नासमझ अन्याय – सुनीता मिश्रा

“माँ, दीदी के लिये इतने सुन्दर झुमके, मैं कब से  अपने लिये छोटे से टॉप्स माँग रहीं हूँ , आपने कभी ध्यान ही नहीं दिया।”

“मझली, देख बेटा वो कितने दिन की हैं इस घर में, ब्याह हो जायेगा, चली जायेगी ससुराल। वहाँ कैसे लोग मिलते, उसकी इच्छा पूरी करते की नहीं। माँ -बाप के घर ही अरमान पूरे कर लेने दे उसे।”

चुप हो गई मैं यानि मझली। माँ ठीक ही कहती है। मेरा क्या, बाद में लें लूँगी टॉप्स। जब तक और नई फैशन के भी आ जायेंगे।

“माँ, मैं कॉलेज जा  रहीं हूँ।”

“अरे. मझली सुन तो, देख छोटी जाने कौन से स्टाइल से बाल बंधवाना चाहती है, भई हमसे नहीं बनती ऐसी चोटी । तू कर दे इसकी चोटी, कैसे रो रो के हल्कान हों रही है।”

अपनी किताबें टेबल पर रख दीं। कॉलेज का पहला घंटा,होम साइंस का क्लास तो हो गया मिस।

ये आज की बात नहीं है। बचपन से भुगत रहीं हूँ। अगर मैं बड़ी दी, और छोटी के बीच की हूँ, तो मेरा कोई कसूर ? वो बड़ी है तो उसकी बात मानो और वह छोटी है तो उसकी ज़िद मानो। क्या दी इसकी चोटी नहीं कर सकती? नहीं, वो तो मेहमान है, उसे ससुराल जाना है, सारे सुख मायके में ही भोग ले। इसके मतलब सारा त्याग मझली के हिस्से में। मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं।

हे भगवान कोई बच्चा मझला न हो। बड़ा हो या छोटा हो।

पहला बच्चा होने के कारण दीदी, घर भर की जान, मैं दूसरी, वो भी लड़की, कोसा तो किसी नें नहीं मुझे, आज़ाद विचारों के लोग हैं घर में, लड़का, लड़की में भेदभाव नहीं रखते। स्वागत मेरा भी हुआ पर मेरे पीछे पीछे छुटकी चली आई, पता नहीं क्या जल्दी थी उसे।

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मैं सवा साल की ही तो थी।

बस तबसे मझली बन कर रह गई।

ऐसा नहीं कि मुझे घर में प्यार न मिलता हो। पर मैं महसूस करती कि मेरे हिस्से का प्यार बड़ी और छोटी हड़प रहीं हैं।

दीदी की उतरन मेरे हिस्से आती । कपड़े जूते, बस्ता, किताबें सब दीदी का यूज़ किया सामान मेरे नसीब में। जब नये कपड़ों के लिये मचलती, माँ मुझे दुलराती, प्यार करती, कहती “मेरी बिट्टो रानी , कितनी सुन्दर फ्रॉक , गुलाब के फूल बने हैं, तेरी दीदी की नई फ्रॉक में हैं क्या ऐसे फूल?”

मैं भोली खुश हो जाती। क्या हुआ फ्रॉक दीदी की है। नई सी तो लगती है। खुश हो पहिन लेती, माँ मेरी समझदारी के गुण गाती।

माँ दूध के तीन गिलास तैयार करती। पूरा गिलास का दूध ख़त्म करना दीदी के लिये जरूरी था,डॉ की हिदायत थी। छोटी को दूध बहुत पसंद था, अपने गिलास का दूध पूरा गटकने के बाद और दूध के लिये मचल जाती फिर वही होता, जो हमेशा हर बात पर होता आया है,मैं अपना गिलास उसे पकड़ा देती, पकड़ा क्या देती, देना ही पड़ता।

धीरे धीरे  दो वाक्य मेरे जीवन से जोंक कि तरह चिपक गये, पहला -वो बड़ी है न।दूसरा, वो छोटी है न।

इन वाक्यों ने मेरा जीवन दूभर कर दिया।कुंठा पसर गई मन में। इस घर में मेरा कोई अस्तित्व नहीं। घर के भीतर ही क्या, घर के बाहर भी मैं बड़ी और छोटी के बीच बौनी ही रहती।

