“ये क्या कर रही है बेटा रसोई में… चल जा मैं कुछ बना देती हूँ खाने के लिए नहीं तो बहू से कहती हूँ… तू हॉस्टल से आई है आराम करने रसोई के काम करने नहीं?” सुमिता जी राशि को रसोई में देख बोलीं.
“ माँ वो भाभी के पैरों में बहुत दर्द हो रहा है तो सोचा गर्म तेल की मालिश कर दूँ।” राशि आराम से कह गर्म तेल लेकर जाने लगी.
“ रूक पगला गई है क्या… तू क्या भाभी के पैरों में तेल मालिश करेगी …रहने दे ।” सुमिता जी ने कहा.
“ माँ ये तुम कह रही हो…?” राशि आश्चर्य से माँ को देखने लगी.
“ तू ऐसे क्या देख रही है… चल कटोरी यहाँ रख और जा अपने कमरे में ।” सुमिता जी ऊँची आवाज़ में बोलीं.
“ तुम कुछ भी कहो मैं जा रही भाभी के पास ।” कहती हुई राशि माँ से नाराज़ हो भाभी निशिता के कमरे में आ गई.
“ राशि आप क्यों ये सब कर रही हैं…. मम्मी जी ग़ुस्सा कर रही हैं फिर ….।” कुछ कहते कहते निशिता चुप हो गई.
राशि समझ गई माँ बहुत बदल गई है वो ऐसी तो बिलकुल भी नहीं थी क्या हो गया इसे…. जब से भाभी आई है देख रही हूँ बात बात पर उखड़ जाती है और आज भाभी की हालत जानते हुए भी…. ऐसे कैसे मना कर सकती है….।
राशि निशिता के लाख मना करने के बावजूद उसके पैरों की मालिश कर अपने कमरे में आ गई ।
राशि ना जाने क्यों अपने बचपन की गलियारों में खो गई… ये सोचते सोचते माँ ऐसी कैसे हो गई
“ये क्या बहू अब तक मुन्ना भूखा है और तू इसे दूध पिला रही है ।” दादी ने कहा था जब सुमिता जी राशि को दूध पिला रही थी.
इस कहानी को भी पढ़ें:
सच्चे रिश्ते प्यार, सम्मान और समझ पर टिके होते हैं – कुमुद मोहन : Moral Stories in Hindi
“ बस माँ जी मुन्नी छोटी है ना बहुत देर से रो रही थी इसलिए सोचा इसे दूध पिलाकर सुला दू फिर मुन्ने को खाना खिला दूँगी ।” सुमिता जी ने कहा.
“ अरे तू कैसी औरत है… लोग पहले बेटे के लिए सब कुछ करते बाद में बेटी के लिए…पर तू तो पहले बेटी को देखती है ।” दादी हमेशा बोलती थीं.
और तब से आज तक सुमिता जी ने कभी बेटे बेटी में उस भाव को आने ही नहीं दिया कि बेटियों को बेटे के बाद रखना…ऊपर से सुमिता जी कहा करती थीं तेरी दादी की तरह मैं कभी नहीं बनूँगी… देखना बहू को ज़्यादा लाड करूँगी… बेटा तो अपना होता ही है उससे वैसे ही प्यार रहेगा पर बहू तो दूसरे घर से आएगी ना उसे प्यार सम्मान देकर अपना बनाऊँगी तभी तो वो मुझे माँ समझ पाएँगी… पर जब से निशिता आई है सुमिता जी माँ कम सासु माँ वाले रूप में ज़्यादा रहने लगी …उपर से भाभी प्रेगनेंट है ये जानते हुए भी उनके प्रति ऐसा रुखा व्यवहार क्यों कर रही है…. कुछ सोचते हुए राशि सुमिता जी के कमरे में गई.
“ माँ तुम माँ ही हो ना…।” राशि ने सामने से पूछा.
“ हाँ तू ऐसे क्यों पूछ रही है?” सुमिता जी ने कहा.
“ देख रही हूँ सास बनते तुम माँ का चोला उतार सास का चोला पहन बैठी हो…. तुम तो जब हम भाई बहन में कभी भेदभाव नहीं करती थी तो आज बहू के आते उसके साथ ऐसा व्यवहार…आख़िर क्यों,…क्योंकि दादी तुम्हारे साथ ऐसा करती थी…. पर मुझे अच्छे से याद है तुम तो कहती थी मैं बहू को बहुत प्यार करूँगी…उसके दुख तकलीफ़ में कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी फिर ये कैसा व्यवहार कर रही हो तुम उनके साथ?” राशि सुमिता जी से पूछी.
“ तू मुझसे ये फालतू के सवाल मत कर ।” सुमिता जी कह अपने अलमारियों की सफ़ाई करने में लगी रहीं.
“ नहीं माँ मैं देख रही हूँ तुम बहुत बदल गई हो ..तुम तो अपने ऊपर भी हो रहे भेदभाव पर दादी से उलझ जाती थी फिर तुम ख़ुद ही भेदभाव कर रही हो…. ऊपर से जो भैया पहले भाभी की मदद करते थे वो भी अब बस भाभी से ही काम करवाते हैं…क्या उनकी हालत देख कर भी तुम्हें दया नहीं आती।” राशि आज माँ से इस बदले व्यवहार को जान कर ही दम लेने के मूड में थी.
