*नीयत* –  मुकुन्द लाल

 ‘राम नाम सत्य है’ कहता हुआ कंँधों पर अर्थी उठाये कुछ लोगों का झुंड अचानक श्मशान घाट जाने वाले मार्ग पर न जाकर उस बाजार के एक व्यवसायी की दुकान के पास ठहर गया तो दुकानदारों को हैरत का ठिकाना नहीं रहा।

 लोग इस अजीब कारनामों को देखने के लिए वहांँ पर इकट्ठे होने लगे, यह कहते हुए ‘ क्या बात है?’ यह अर्थी हजारी सेठ की दुकान के पास? सभी के दिलों में यह सवाल शोला बनकर दहक रहा था। झुंड ने अर्थी को दुकान के ओटा पर रख दिया, फिर उस झुंड के सभी लोग वहीं धरने पर बैठ गए। सभी समवेत स्वर में कह रहे थे, ” राम नाम सत्य है.. राम नाम सत्य है..”

 पहले तो हजारी इस अप्रत्याशित कार्यकलाप को कुछ क्षण तक देखता रहा। वह यह कहने के लिए सोच ही रहा था कि यहाँ क्यों अर्थी रख दी है? क्या मेरी दुकान श्मशानघाट है? हटाओ यहांँ से किन्तु उसके यहांँ काम करने वाले नौकर भगीरथ के पुत्र मनीष पर नजर पड़ते ही उसके चेहरे पर हवाइयांँ उड़ने लगी, जाड़े के मौसम में भी उसके ललाट पर पसीने की बूंँदें चुह-चुहा आई।

 मनीष बचपन से ही देखता आ रहा था कि उसका बापू सुबह बासी रोटी और चाय का नास्ता करके हजारी सेठ के यहाँ नौकरी पर चला जाता था, जो रात्रि में ही घर लौटता था।

 मनीष युवा अवस्था में पहुंँच गया था, वहीं भगीरथ बूढ़ा हो गया था। बुढ़ापे के सारे लक्षण उसमें प्रकट हो गए थे। दसकों की कड़ी मेहनत ने उसके जीवन-रस को निचोड़ लिया था।




 नौकरी करने के दौरान वह अपने वेतन से कुछ रुपये प्रत्येक माह में कटौती करवा देता था अपनी बेटी की शादी करने की नीयत से। कटौती की गई राशि सेठ के यहाँ ही जमा हो रही थी। मनीष भी इस बात से अवगत था।

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 उस दिन ड्यूटी से लौटने के बाद वह बीमार पड़ गया। उचित इलाज के अभाव में उसकी अचानक मृत्यु हो गई।

 जब मनीष ने दाह-संस्कार व श्राद्ध करने के लिए सेठ से कटौती की गई राशि की मांग की तो वह आग-बबूला हो गया परन्तु मौके की नजाकत को देखते हुए उसने अपने को संयत करने के उपरांत बेरूखी से कहा कि उसके बापू का उसके पास पैसा-वैसा जमा नहीं है। मनीष ने लाख सफाई दी, उसे समझाया किन्तु वह उसकी बातें मानने से साफ इनकार कर दिया। मनीष के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उसकी नीयत को समझते उसे देर नहीं लगी।

 बाजार के दो-चार जिम्मेदार और प्रतिष्ठित व्यवसायियों को वस्तु-स्थिति समझ में आ गई थी। हजारी के आचरण से वे लोग पहले से वाकिफ थे। उनमें से एक दुकानदार ने कड़ा रूख अपनाते हुए कहा, ” भगीरथ का पैसा आपके पास जमा नहीं रहता तो क्यों वह शोक और मातम के दुखद माहौल में अपने पिता की लाश लेकर अपने साथियों और मोहल्लेवालों को साथ लेकर धरना देता, शर्म करो!.. जिस पैसे के लिए झूठ का सहारा ले रहे हो वह भी तुम्हारे साथ नहीं जाएगा, यहीं धरा रह जाएगा। जरा भी हया-शरम बचा है तो उसके बापू द्वारा जमा की गई राशि उसे तुरंत दे दो।




 इसके अलावा और कई लोगों ने जब भला-बुरा कहा तो उसने धीमी आवाज में कहा, ” हम क्या करें!.. जिस काॅपी में उसका हिसाब-किताब लिखा हुआ था वह मिल ही नहीं रहा है..”

 भीड़ में से एक ने कहा, ” खोजिए!.. और मामला का निबटारा कीजिए.. यह कितने शर्म की बात है, ऐसी घटना बाजार के लिए कलंक है।”

 उसने थोड़ी देर तक काॅपी खोजने का नाटक किया, फिर लोगों को काॅपी दिखाया, जिसमें मृतक के नाम पर कटौती की गई राशि दर्ज थी। उसके हिसाब को मनीष ने भी सही ठहराया।

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 इतनी जिल्लत सहने के बाद हजारी ने उसके पिता के खून-पसीने की कमाई को उसके हकदार को लौटा दिया।

 मनीष ने बीच बाजार में लोगों के सामने कहा,

“इस आदमी की नीयत में खोट आने के कारण दाह-संस्कार की लकड़ी और कफन तक मुझे उधार लेना पङा लेकिन उधार को चुकता करने के बाद ही दाह-संस्कार करूंँगा, यह मेरे बापू के सम्मान की बात है।”

  स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित

                मुकुन्द लाल

               हजारीबाग (झारखंड)

 

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