गृहप्रवेश करने के लिए नयी दुल्हन ने जैसे ही पैर बढ़ाया, उससे १० साल बड़ी एकलौती ननद ने अपनी टांग आगे करके रोक दिया. “बहुत सुन्दर हार पहनी हो बहु, भाई ने मुझे तो नहीं दिलाया इतना सुन्दर. बढ़िया डिज़ाइन का खुद के लिए मायके से ले लिया और बेकार सी डिज़ाइन का मुझे दिलवा दिया” सुनते ही रचना चौंक गयी.
मन ही मन उसने सोचा “लेकिन, हम दोनों ने अपना अपना डिज़ाइन खुद ही पसंद किया था, फिर आज ऐसी बात क्यों कह रही हैं दीदी.” सही हो या गलत, इतने सारे लोगों के बीच दीदी से सवाल जवाब करना अच्छा लगेगा क्या? मौके का ध्यान रखते हुए उसने अपना हार उतार कर ननद की ओर बढ़ा दिया तो वो मुंह बिचका कर बोली
“दुनिया के आगे दिखाने की जरुरत नहीं है, जो तुमने चाहा वो तो कर ही दिया “. भाई के काफी मान मनुहार के बाद हार ले लिया पर नयी बहु के दिल से उतर गयी. रचना ने बुझे मन से कदम आगे बढ़ाया और गृह प्रवेश किया. थोड़ी देर औरतो के बीच हसीं – ठिठोली के माहौल में बैठी फिर सास ने कमरे में जाने का इशारा किया.
वो अंदर आते ही फुट फुट कर रो पड़ी. रौनक भी अंदर आया. बहन की बचकानी करतूत पर माफ़ी मांगी. फिर समझा बुझाकर उसे शांत किया. उसने याद करने की कोशिश की, कि मायके और ससुराल दोनों तरफ से सारी औरतें एकसाथ ही गयी थी जेवर खरीदने ताकि ज्यादा सामान लेने पर दुकानदार थोड़ा बेहतर डिस्काउंट दे सके.
उसने और दीदी ने अपने अपने हार का डिज़ाइन खुद पसंद किया था.फिर ये कैसी बात कर रही हैं! सोचते सोचते पलंग पर बैठे आँख लग गयी उसकी. रौनक के झकझोरने से नींद खुली. शाम हो चुकी है अब रिसेप्शन की तैयारी होने लगी, बहु के सोलह श्रृंगार के लिए ननद आयी, बुझे मन से वो तैयार होने लगी.
दीदी ने हार की कोई बात ही नहीं की. रचना के चेहरे पर गुस्सा के भाव छुपाए नहीं छुप नहीं रहे थे. तभी रौनक ने आकर प्लास्टिक की थैली रचना को पकड़ाया. ये तुम्हारी माँ के घर से आया है , शायद छूट गया था, स्टाफ अभी देकर गया है. उसको बिल्कुल समझ नहीं आया, कल तो पगफेरे के लिए जाने ही वाली हूँ ,
ऐसी कौन सी जरूरी चीज है जो माँ ने आज ही भिजवाई। फिर उसने थैली में देखा, स्टील के डब्बे में ५-७ लड्डू थे. ननद ने कहा “मायके से आए लड्डू खिलाओगी नहीं?” उसने १ लड्डू निकाल कर ननद को बढ़ाया, तो रौनक ने हाथ आगे कर दिया, दूसरा उसके हाथ में रख दिया, डब्बे का ढक्कन बंद करने लगी
तो एक लाल कपड़ा सा कुछ दिखा, छोटी सी बंधी हुई गठरी निकली, खोल कर देखा तो अवाक् रह गयी. उसमे माँ के हाथ से लिखी चिट्ठी थी. “बेटा, अपनी ननद का साभार करना, उन्होंने हमे बेइज्जती से बचा लिया. जो हार तुमने ब्याह के वक़्त पहना था वो, वही आर्टिफीसियल सैंपल था जिसे सुनार को दिखाकर तुम्हारे लिए सोने का गढवाया था.
दरअसल असली सोने का हार पोलिश से होकर वापिस ही आ नहीं पाया था इसलिए कल तक इसकी डिलीवरी नहीं हो पाई थी, पर इज्जत बचाने के लिए मैंने तुम्हे वही नकली हार दे दिया था. अब भिजवा दिया। नयी जिंदगी मुबारक”. चिट्ठी ख़तम हो गयी तो रचना ने ननद का चेहरा देखा. उन्होंने बोला
“हमारे रविंद्र मामाजी की जेवर की दुकान है, उन्होंने तुम्हे मंडप पे देखते ही बता दिया की बहु के जेवर नकली हैं, उनकी बात सुनकर मैंने तुम्हारी मम्मी से सीधा ही पूछ लिया. उन्होंने सच बताया तो मुझे लगा की पूरे खानदान में ये बात फ़ैल जाएगी, किस किस को सच्चाई बताते फिरेंगे, तुम्हारे मायके की इज्जत उछलेगी
वो अलग. इससे बचने के लिए मैंने गृहप्रवेश के वक़्त ही तुम्हारा हार उतरवा लिया ताकि मुंह दिखाई के बहाने कोई रिश्तेदार तुम्हारा हार करीब से न देख पाए. अब ये असली हार पहनो और
रिसेप्शन एन्जॉय करो, लोगो को करीब से हार देखने का मौका दो. रचना के आँखों से नफरत की दीवार लांघकर प्रेम और ग्लानि के आंसू मोती बनकर बह निकले. “हम भी कभी नयी बहु थे दुलहरानी”- रचना को गले लगाते हुए दीदी ने कहा तो दिलो के मैल मिट गए!
रितिका सोनाली