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कुंठा का आकार यूँ विकसित हुआ कि घर में किसी को कानोकान खबर न लगी। जैसा चलता था वैसा ही चलता रहा। बड़ी, छोटी के बीच मैं उसी तरह पिसती रही। कब मेरी आवाज़ बंद हो गई, कब मैं हँसना भूल गई, मुझे ख़ुद याद नहीं। मौन और कुंठा दो विश्वस्त दोस्त बन गये मेरे।

फिर एक दोस्त और मिला विद्रोह।घर में अपने प्रति होने वाले अन्याय के प्रतिरोध में विद्रोह की डगर पकड़ ली मैंने। मनमानी करना, माँ कि बातों कि अनसुनी करना, बात बेबात छोटी को डाँटना,जो काम कहा जाय उसके विपरीत करना। नतीजा,माँ का बी पी  हरदम बढ़ा रहता, घर की अशांति से वे बीमार रहने लगी। मेरा इरादा माँ को परेशान करने का कतई नहीं था। मैं चाहती थी, मेरे इस अप्रत्याशित आचरण से वे चेत  जाय, पर ऐसा हुआ नहीं।

मेरे भीतर का कुहासा और गहरा होने लगा। मैं,अपने को नितांत अकेली पाती, कोई भी मुझे प्यार नहीं करता। इस घर की अनेक बेकार चीजों में मैं भी एक हूँ। बैचेनी सी रहने लगी। हताशा हावी हो गई मन पर।अवसाद ने घेर लिया।

इसी अवसाद के रहते, कभी मन डूबता, कभी विद्रोही हो जाता। विचार, दिमाग़, दृष्टि, व्यवहार सब असंतुलित हो जाते।



अपने कॉलेज के एनुअल फंक्शन में पहनने के लिये दीदी सिल्क की साड़ी लाई थी, पिंक कलर की।मैं वही साड़ी पहिन कर अपने कॉलेज चली गई। जब मैं कॉलेज से लौटी तो माँ का रौद्र रूप देखा, दीदी की आँखें रो रो कर सूजी हुईं थी। मुझे देखते ही माँ ने मेरे गाल पर जोर से थप्पड़ मारा। हतप्रभ हो गई। मेरे छोटे से अपराध पर इतना बड़ा अपमान। थप्पड़ सीधा दिल पर लगा।क्या घर पर और अच्छी साड़ीयाँ नहीं थीं। दीदी उन्हें पहिन सकती थी?मेरा इतना भी हक नहीं इस घर पर?

मन कसैला हो गया। कोरे कागज पर जाने क्या -क्या लिख कर काटती रही। फिर एक लाइन लिखी’ ऐसी बेगैरत ज़िन्दगी से मरना अच्छा ‘साड़ी चेंज की साड़ी को तह किया और तह के बीच जाने कब कैसे वह  कागज़ भी चला गया । साड़ी दीदी की अलमारी में रख आई।

घर में सब लोग सामान्य थे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मेरा घायल मन तड़प रहा था, आँखें रो रहीं थी, बिना खाना खाये मैं अपने कमरे में चली गई, बिस्तर पर पड़ी रोती रही —रोती रही।

कब मेरी आँख लगी पता नहीं। कोई दरवाजा पीट रहा था।ऑंखें खोली तो सूरज की किरणे कमरे में उजाला फैला रहीं थी।

उठकर जैसे ही दरवाजा खोला, माँ मुझसे लिपट गईं, कसकर बाँहों में भर लिया मुझे, उनके आँसुओं से मेरा कन्धा भीग गया “मुझे माफ कर दे बिट्टो।”बिट्टो, जाने कितने सालों बाद ये शब्द बोला उन्होंने।”अगर मैंने तेरे साथ अन्याय किया हो तो। तूने ऐसा सोचा भी कैसे। माँ के लिये तो उसके सब बच्चे बराबर होतें हैं। फिर भी तू मुझे अपराधी समझे तो मुझे सजा दे,अपने को मत दे।” माँ रोती जा रही थी और जाने क्या -क्या बोलती जा रही थी। मैंने उनके हाथों में वह कागज़ देखा। दीदी और छोटी मेरे गले मे अपनी,अपनी बाँहें डाले मुझसे चिपकी रो रहीं थीं।हम चारों के आँसूओं की गंगा में मेरा नासमझ अन्याय बह रहा था।

सुनीता मिश्रा

भोपाल

 

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