नीति की शादी को कुछ ही समय हुआ था, और जब वह इस घर में आई थी, तो उसने सोचा था कि परिवार के हर सदस्य का ख्याल रखना और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना उसके लिए एक नया जीवनसुख होगा। घर में नीति का स्वागत बड़े ही प्रेम से किया गया, और खासकर उसकी जेठानी पल्लवी से उसका अच्छा लगाव बन गया। पल्लवी का व्यवहार नीति के प्रति शुरुआत में बहुत ही स्नेहमयी और आत्मीय था। घर में कोई सास नहीं थी, इसलिए पल्लवी ही जेठानी के साथ-साथ नीति के लिए सास और बड़ी बहन जैसी थी।
पल्लवी के दो छोटे बच्चे थे, जो जल्द ही अपनी चाची से घुल-मिल गए थे। पल्लवी ने नीति को मुस्कुराते हुए कहा था, “नीति, अब तुम आ गई हो, अब इन शैतानों को तुम ही संभालो। घर की बाकी जिम्मेदारी मेरी। वैसे भी तुम पढ़ी-लिखी हो, बच्चों को अच्छे से पढ़ा भी सकोगी।” नीति ने भी दिल से अपनी जेठानी की बात मान ली और पल्लवी के बच्चों की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। नीति ने इस नई भूमिका को खुशी-खुशी निभाया और उसे यह देखकर अच्छा लगा कि बच्चे भी उसे अपनी माँ से कम नहीं मानते।
धीरे-धीरे पल्लवी ने घर की कुछ और जिम्मेदारियाँ भी नीति के कंधों पर डाल दीं, जैसे कि रसोई का काम, घर की सफाई, बच्चों को स्कूल भेजना और अन्य घर के काम। नीति ने इन सब जिम्मेदारियों को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। उसने कभी भी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह इन कामों से थक गई है।
समय बीतता गया, और एक साल बाद नीति गर्भवती हो गई। गर्भवस्था के दौरान भी उसने अपने कर्तव्यों में कोई कमी नहीं की। वह घर के सभी काम करती रही, चाहे अपनी सेहत का ख्याल रखना जरूरी था, लेकिन उसने घर और बच्चों की जिम्मेदारियों से खुद को दूर नहीं किया। यहां तक कि जब पल्लवी बीमार पड़ी, तो नीति ने उसकी सेवा में दिन-रात एक कर दिया। उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि उसकी जेठानी का कोई अलग दर्जा है; उसने उसे अपनी बड़ी बहन की तरह माना और उसके लिए वह सब किया, जो एक छोटी बहन कर सकती है।
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जब नीति का बच्चा पैदा हुआ, तो डॉक्टरों ने ऑपरेशन के जरिए डिलीवरी की। इसके कारण नीति का स्वास्थ्य थोड़ा कमजोर हो गया था और उसे कुछ आराम की जरूरत थी। पल्लवी ने इस स्थिति को समझते हुए नीति को उसके मायके भेज दिया, ताकि वह वहां आराम कर सके। हालाँकि, नीति को यह थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उसने सोचा था कि उसका परिवार, खासकर पल्लवी, उसकी देखभाल करेगी। लेकिन उसने इस बात को दिल पर नहीं लिया, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण पल्लवी को अतिरिक्त बोझ महसूस हो।
जब डेढ़ महीने बाद नीति अपने ससुराल लौटी, तो उसे अपनी पुरानी दिनचर्या को फिर से अपनाने में थोड़ी कठिनाई महसूस हुई। अब उसकी प्राथमिकता उसका बच्चा था, जिसे समय पर देखभाल और प्यार की जरूरत थी। पल्लवी के बच्चे अब भी नीति के पास आते थे और वह उन्हें पढ़ाती भी थी, लेकिन पहले जैसी देखभाल और समय देना उसके लिए मुश्किल था। यह बदलाव पल्लवी के बच्चों को भी खलने लगा था, क्योंकि वे पहले की तरह अपनी चाची से उतना समय और स्नेह नहीं पा रहे थे।
फिर एक सुबह, जब नीति को बुखार हो गया था, उसका पति राजन, अपने ऑफिस की जरूरी मीटिंग के कारण पल्लवी के पास गया और उससे कहा, “भाभी, नीति को बुखार है, तो क्या आप आज मुन्ने का ख्याल रख सकती हैं? मुझे ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग है।”
पल्लवी ने राजन से बच्चा तो ले लिया, लेकिन कुछ देर बाद ही बच्चे को एक कोने में लिटा दिया और घर के बाकी कामों में लग गई। बच्चे को भूख लगी थी और वह जोर-जोर से रोने लगा, लेकिन पल्लवी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। आखिरकार, अपने बुखार और थकावट के बावजूद, नीति किसी तरह से उठी और बच्चे को उठाते हुए पल्लवी के पास गई। उसने धीमे स्वर में कहा, “भाभी, मुन्ना भूखा है और मुझे बुखार होने के कारण मैं उसे अपना दूध नहीं पिला सकती। क्या आप कृपया इसके लिए बोतल का दूध बना दें?”
