“अरे दीपक! क्या है ये सब? इतना पढ़ा-लिखा होकर तू कैसे इन सब चक्करों में फँस गया भाई!”
दोस्त से मिलने पहुँचा गौरव उसके कमरे का दृश्य देख कर अचरज से बेसाख़्ता बोल उठा।
टीवी के कुछ चैनलों पर रोज दिखने वाले उस चीज को वह तुरन्त पहचान गया था।
दीपक व गौरव प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इस शहर में 2-3 सालों से रह रहे थे। गौरव होस्टल में रहता था, जबकि दीपक एक तंग गली में किराये का कमरा लेकर, चूँकि होस्टल की फीस का बोझ वह अपने घरवालों पर डालना नहीं चाहता था, उल्टा लोगों के छोटे-मोटे काम कर अपने खर्चे निकाल लेता था। अक्सर ही साथ पढ़ने के लिए गौरव को भी कमरे में बुला लेता था। इतनी मेहनत के बाद भी वांछित सफलता उन्हें अब तक मिल नहीं सकी थी। भविष्य उन्हें धुँधला दिखता, कभी-कभी निराशा हावी होने लगती थी।
“अरे गौरव, मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था। …भाई, तू यकीन नहीं करेगा, यह धनवर्षा यंत्र वाकई धन की वर्षा करने वाला है, चुम्बक की तरह पैसे को खींचता है। …देख कल शाम तक कमरे का किराया चुकाने को भी पैसे नहीं थे मेरे पास, मज़बूरी में तुझसे दो हजार रुपये उधार माँगे थे, मगर देख, अभी मेरे पास 10 हजार हैं। …ले तेरे पैसे वापस! दिल से धन्यवाद भाई, मुश्किल घड़ी में काम आने के लिए।”
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तत्काल पाँच-पाँच सौ के चार नोट निकाल कर दीपक ने गौरव को थमा दिये।
“हैंss!…कहाँ से आये इतने रुपये यार? कहीं पड़े हुए मिल गये या आसमान से गिरे??”
“अंकल ने दिये हैं यार, मकान मालिक ने। …ये सारे यंत्र भी उन्होंने ही दिये हैं, कुछ स्पेशल मंत्रों के साथ! …जिनका प्रयोग मैंने उनके ही चार अन्य किरायेदारों पर करके देखा है, उनके ही सुझाव पर…यंत्र पूरा काम करता है… मंत्र सही से उपयोग करो तो!”
अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराता दीपक एक आँख दबाता हुआ बोला।
हैरानी से उसका चेहरा देख रहे गौरव के दिमाग़ की बत्ती भी अचानक जल उठी। दीपक के दोनों हाथों पर हाथ मारता वह भी जोरों से खिलखिला उठा। अब उसे भी पढ़ाई में मेहनत करने की जरूरत नहीं दिख रही थी, नया बिज़नेस जो समझ में आ गया था।
“भाई, पैसे वापस मत दे, गुरूदक्षिणा समझ रख ले!…आज से ही मैं भी तेरा समझाया मंत्र जाप करना शुरू कर दूँगा।”
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(स्वरचित, मौलिक)
नीलम सौरभ
रायपुर, छत्तीसगढ़
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