मन का रिश्ता- शुभ्रा बैनर्जी  : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : “अरे ओ दिद्दा,कहां गई ?ये ले भुट्टे लाई हूं तेरे लिए।”शशि अंदर से भागती हुई आई और बोली”नहीं अम्मा,भुट्टा मत देना।इन्हें भूनने का समय ही नहीं मिलता,पड़े-पड़े सूख जातें हैं।मन मारकर फिर फेंकना पड़ता है। जबरदस्ती हर बार पकड़ा जाती हो कुछ ना कुछ।पैसे भी नहीं लेती हो।नहीं लूंगी कुछ अबकी।”

वो भी कहां मानने वाली थी।अपने लाए हुए मठे को कामवाली बाई (श्यामा)को देते हुए बोली”ऐ बइया,मोर दिद्दा को भूंज देना जे भुट्टा।”

श्यामा भी मना करती रही कि पैसे नहीं हैं पास,पर उसने जवाब में जो कहा वह शशि को अंदर तक झकझोर गया।”ऐ बइया,ना चाही मोहे पैसा।दिद्दा को भुट्टा भूंजकर देने के बदले में यह मठा दे रहीं हूं।”शशि अवाक होकर नहाने चली गई।

उसके जाने के बाद श्यामा ने कहा”दीदी,आपका कितना ख्याल है उसे।पूरी कॉलोनी से छिपाकर सब्जी और ताजी भाजी लाती है आपके लिए।आज जब आप नहाने गई,तब उसने बताया आपकी मदद के बारे में।”शशि सोच में पड़ गई ,कि उसने कब मदद की उस अम्मा की।वह तो नाम भी नहीं जानती थी उसका।हां बहुत सालों पहले दूध देती थी

वह,जब उसका बेटा छोटा था।उस समय तो कोई मदद नहीं की थी शशि ने उनकी।यह किस मदद की बात कर रही है।अबकी जब आएगी,तब खुद ही पूछेगी।

लगभग महीने भर बाद आई वह चीखते हुए”बाप रे !दिद्दा,फेर सकूल‌ चल दीं हो का?बड़े रोज़ में दुआर खुला दिखा तो आए गई।लाल,पालक,बथुआ नया -नया निकरा है।लइ ले‌ दिद्दा।”

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आज शशि छोड़ेगी नहीं उसे,पूछकर ही रहेगी ,क्या मदद की थी उसने जो उसे अभी तक अहसान मानना पड़ रहा है।”का अम्मा,मैंने कब तुम्हारी  मदद की है?मुझे तो याद भी नहीं आ रहा।तुम हो कि बताती फिरती हो सभी को।आज बताओ नहीं तो कुछ नहीं लूंगी।”शशि ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।अम्मा हंसते-हंसते बोली”अरे मोर दिद्दा!

कितना बड़ा मन है रे तोंहार।आपने की गई नेकी तक याद नहीं।अरे दिद्दा ,जब बिटवा छोटा था तुम्हार,दूध देती थी ना।उसी समय मेरी बेटी का ब्याह तय हुआ था।अपने दहेज का बर्तन,नाक की फुल्ली और करधनी मुझे दी थी तुमने।उस समय बस तुम्हारी सास को ही पता था।मेरे सर से कितना बड़ा बोझ उतारा था‌ उस दिन।मैं तो सार ज़िंदगी भी तुम्हें मुफत में सब्जी खिलाऊं,तब भी नहीं चुका पाऊंगी तुम्हारा करजा।

जानती हो दिद्दा,तुम जरूर पिछले जन्म में मेरी मां रही होगी।एक दूध वाली के लिए कोई कहां करता है इतना।मेरे नाती -पोते भी तुम्हार बच्चन के कपड़ा पहन के बड़ें हैं।तुमसे हमारा खून का रिश्ता तो नहीं,प्रेम का रिश्ता है।ठंडी में स्वेटर,कंबल,मफलर ,मोज़ा सब तो देती रहती हो तुम।कहती हो कि का मदद की हो?हां नहीं तो।अब न कहना कंबहू कि नहीं लोगी सब्जी।जब तक परान है ना हमारे शरीर में,तब तक सब्जी तो खिलाते रहेंगे हम आपन दिद्दा को।”

शशि निरुत्तर थी अम्मा की बात सुनकर।नाम की ही नहीं ये तो सचमुच अम्मा ही थी।शशि से उस समय इनका रोना नहीं देखा गया था।शादी में मिले बहुत सारे उपहारों में से ही कुछ दे दिया था,सासू मां को बताकर।ग़रीबी और मजबूरी उसने भी देखी थी अपनी ज़िंदगी में,वह कैसे मदद नहीं करती।वह मदद बहुत बड़ी भी नहीं थी।सासू मां ने तो कहना ही छोड़ दिया था

उन उपहारों के बारे में।आज अचानक पुराने दिन याद‌ कर उसे अपने मन के नरम होने पर बहुत गर्व महसूस हो रहा था।मतलब होने पर सहायता करना,और बदले में सहायता की उम्मीद करना ही आजकल रिश्तों की आवश्यक्ता हो गई है।जब तक किसी के काम आओ ,तभी तक रिश्ते निभातें हैं।खून के रिश्तों में भी अब स्वार्थ का रंग आ गया है।

यहां एक दूध वाली सालों पहले किए गए मदद को अहसान माने बैठी थी।सगे संबंधियों को कितना भी मंहगा उपहार दे दो,पीठ पीछे उपहास करते ही देखा है उसने।अम्मा को बच्चों के पुराने कपड़े और अपने उपयोग किए कपड़े देकर ,आज यश की भागी बन गई थी वह।

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अब वह अपने बच्चों को हमेशा सिखाई हुई सीख फिर से दोहराएगी कि कभी किसी की मदद करो ,तो बदले में पाने का लालच मत रखना।हमेशा खून के रिश्तों की दुहाई देने वाले समाज में,आज भी प्रेम से बंधे मन के रिश्ते पल्लवित होते रहतें हैं।ये रिश्ते हरसिंगार की तरह भीनी खुशबू देतें हैं जीवन में।

शुभ्रा बैनर्जी 

#खून का रिश्ता

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