पल्लवी ने अनमने ढंग से जवाब दिया, “देखो नीति, मुझे अपने बच्चों का भी ध्यान रखना होता है। तुम अपने बच्चे को खुद ही संभालो। मुझसे इतना काम नहीं हो पाएगा।”
यह जवाब सुनकर नीति का दिल टूट गया। उसने धीरे से कहा, “भाभी, क्या मुन्ना सिर्फ मेरा बच्चा है? मैंने तो कभी भी आपके बच्चों को अपने बच्चों से अलग नहीं माना।” लेकिन पल्लवी बिना जवाब दिए वहाँ से चली गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
इस घटना ने नीति के दिल को गहरा आघात पहुँचाया। उसने सोचा कि उसने हमेशा पल्लवी के बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार और देखभाल दी, फिर भी आज उसकी ज़रूरत के समय उसकी जेठानी ने उसे एक झटके में पराया कर दिया। नीति ने उस दिन ठान लिया कि अब वह अपनी प्राथमिकताओं को बदलेगी। उसने फैसला किया कि वह अब से अपने बच्चे को अपनी पहली प्राथमिकता देगी और केवल तभी पल्लवी के बच्चों की देखभाल करेगी जब उसे खुद फुर्सत होगी।
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अब नीति ने धीरे-धीरे अपने आप को पल्लवी के बच्चों की जिम्मेदारी से दूर करना शुरू कर दिया। वह उन्हें पढ़ाती जरूर थी, लेकिन पहले जैसी देखभाल और समय देना उसके लिए अब प्राथमिकता नहीं रही। पल्लवी को भी यह बदलाव महसूस हुआ और उसने कुछ दिन इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसे एहसास हुआ कि नीति अब वही नीति नहीं रही, जो पहले थी।
इस पूरे बदलाव ने पल्लवी के दिल में भी एक हल्का सा पश्चाताप का बीज बो दिया। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा कि शायद उसने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जिसमें रिश्तों में दूरियाँ आ गईं। नीति ने उसे सास, जेठानी, और बड़ी बहन सब कुछ माना था, लेकिन उसकी छोटी सी उपेक्षा ने उस विश्वास को कमजोर कर दिया। नीति को यह एहसास हुआ कि रिश्ते सच्चाई और सहानुभूति पर टिके होते हैं। रिश्ते निभाने में एक-दूसरे के प्रति समझ और समर्थन की जरूरत होती है, नहीं तो ये नाजुक धागे कभी भी टूट सकते हैं।
आज नीति और पल्लवी के रिश्ते में वह पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही। दोनों अपने अपने काम में व्यस्त रहते हैं और किसी ने भी आगे बढ़कर इस दूरी को पाटने का प्रयास नहीं किया। लेकिन इन दूरियों ने दोनों के दिलों में यह सिखा दिया कि रिश्तों की अहमियत तब तक है, जब तक हम उनका आदर और मर्यादा समझें।
यह कहानी यह सिखाती है कि रिश्ते तभी मजबूत रहते हैं जब दोनों ओर से समान आदर और जिम्मेदारी निभाई जाती है। रिश्ते अनमोल होते हैं, पर उनके धागे इतने कच्चे होते हैं कि एक हल्की सी उपेक्षा उन्हें तोड़ सकती है।
मौलिक रचना
संगीता अग्रवाल