राधा…. ओ राधा। अरी कहां है सारा दिन मौहल्ले के बच्चों के साथ धमा-चौकड़ी मचाती फिरती है। पिता का स्वर सुनकर 13 बर्ष की राधा को घर के भीतर आना ही पड़ा। “अरी ब्याह की उम्र हो चली है तेरी अगले माह लगन है”। पास-पड़ोस के लोग ताने मारने लगे हैं , लड़की घर में बैठा रखी है लक्षण बिगडते जा रहे हैं। नाक में दम करे रहती है ‘माँ के पास बैठ कुछ सीख ले घर गृहस्थी के काम…अरी ओ राधा की माँ….. संभाल इसे ।
मासूम राधा समझ नहीं पाती आखिर ये सब रोक-टोक। मांँ का बार बार उसके सर पर दुपट्टा चढ़ा देना “हजार बार कहा सर ढक कर रखा कर बदनामी करा कर रखेगी हमारी”। समझ नहीं पाता उसका बालमन आखिर इन बड़ों की दुनिया इतनी विरान क्यों है?
कल्पना की सुन्दरता से बढ़कर कोई सुन्दरता नहीं है।और छोटी उम्र एक तरह से कल्पना का प्रर्याय ही है।सही गलत की परवाह बग़ैर अपनी ही मस्ती में जीवन जीना, अपनी ही कल्पनाओं में रहना ही बचपन है। बचपन जो है ना वो सदा दिल की सुनता है ना कि दिमाग की ।
माना की नवजात शिशु का परिवार में आना माता पिता को तनाव से राहत महसूस करा ही देता है ।उनको लगने लगता है, सभी समस्याएं और तनाव अब खत्म हो गये हैं मगर इसके विपरित कुछ ही घंटों में महसूस करने लगते हैं कि समस्याओं और तनाव का नया दौर चालू हो गया है। उनकी गतिविधियों के अनुसार सभी कार्यक्रम पुनर्गठित किये जाने लगते हैं बालक के रोने,सोने सभी का आनंद लेते माता-पिता धीरे-धीरे अनेक समस्याओं का सामना करने लगते हैं।
कुछ रूढ़िवादी परिवार जहां 12,13 बर्ष की बेटियां हुई नहीं माता पिता की नींद हराम होकर रह जाती है। यह वह परिवार जिनके इलाकों में लड़की से अपनी इज्जत जोड़ कर चलने वाले परिवारों होते हैं । इनका यह सोचना कि किशोर अवस्था के बाद लड़की गलत रास्ते पर न चली जाए उनके लिए शादी कर देना ही एकमात्र विकल्प रहता है।
ऐसे में बालमन यह कहां समझ पाता है। उनमें तो एक अनोखी मासूमियत होती है। जैसे जैसे वो बड़े होते जाते हैं उनकी मासूमियत उनके सवालों और शरारतों में इलकने लगती है। एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार को लगने लगता है, बच्चीं बड़ी हो गई है भले ही परिजनों का दिमाग कहता रहता हो बच्चे जल्दी बड़े हो जाएं …लेकिन दिल हमेशा यही कहता होगा वो सदैव छोटे मासूम ही बनें रहें।
बचपन में दिए गये संस्कार मूल स्वभाव बन जाते हैं बड़े होने पर माता पिता को प्रसन्नता होती है।उनका मानना बच्चों के यही संस्कार उनको समाज में इज्जत दिलाते हैं। वो अपने कायदे कानून में बच्चों को परिभाषित करना चाहते हैं और यह भूल जाते हैं जिनके लिए हमारी हंसी तक गायब हो जाती है …वही आपने बालपन में आनन्द से खिलखिलाते नजर आते हैं और कभी- कभी बिना कारण ही खुशी महसूस करते रहते हैं।
बाल मन की उधेड़बुन….. आखिरी वो समय आ ही गया राधा का विवाह निकट गाँव के गिरधर लाल से कर दिया गया 13 बर्ष की राधा 30 की उम्र का गिरधर लाल, राधा का परिवार एक ऐसा परिवार जहां बेटियों की शादी अपने आर्थिक बोझ को कम करने,आय अर्जित करने के लिए की जाती है जहां उनको लगता है इससे उनकी बेटियों का भविष्य सुरक्षित होगा। उनकी रक्षा होगी। जबकि उनका ऐसा करना लड़कियों का उनका बचपन छीनना खुशहाली को खतरे में डालना है।
राधा के विवाह को एक बर्ष भी नहीं हुआ गर्भावस्था की अवस्था की अवस्था में पहुंच गई इस दौरान कम उम्र की जटिलताओं का जोखिम बढता गया। जोखिम शारीरिक के साथ उसका मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालने लगा। वो जिम्मेदारियां जिनके लिए वह तत्पर नहीं थी उससे पूरे परिवार की देखभाल की उम्मीद की जाने लगी । वो राधा जिससे सीखने खेलने की आजादी पहले ही छीन ली गई थी ।
माता पिता अनजाने में बच्ची के लिए जीवन भर का उत्पीडन झेलने पर उसे मजबूर कर देते हैं जिससे शिशु मृत्यु दर में तेजी देखने को मिलती हैं। जिसका सबसे बड़ा कारण अशिक्षा ही है। इसको दूर किया जायेगा तो आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और समाज से ऐसे दुष्कर्म स्वयं ही दूर हो जायेंगे आज जरूरत है बेहतर सीखने और बेहतर करने की ।
छोटी उम्र में विवाह अधिकार के हनन से कम नहीं है। कभी कभी परम्परा वश, लड़की का जन्म हुआ नहीं कि उसे तुरंत ही दूर की सम्पत्ति मान लिया जाता है। वो अशिक्षित होने के कारण समाज में होती घटनाओं को ठीक से समझने में असक्षम रह जाती है।
आज राधा मृत्यु शय्या पर पड़ी जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष करती,एक बेजान सी जिंदगी जीने पर मजबूर जिसका मन कभी आत्मनिर्भर होने के लिए जल्दी बड़ा होना चाहता था ।उसकी अपनी कोई बनाई धारणा नहीं रही उसे तो जिस सांचे में ढाला गया वो ढलती चली गई। उसकी तो सोचसमझ भी परिपक्व नहीं हुई थी ।
उसी को बचपन के सपने बेगाने से लगने लगे उसके होंठों की थरथराहट,दिलों दिमाग की कशमकश, आंखों के बादल सभी एक साथ थिरकते उसके स्वरों में उतर आये थे….. ।उसका दिल चीत्कार र उठा … . .”पापा अपनी निगाहों में ,ममता की बांहों में कुछ दिन और विश्राम करने देते” ।
दुनिया दारी से अनजान राधा का मन समझ नहीं पाता आखिर उसकी की दुनिया में विरानी क्यों है दिल के किसी कोने से आवाज आई ….
“पापा मैं छोटी से बड़ी हो गई क्यूं” !!!!!
डॉ बीना कुण्डलिया