“ देख बेटा…अभी तेरी शादी नहीं हुई है तू भी जिस घर जाएगी ऐसे ही करना पड़ेगा.. हमारा समाज ना महिला और पुरुष को कभी बराबर समझ ही नहीं सकता… मैं चाहे कितनी भी कोशिश करूँगी बेटा बहू को बराबर समझने की ये समाज के लोग ना इतने ताने मारेंगे कि चाह कर भी मैं वो सोच बरकरार नहीं रख पाऊँगी… अब तू भी समझ जा … औरत चाहे कितना पढ़ लिख ले शादी बाद उसकी हैसियत पहले जैसी नहीं रहती…ऑफिस से आकर चाहे मन हो ना हो काम उसे ही करना… पति मजे से टीवी देख सकता है पर पत्नी की मदद करने लगे तों जोरू का गुलाम से नवाजा जाता…. ये सब ना सुन सुन कर मैं थक गई इसलिए बहू को बेटे के बराबर दर्जा ना दे पाई…और तू मुझे कोई और पट्टी पढ़ाने की कोशिश मत करना।” सुमिता जी अलमारी में कपड़े रखते हुए बोलीं.
इस कहानी को भी पढ़ें:
“ सही कह रही हो माँ मैं तो भूल ही गई हमारा समाज तो लड़का लड़की के भेद को कहाँ ही मिटा पाया है और तुम तो एक मामूली सी घरेलू महिला हो क्या ही कर सकती हो … अच्छा सुनो फिर मेरी भी शादी करवा दो या फिर मुझे नौकरी करने देना….. जब पढ़ लिख कर नौकरी भी करूँ और पति और ससुराल की जी हुजूरी भी तो उससे अच्छा है नौकरी ही ना करूँ….कमाल हो माँ तुम ।” राशि ग़ुस्से में बोली.
“ क्या कमाल …?” सुमिता जी राशि को घूरते हुए बोलीं.
“ माँ तुम अगर चाहती हो कुछ बदलाव करना तो शुरुआत अपने ही सोच से करो… तुम्हें देख मैं और भाभी दोनों में हिम्मत आएगी….कम से कम तुम औरत होकर तो औरत को समझो…… भाभी के थोड़े काम भैया कर भी देंगे तो कौन सी आफत आ जाएगी… भाभी भी तो करती ही है ना… वो तो नहीं सोचती रितेश के जितनी पढ़ाई उन्होंने भी की एक ही जगह एक ही पैकेज की नौकरी की फिर रितेश को आराम और मुझे काम क्यों…दोनों मिलकर कर लेंगे तो क्या हो जाएगा…. मुझे तो ऐसा परिवार मिले तो मैं कभी शादी ही ना करूँगी….मुझे मेरे मायके जैसा ससुराल नहीं चाहिए ।” राशि ने कहा और कमरे से निकल गई
कुछ देर बाद उसे सुमिता जी की आवाज़ सुनाई दी,“राशि भाभी के कमरे में आ जा…।”
राशि अनमने मन से गई तो देखती है सुमिता जी निशिता के लिए नाश्ता बना कर ले गई हैं…. और साथ में चाय भी।
“ मम्मी जी मैं करती ना आपने क्यों किया ।” निशिता ने कहा
“ करने दे बेटा….नहीं तो मेरी बेटी ससुराल ही नहीं जाएगी….।” कहकर सुमिता जी राशि को देखने लगीं
“ रहने दो माँ….मेरा वो मतलब नहीं था बस ये कहना चाहती हूँ कि कम से कम घर में हम औरतें भेदभाव से बचे रहेंगे तो बाहर इसके लिए बोलना आसान होगा।” राशि कह भाभी के साथ बैठ गई.
“ मम्मी जी मुझे काम करने से कोई शिकायत नहीं है पर हाँ आपका व्यवहार कभी कभी रूला देता है क्योंकि जब नई नई आई थी तब आप ऐसे नहीं करती थीं ।” निशिता डरते हुए बोली
“ बहू ये सब समाज के नज़रिए में मैं बदल रही थी पर अब नहीं…अब मेरे लिए बेटा बहू बेटी सब बराबर हैं।” सुमिता जी ने जैसे ही कहा राशि और निशिता सुमिता जी के गले लग गईं.
दोस्तों लड़का लड़की में आज भी भेद किया जाता है वो चाहे घर हो या बाहर … मेरा मानना है अगर हमें बराबर की दुनिया बनानी है तो शुरुआत अपने घर से करें… जब हमारे बच्चों को हम ये सीख देंगे तो वो अपने आगे ये सीख दे सकेंगे…पहले एक से शुरुआत हो तो सही….इस बारे में आपके विचार व्यक्त करें.. रचना पसंद आये तो कृपया उसे लाइक करे ,कमेंट्स करे
धन्यवाद
रश्मि प्रकाश