मसाले वाली चाय – बालेश्वर गुप्ता : Moral Stories in Hindi

        आज सुबह सो कर उठने के बाद से ही आशुतोष जी बड़े खिन्न से थे।असल मे उन्हें सुबह सुबह ब्रश करने के तुरंत बाद चाय पीने की आदत थी,आदत क्या तलब थी,मसाले वाली चाय पीने मात्र से ही वे अपने मे स्फूर्ति महसूस करते थे।अपने समय मे अच्छी पर्सनालिटी के आशुतोष जी बड़े ठसके के साथ रहते।एक बड़ी फैक्ट्री में मैनेजर रहे थे,तो रुआब की भी कमी नही थी।पत्नी वीणा से खूब प्यार करते आशुतोष जी।दोनों मानो दो जिस्म एक जान।एक दूसरे का खूब ख्याल रखते।एक दूसरे की हर जरूरत का उन्हें ध्यान रहता।

सुबह की चाय भी दोनो एक साथ ही बॉलकोनी में बैठकर धीरे धीरे पीते थे।अब जब वीणा जी आशुतोष जी को अकेले छोड़ अनंत यात्रा पर अचानक ही चली गयी तो आशुतोष जी के जीवन मे एक रिक्तता आ गयी।सच बात तो यह थी,उन्हें विश्वास ही नही हो पा रहा था कि वीणा उन्हें छोड़ कर चली जायेगी,बात इतनी चाय की नही थी।वीणा की आरिष्टि तक शायद देवल यही रहेगा, फिर वह भी चला जायेगा,कैसे रह पायेंगे अकेले?

      बॉलकोनी में बैठे बैठे आशुतोष जी उनींदे से हो गये, तभी उन्हें पुरानी यादों ने घेर लिया।वीणा से शादी उनके माता पिता ने आशुतोष जी की रजामंदी से कराई थी।वीणा एक सौम्य व्यवहार की सुंदर महिला थी।प्रेम विवाह न होने के बावजूद उनकी परस्पर की ट्यूनिंग ऐसी थी,सबको लगता कि इनका जरूर प्रेम विवाह होगा।ऐसे ही चलती जिंदगी में उनके पास देवल के रूप में एक प्रिंस आ गया।अब आशुतोष जी एवं वीणा जी की जीवन चर्या ही बदल गयी।दोनो का केंद्र बिंदु देवल हो गया था।जीवन मे एक उत्साह नये रूप में संचार करने लगा था।ऐसे ही वातावरण में समय चक्र चल रहा था।

       एक दिन आशुतोष जी को धक्का लगा जब उनकी पत्नी ने बताया कि उनका बेटा देवल शैली नामक लड़की से प्यार करने लगा है और उससे शादी करना चाहता है।यूँ तो यह बात वीणा जी ने अपने पति को उत्साह में बतायी थी,यह जताने को भी कि उनका बेटा अब जवान हो गया है, कल का नन्हा देवल देखते देखते शादी योग्य हो गया है।पर वीणा जी के उत्साह पर पानी पड़ गया जब आशुतोष जी ने इस प्रस्ताव को सिरे से ही नकार दिया।उन्हें ये बर्दास्त ही नही हो रहा था कि उनका बेटा अपनी शादी की पसंद खुद कर रहा है।

उनके मन मे कही ये भी था कि हमने भी तो अपने माता पिता की सहमति से उनके द्वारा बताई लड़की से ही शादी की थी।समय परिवर्तन की चाल को आशुतोष जी समझ ही नही रहे थे।अपने समय की तुलना अपने बेटे के समय से कर रहे थे।घर मे भूचाल आ चुका था।देवल ने हरचंद कोशिश की कि पापा मान जाये, पर जिद्दी स्वभाव के आशुतोष जी मानने को तैयार नही थे।वीणा देवल की पसंद के साथ तो थी पर पति के विरुद्ध नही जा सकती थी तो उन्होंने मौन साध लिया।देवल ने कहा भी  पापा एक बार शैली से मिल तो लो,पर आशुतोष जी ने साफ मना कर दिया।

इस कहानी को भी पढ़ें:

पुरानी बातें – नीरजा कृष्णा : Moral Stories in Hindi

      कोई चारा न देख और पिता के बिल्कुल भी न मानने की स्थिति में देवल ने शैली से कोर्ट मैरिज इस विचार से कर ली कि शायद पिता शादी के उपरांत मान जायेंगे।लेकिन सब उल्टा हो गया,आशुतोष जी बिफर पड़े,उन्होंने आशीर्वाद तो दूर देवल और शैली की ओर देखा तक नही और दूसरे कमरे में चले गये।अगले दिन भी उनका व्यवहार उसी तरह का रहा।देवल  का शैली के साथ घर मे इस अपराध भाव के साथ रहना दूभर लग रहा था।आखिर एक दिन उन्होंने मां को बताकर दूसरा फ्लैट किराये पर ले लिया।वीणा जी ने तो उन्हें रोकने की कोशिश की भी,पर आशुतोष जी पत्थर दिल ही बने रहे।देवल चला गया।आषुतोष जी एवं वीणा जी की की दिनचर्या फिर पहली जैसी हो गयी।एक बात तो थी कि जब भी उनके सामने वीणा जी बेटे देवल को याद करती तो अब वे उन्हें न रोक कर शून्य में निहारने लगते,पर मुँह से एक शब्द भी नही बोलते।

