राघव, राधिका और मानव बचपन के दोस्त थे। साथ-साथ पढ़ते, खेलते, इधर-उधर घुमते, धमाचौकडी करते। न उनको चिंता थी, न उनके घरवालों को। निश्चल मैत्री की खुशबू सबके मन को आह्लादित करती। सबके परिवार में सरस प्रेमभाव था। एक दूजे के सुख-दुख में वे हमेशा साथ रहते।
राघव, राधिका मेहनती थे। मन लगाकर पढ़ाई करना, कक्षा में ध्यान देना उनका स्वभाव था। लेकिन मानव आलसी था। न पढ़ता, न किसी को पढने देता। कुछ न कुछ शोर करता रहता। कई बार शिक्षक उसे समझाते। राघव बार-बार उसे चेताता। पर वह किसी की न सुनता। फिल्मी धुन पर थिरकना, नाचना उसे अच्छा लगता। हीरो की काॅपी करता रहता। राह चलती लडकियों को छेडता। हीरो के स्टंट की, चाहे कितना भी कठिण हो, नकल करके ही रहता। ऐसे ही पहाडी से उछल कूद करते, कूदने की कोशिश में अपना पैर तुडवा लिया। अब बैसाखी उसका साथी बनी। धीरे-धीरे मन में अजीब खयाल आने लगे। दोस्त दुश्मन दिखने लगे।
राघव अपनी मेहनत से सफलता पाता गया। सबने उसे खूब बधाई दी। राधिका भी उसके साथ रहना पसंद करती। उसका गुणगान सुन मानव को अब बुरा लगने लगा। मन में नफरत की दीवार खडी कर दी। जीवन के प्रति उसका नजरिया बदल गया।
राघव से वह कन्नी काटने लगा। राघव का पढ़ने के लिए कहना, उसे अखरने लगा।
राघव सफलता की सीढियां चढता गया और मानव असफलता की खाई में गिरता गया। दोनों के बीच फासलें बढते गये।
राघव प्रशासनिक उच्चपदस्थ अधिकारी बन गया। अपनी गलत सोच की दीमक के कारण मानव अपना भला-बुरा सोच नहीं पाता था।
मानव को देख-देखकर उमा चाची परेशान हो जाती। उसकी हरकतों को काबू में लाने का प्रयास करती। पर वह किसी की मानता ही नहीं। अडियल घोडे-सा नखरेल बन जाता।
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दोस्ती में नफरत की दीवार आडे आ रही थी। बचपन का प्यार भी भूला दिया था उसने। वे तीनों साथ-साथ खेलते, लडते, झगडते। थोडी ही देर में एक हो जाते। भोले-भाले बचपन की यही मासूमियत होती है।
राधिका मानव को समझाने की भरसक कोशिश करती। वह सोचती रही क्या किया जाये, कि यह नफरत की दीवार ढह जाये।
राधिका ने अपना जन्मदिन मनाने के बहाने दोनों को अपने घर बुलाया। दोनों एक दुसरे से नजरें छुपाकर बर्थ डे का आनंद ले रहे थे। नजरें मिलती, तो झूठा हंस देते। राधिका के और मित्र भी आ गये थे। केक कटिंग के लिए सबको बुलाया। सीधे कह दिया,
” आज यह बर्थडे पार्टी नहीं है। यह ‘दोस्ती के नाम, एक शाम’ की मस्ती की पाठशाला है। आओ राघव, मानव, आओ मित्र, मेरे पास।”
झिझकते हुए दोनों आगे आये।
“ये लो, काटो अब केक।”
” अपनी दोस्ती के नाम।”
” अरे हां, याद आया, मुझे अर्जंट काम है। जाना पडेगा।” मानव बहाना बनाने लगा।
” मानव, रूको, नौटंकी मत करो।”
” मैं तुम्हें खूब जानती हूं। पगला गये हो तुम। तुम दोनों तो एक ही सिक्के के दो पहलू हो। मेरे प्रिय मित्र हो।”
” प्लीज, मेरे लिए पुन: दोस्त बन जाओ। प्लीज…”
राधिका ने मानव के पसंदीदा गाने लगाये। अबतक सारे मित्रगण आ गये थे। खिलखिलाती हंसी में नफरत की दीवार सहज ही ढह गयी थी।
सबका मन अति हर्षित था।
स्वरचित मौलिक कहानी
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र