों को जीतना मानो पहाड़ तोड़ने से भी मुश्किल था।

हां मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं क्योंकि सबके दिलों में जमी सर्द बर्फ पिघलने और नफरत की दीवार गिरने का वक़्त आ चुका था शायद।

” अरे ये दीदी के कमरे से धुआं कैसे निकल रहा है!” अचानक एक रात मुस्कान ननद के कमरे से धुआं निकलते देख खुद से बोली क्योकि उस वक्त घर मे सिर्फ वो और उसकी ननद ही थे ।

किसी तरह घरेलू सहायक की मदद से कमरे का दरवाजा तोड़ मुस्कान अंदर आईं तो देखा ननद के बिस्तर पर आग लगी है और ननद नीचे बेहोश पड़ी है । नौकर की तो हिम्मत नही हुई अंदर आने की वो तो मदद के लिए चिल्लाता बाहर भागा। किसी तरह मुस्कान ही उसे कमरे से बाहर निकालने की कोशिश करने लगी

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इस बीच खुद की साड़ी ने आग पकड़ ली। पर उसकी परवाह किए बिना बाहर ले आई ननद को। और आग बुझाने की जद्दोजहद में खुद चपेट में आ गई आग की। वो तो गनीमत थी घरेलू सहायक माली को बुला लाया उसने सबको फोन भी कर दिया था । वो दोनो आग बुझाने मे जुट गये इतने कुछ पड़ोसी भी आ गये।

सब घरवालों के आने पर उसे और ननद को अस्पताल लाया गया क्योंकि तब तक आग तो बुझ गई थी । 

ननद ने शर्मिंदा हो अपनी गलती बताई कि वो छिप कर सिगरेट पी रही थी जाने कैसे जलती सिगरेट छोड़ सो गई और उसी सिगरेट ने आग का रूप ले लिया उसके बाद उसे कुछ नही पता। अगर मुस्कान दिलेरी ना दिखाती तो आज घर की बेटी के साथ घर से भी हाथ धोना पड़ सकता था।

सब शर्मिंदा थे कितना सुनाया मुस्कान को सबने और वहीं आज घर और घर की बेटी दोनों को बचा ली थी। नफ़रत की दीवार अब टूट गई थी और सब दुआ मांग रहे थे बहू के होश में आने की।

सबकी दुआएं शायद रंग लाई या उसकी मासूमियत से ईश्वर भी पिघल गया जो मौत के मुंह से वापिस आ गई वो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ ।

” भाभी मुझे माफ़ कर दो मेरे कारण आज आपकी जान पर बन आई !” ननद भाभी के गले लग रो दी।

” हां बहू हमे भी माफ़ के दो जो तुम्हे छोटे घर का ताना देते थे वास्तव में तो तुमसे अमीर कोई नहीं जिसके मन में कोई द्वेष नहीं तुम्हारी मुस्कान सा निर्मल ही तुम्हारा हृदय है !” सास सिर पर हाथ फेरते हुए बोली।

मुस्कान मुस्कुरा दी आखिर आज ही तो सही मायने में सबने उसे अपनाया था। पत्नी तो को बन गई थी पर बहू और भाभी तो आज बनी है क्योंकि आज ही तो उसने सबके दिलों पर जीत हासिल की है।

कहानी की हैप्पी एंडिंग हुई पर कुछ सवाल छोड़ गई।

पसंद बेटे की तो सजा बहू को क्यों?

गरीब घर की लड़की को लाना ही क्यों जब अपनाना नहीं?

क्या कोई अग्नि परीक्षा देकर ही गरीब की बेटी अपनी जगह बना सकती अमीर ससुराल में ?

क्या आपके पास है इन सवालों के जवाब ?

आपकी दोस्त 

संगीता अग्रवाल

#नफरत की दीवार

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