     एक दिन सुबह उठे तो बराबर में लेटी वीणा उठी ही नही,अन्यथा उनके उठने से पहले ही वीणा की झंकार झंकृत होने लगती थी।मसाले वाली चाय इतने वीणा जी बना कर लाती तबतक वे ब्रश करके बॉलकोनी में बैठ जाते।फिर दोनो बतियाते हुए धीरे धीरे चाय पीते।देखने पर पता चला कि वीणा का तार तो टूट चुका, आशुतोष जी निपट अकेले रह गये, सबसे विश्वस्त और प्यारे साथी ने उनका साथ शेष जिंदगी के लिये छोड़ दिया था। आशुतोष जी वीणा के जाने से भीतर तक टूट गये थे।देवल को जैसे ही पता चला वह शैली के साथ दौड़ा चला आया।पापा को देख उनसे चिपट कर बच्चो की भांति फफक कर रो पड़ा।आज आशुतोष जी ने उसे अपने आगोश से हटाया नही,वरन उसे अपने से चिपट कर रोने दिया,पर शायद बेटे का यह रुदन भी उन्हें अंदर से तोड़ रहा था,शायद उन्हें अहसास करा रहा था कि अकेलापन तो उन्होंने ही तो खुद औढ़ा है।पर मुँह से कुछ बोल नही पाये।

      वीणा जी का अंतिम संस्कार हो चुका था,सब औपचारिकताएं देवल ने ही निभायी, आशुतोष जी तो मानो पत्थर के हो गये थे।बहुत दिनों बाद देवल आज अपने कमरे में ही रुका था,अपनी पत्नी शैली के साथ।आशुतोष जी ने उससे अभी तक भी ठीक तरह बात भी नही की थी।

        अचानक ही उनींदे से आशुतोष जी के कान में शब्द पड़े  बाबूजी आपकी चाय।अरे ये वीणा कहाँ से आ गयी,वो तो छोड़ गयी थी उन्हें अकेले, आंखे खोल कर देखा तो चाय लिये शायद शैली खड़ी थी।आज आशुतोष जी ने शैली को पहली बार देखा कैसी मासूम सी निश्छल लग रही थी,कितने अधिकार और अपनत्व से कह रही थी,बाबूजी आपकी चाय।आशुतोष जी ने चुपचाप कप हाथ मे ले लिया।शैली ने घर मे सबकुछ संभाल लिया था,उनका समय पर खाना,कपड़े प्रेस करना,उनका बिस्तर ठीक करना।लग ही नही रहा था वीणा चली गयी है।लगता है मुझसे छल कर गयी शैली को छोड़ गयी यहाँ।मैंने शैली को नही अपनाया था ना,इसलिये मुझे इस तरह मजबूर कर रही है,ऊपर बैठी जरूर मुस्कुरा रही होगी,सोचते सोचते आशुतोष जी की आंखे भर आयी।

       आज वीणा की आरिष्टि थी,सब रिश्तेदार,मित्र आये थे,सबने सांत्वना दी और चले गये।आशुतोष जी सशंकित थे,अगर देवल भी चला गया तो?इस प्रश्न का उत्तर उनके पास था ही नही।अगली सुबह देवल बॉलकोनी में आया बोला आपकी देखरेख के लिये एक मेड रख दी है वह सुबह से शाम तक यही रहेगी सब काम करेगी,आपको कोई तकलीफ नही होगी।अब हम जा रहे हैं पापा।कह कर देवल और शैली ने उनके चरण स्पर्श कर लिये।अपना सूट केस उठा कर दोनो चल दिये,किंकर्तव्यविमूढ़ से बैठे आशुतोष जी दरवाजे पर पहुँचे देवल और शैली को पुकार कर बोले,जा रहे हो बेटा अपने बूढ़े बाप को एक मेड के भरोसे छोड़कर? क्या माफ करने का अधिकार बस बड़ो का ही होता है, छोटो का नही?

       पापा का यह अंतर्नाद देवल और शैली को अंदर तक झिंझोड़ गया।पलट कर वे पापा की ओर दौड़ लिये,पापा -पापा कहते कहते दोनो ही अपने पिता के आगोश में समा चुके थे।बर्फ पिघल चुकी थी।नयी सुबह फिर हुई आज बॉलकोनी में आशुतोष जी के साथ देवल और शैली भी बैठे तीनो मसाले वाली चाय की चुस्की ले रहे थे।वही बॉलकोनी में आशुतोष जी द्वारा लगाई गई वीणा जी की फोटो से अचानक हवा से गिरी माला मानो कह रही थी सुनो जी,तीन नही चारो,मैं भी तो हूँ———-।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवं अप्रकाशित।

#अफसोस साप्ताहिक शब्द पर आधारित कहानी:

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!