मुझे बस माँ रहने दो – शिखा श्रीवास्तव  : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :

माँ… माँ…

कहाँ हो…

आशु की आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी।

उसके पापा नितिन जी ने एक नज़र उठाकर उसे देखा और अपनी पत्नी अविका जी से कहा “लो आ गया तुम्हारा लाडला”, और फिर उन्होंने नज़रें अखबार में छुपा लीं।

अविका जी जैसे ही बाहर आयीं आशु उनके गले लगते हुए बोला “देखो माँ संघ लोक सेवा आयोग की जो परीक्षा मैंने दी थी उसका परिणाम आ गया है। तुम्हारा बेटा अब आईएएस बनेगा और तुम ठाठ से रहोगी। ये मेरी नहीं तुम्हारी सफलता है माँ, सिर्फ तुम्हारी।”

आशु की बातें सुनकर अविका जी की आँखों से सहसा ख़ुशी के आँसू बह निकले।

ख़ुशी के इस अनमोल क्षण में उन्हें बरसों पुराना वो दिन याद आ गया जब वो ब्याहकर इस घर में आयी थीं और उनकी गोद में साल भर के आशु को देकर उन्हें पत्नी से पहले ‘माँ’ का दर्जा दे दिया गया था लेकिन अविका जी ने इस रिश्ते को हमेशा ही पूरे प्यार से निभाया।

धीरे-धीरे अब आशु बड़ा हो रहा था और उसने विद्यालय जाना भी शुरू कर दिया था।

एक दिन पढ़ाई में कुछ गलती करने पर जब अविका जी आशु को डाँट रही थीं तभी उनके पास बैठी हुई आशु की बुआ ने कहा “बेचारा बच्चा! काश आज इसकी अपनी माँ जीवित होती तो इसकी ये हालत ना होती।”

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ये सुनकर अविका जी की हालत यूँ हो गयी कि काटो तो खून नहीं। उन्होंने किसी तरह स्वयं को सँभाला और आशु को खेलने के बहाने से बाहर भेजकर उसकी बुआ से बोलीं “दीदी, मैं आपसे आग्रह करती हूँ कि आप मेरे बच्चे के सामने ऐसी बातें मत किया कीजिये। मैं उसकी माँ हूँ और उसके प्रति मेरी जो जिम्मेदारी है उसे मैं बखूबी समझती हूँ, इसलिए आज उसकी गलती पर मैं उसे डाँट रही हूँ, ताकि वो अपने जीवन में तरक्की करे।

अगर कल बड़ा होकर वो बिगड़ गया, गलत रास्ते पर चला गया तब भी आप सब मुझे ही दोष देंगे कि मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया।”

अविका जी का स्पष्ट उत्तर सुनकर आशु की बुआ ने अब वहाँ से जाना ही उचित समझा।

आशु को अहसास हो गया था कि उसकी माँ और बुआ के बीच में कोई गंभीर बात हुई है इसलिए वो खेलने जाने के स्थान पर छुपकर उन दोनों के बीच में हुई सारी बातें सुन रहा था।

इस दिन से अपनी माँ के लिए आशु के मन में और भी ज्यादा सम्मान बढ़ गया था। उसने इसी क्षण ठान लिया कि वो अपनी माँ का सबसे अच्छा बेटा बनेगा, उनकी सारी उम्मीदें पूरी करेगा।

और आज आशु ने अपने आप से और अपनी माँ से किया हुआ वादा पूरा कर दिया था।

उस दिन की बात अविका जी को बताते हुए वर्तमान में उनके आँसू पोंछकर आशु बोला “ओफ्फो माँ, तुम रोया मत करो ना। तुम जानती तो हो कि मुझे तुम्हारे आँसू बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं।”

“अरे पगले, ये तो खुशी के आँसू है।” अविका जी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा तो आशु लाड़ से बोला “खुशी में आँसू मत बहाओ। चलो मिलकर पकोड़े बनवाओ और मुझे जी भरकर खिलाओ।”

इधर दोनों माँ-बेटे रसोई में जाकर पकोड़े बना रहे थे और उधर आशु की सफलता पर बधाई देने के लिए लोगों के घर आने का सिलसिला शुरू हो चुका था।

आशु की बुआ भी इस अवसर पर अपने भतीजे को बधाई देने आयीं तब आशु ने उनसे कहा “आइये बुआ, पकोड़े खाइये। मैंने बनाये हैं।”

“देखो कामचोरी की हद। अब इसकी माँ ने मेरे भतीजे को बावर्ची भी बना दिया।” बुआ मुँह बनाते हुए बोलीं।

उनका ताना सुनकर आशु को एक क्षण के लिए बहुत गुस्सा आया लेकिन अविका जी ने उसे संकेत से शांत रहने के लिए कहा।

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फिर भी आशु ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा “बावर्ची नहीं बुआ, माँ ने मुझे आत्मनिर्भर बना दिया है।

माँ कहती है कि इंसान को अपने हर काम में आत्मनिर्भर होना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसे किसी का मोहताज ना होना पड़े।

सोचिये अगर मुझे खाना बनाना नहीं आता और परीक्षा की तैयारी के लिए घर से दूर रहते वक्त, कभी-कभार रसोईये के ना आने पर मैं बाहर का खाना खाकर बीमार पड़ जाता तो आज आप मुझे बधाई देने आ पातीं ?”

इस उत्तर को सुनकर आज भी उसकी बुआ के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा था।

“इन माँ-बेटे से तो भगवान बचाये…।” बुदबुदाते हुए आज भी उन्होंने चुपचाप यहाँ से वापस जाने में ही अपनी भलाई समझी।

उनके जाने के बाद अविका जी ने अपने बेटे को गले से लगा लिया जिसने आज एक बार फिर सबके बीच में उसका सिर झुकने से बचा लिया था।

और नितिन जी मौन मुस्कान के साथ इस दृश्य को अपनी आँखों में भरते हुए ईश्वर को अविका जैसी जीवनसंगिनी देने के लिए धन्यवाद अर्पित कर रहे थे।

©शिखा श्रीवास्तव

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