बहुत मिन्नत के बाद आखिर रेशमा मान गई और खुशी के कारण फूट फूटकर रोने लगी – ” कल एक बार जाऊंगी सबसे विदा लेने। आखिर उस समाज ने मुझे आसरा और सहारा दिया है। उन्हें भी बताऊंगी कि कोई है जो मुझसे नफरत नहीं करता है बल्कि मुझे प्यार और सम्मान देता है। अब मेरे मरने के बाद मेरी चिता को अग्नि देने वाला मेरा भी एक परिवार है। मेरे पास एक बेटी, दामाद और नन्हीं सी नातिन है।”
आज की रात कदम्ब, वीथिका और रेशमा तीनों की ऑखों में नींद नहीं थी।
बहुत मान्यताओं, पूजा और पॉच वर्षों तक रिश्तेदारों के ताने सुनने के बाद जब कदम्ब और वीथिका के घर में नन्हीं वैदेही का जन्म हुआ था तो दोनों को जैसे पूरी दुनिया का साम्राज्य मिल गया। हालांकि बिटिया सुनते ही अम्मा का मुंह बन गया था।
अभी कदम्ब और वीथिका बेटी के जन्म की खुशी ठीक से मना भी नहीं पाये थे कि बाल रोग विशेषज्ञ ने उन दोनों पर वज्रपात कर दिया –
” बच्चे की रीढ़ की हड्डी में छोटा सा ट्यूमर है जिसका जितनी जल्दी आपरेशन करवा लेंगे अच्छा रहेगा वरना जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जायेगा समस्या बढ जायेगी और बच्चा जिन्दगी भर के लिये अपाहिज तो हो ही जायेगा है साथ ही मानसिक रूप से भी दुर्बल होता जायेगा क्योंकि इस ट्यूमर से इसका मस्तिष्क भी प्रभावित होता जायेगा ।”
सुनकर वीथिका और कदम्ब का दिल छलनी हो गया अपने कलेजे के टुकड़े के लिये ऐसी हृदय विदारक बात सुनकर। दुखी मन से तीन दिन की वैदेही को लेकर घर आ गया। बेटी के जन्म की खुशी गायब हो गई। अस्पताल से घर आते ही बेटी का जन्म सुनकर मंगलामुखियों ( किन्नरों ) का झुंड दूसरे दिन ही अपना नेग लेने और बधाई देने आ गया।
वीथिका और कदम्ब भले ही अन्दर से डॉक्टर की बात से दुखी और परेशान थे लेकिन अपनी सामर्थ्यानुसार बेटी के जन्म का शगुन और नेग दिया लेकिन किन्नर अम्मा से भी नेग मॉगने लगे – ” अम्मा, तुम भी दादी बनी हो, तुम भी शगुन दो हम लोगों को।”
लेकिन अम्मा ने नेग देना तो दूर बल्कि चीख पड़ी उन सब पर – ” काहे का नेग, एक तो इतने दिन बाद बिटिया पैदा की, वह भी अपाहिज और पागल। मेरे लड़के की तो जिन्दगी बरबाद हो गई। अब जिन्दगी भर इस अपाहिज को ढोता रहेगा।”
वीथिका तो कुछ नहीं बोली लेकिन कदम्ब से न रहा गया – ” ऐसे क्यों कह रही हो अम्मा, हम इसका आपरेशन करवा लेंगे और हमारी बिटिया ठीक हो जायेगी।”
” कहॉ से करवाओगे? जरा मुझे भी तो बताओ कि कौन सा अलीबाबा का खजाना गड़ा है तुम्हारे पास? मैं तो कल चली जाऊंगी और मुझसे एक पैसे की उम्मीद मत करना।”
किन्नर पहले तो एक दूसरे का मुंह देखते रहे फिर ऑसू भरी ऑखों वाली वीथिका की गोद में लेटी नन्हीं परी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देकर चले गये।
दूसरे दिन अम्मा चली गईं साथ ही कह गईं – ” अगली बार लड़का पैदा करना तब ज्यादा दिन आकर रुकूॅगी।”
कदम्ब जब शुरू में गॉव से शहर ग्रेजुएशन करने आया तो उसे एक फैक्टरी में रात के समय सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। दिन में वह अपनी पढ़ाई करता और रात को नौकरी जिससे उसका अपना खर्चा निकल आया करता और उसे अम्मा – बाबू से पैसे नहीं मॉगने पड़ते थे बल्कि वह तो पैसे बचाकर अम्मा बाबू और छोटी बहन के लिये कुछ न कुछ खरीद कर ले जाया करता था।
एक दिन उसके साथी सिक्योरिटी गार्ड ने उसे बताया कि इस फैक्टरी के ऑफीसर मिस्टर विनय गुप्ता रिटायरमेंट के बाद अपने बेटे के पास रहने के लिये कनाडा जाना चाहते हैं। इसलिये उन्हें एक ऐसे विश्वस्त व्यक्ति की आवश्यकता है जो उनके जाने के बाद उनके घर की देखभाल करता रहे क्योंकि वह अपना घर अपने जीते जी बेचना नहीं चाहते हैं। वह चाहते हैं कि यदि उनका कनाडा में मन न लगे तो वह वापस भारत आकर अपने घर में रह सकें। कदम्ब ने अपने साथी से कहा कि वह उसे मिस्टर गुप्ता से मिला दे।
कदम्ब जब विनय गुप्ता से मिला तो उन्होंने उससे कहा कि उसे उनकी अनुपस्थिति में उनके घर की देखभाल और माली का काम करना पड़ेगा बदले में वह उसे सर्वेन्ट क्वार्टर में रहने की जगह देंगे।
जब तक विनय गुप्ता भारत में रहे, कदम्ब ने उनका विश्वास जीत लिया। विनय गुप्ता जब भी भारत आते, कदम्ब उनकी भरपूर सेवा करता। यहॉ तक उनका खाना – चाय, कपड़े धोने का भी काम कर देता। उसे लगता कि जैसे वह अपने पिता की सेवा कर रहा है। विनय गुप्ता उसे घर की देखभाल के कोई पैसे नहीं देते थे। केवल रहने की जगह पाकर भी कदम्ब खुश था।
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मंगला मुखी (भाग-3) – बीना शुक्ला अवस्थी : Moral stories in hindi
बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर