मन का रिश्ता – पूजा शर्मा : Moral Stories in Hindi

जिंदगी भी कैसे-कैसे रंग दिखाती है पार्वती, कोई सोच भी नहीं सकता, मैंने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि अपना आखिरी समय मैं उस लड़की के घर बिताऊंगा जिसके लिए मैंने कभी दो शब्द भी प्यार के नहीं बोले, तुम्हें भी तुम्हारे दोनों बेटे और यहां तक की खुद मैंने भी सुकन्या के यहां लाने पर क्या-क्या नहीं सुनाया था? बिस्तर पर पड़े पड़े शंकर दयाल जी नम आंखों से अपनी पत्नी से कह रहे थे, मैं उससे अपनी आंखें भी नहीं मिला पाता हूं। अपने पति की पश्चाताप भरी बातें सुनकर पार्वती जी

की भी आंूखें नम हो गई और सोचने लगी सही ही तो कह रहे हैं जब से वो अपने भाई भाभी की मृत्यु के बाद अपनी भतीजी को अपने साथ अपने घर लेकर आई थी तो सुकन्या।के साथ-साथ उसके साथ भी किसी ने अच्छा व्यवहार कहां किया था? और वह बैठे-बैठे ही अतीत की स्मृतियों में चली गई। यूं तो अजय उसका चचेरा भाई था , पार्वती की शादी के बाद ही उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी और उसका बड़ा भाई तो काफी समय से ही अमेरिका में सेट हो चुका था

,जिसने अपनी छोटी बहन की खैर खबर लेने की कभी जरूरत ही नहीं समझी लेकिन अजय गरीब होते हुए भी पार्वती के मान सम्मान में कोई कमी नहीं करता था। मायके के नाम पर अजय ही तो था। सुकन्या उन्हीं की इकलौती लड़की थी। उसके भाई की कपड़े की दुकान थी और पार्वती के पति शंकर दयाल जी वकील थे शादी के कुछ समय बाद ही उनकी प्रेक्टिस अच्छी चल निकली । धीरे-धीरे उनकी गणना शहर के अच्छे वकीलों में होने लगी थी। जब सुकन्या 9th क्लास में पढ़ती थी।

उसकी भाभी की किसी की शादी में से आते हुए सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी और भाई की हालत गंभीर थी। जब वह अस्पताल में पहुंची तब उसने अपनी दीदी के हाथ जोड़ते हुए इतना ही कहा था मेरी बेटी को मां-बाप जैसा प्यार देना दीदी मुझे आपके अलावा किसी पर भरोसा नहीं है आप ही मेरी बच्ची को अच्छे परवरिश दे सकती हो। सुकन्या की बुआ होने के साथ-साथ आप दोनों का एक मन का रिश्ता भी जुड़ा हुआ है, पढ़ने में बहुत होशियार है मेरी बेटी डॉक्टर ही बनाना उसे,

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2दिन बाद ही भाई की भी मृत्यु हो गई थी। अपने माता-पिता की असमय मृत्यु से सुकन्या सदमें में चली गई थी। पार्वती की हालत भी अच्छी नहीं थी। सुकन्या के बचपन से ही पार्वती उसे बहुत प्यार करती थी, उसे देखकर वह अक्सर यही कहा करती थी भाभी एक बेटी ना होने की मेरे मन में बहुत कसक है सुकन्या को देखकर मुझे उस पर बहुत प्यार आता है मेरा मन करता है मैं इसे अपने साथ ले जाऊं सुकन्या का झुकाव भी अपनी बुआ की तरफ बहुत ज्यादा था।

सुकन्या की मां अक्सर हंसकर यही कहती थी जरूर आप दोनों का कोई पिछले जन्म का नाता है जो कुछ दिन में ही एक दूसरे को देखने को आप दोनों बेचैन हो जाती हो। पार्वती को जब सारी बातें याद आती तो वो व्याकुल हो जाया करती थी।खैर शुरू में तो सबने मिलकर सुकन्या को संभाल लिया उन दिनों पार्वती का बड़ा बेटा सौरभ दिल्ली के ही इंजीनियरिंग कॉलेज के लास्ट ईयर में था और छोटा बेटा अमित इंजीनियरिंग की फर्स्ट ईयर में पढ़ाई कर रहा था।

लेकिन धीरे-धीरे उसके दोनों बेटे उससे ईर्ष्या रखने लगे थे, बात-बात पर उसे नीचा दिखाना उनकी आदत हो गई थी, वह अपने दोनों बेटों को बहुत समझाया करती थी तुम्हारी बहन है सुकन्या उसके साथ ऐसा व्यवहार मत किया करो लेकिन उन दोनों की समझ में नहीं कुछ आता था। सुकन्या सबसे बहुत प्यार करती थी।

शंकर दयाल जी से अगर पार्वती अपने बेटे को समझाने को कहती तो भी यही कहते थे तुमने अपनी जान को आफत अपनी मर्जी से ली है मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। उन्होंने सुकन्या को कभी कहा तो कुछ नहीं लेकिन ज्यादा मतलब भी नहीं रखते थे। हां पार्वती को जरूर अकेले में उसे रखने के ऊपर ताने दिया करते थे।कुछ दिन बाद दोनों बेटों की जॉब लग गई थी। दोनों ने अपनी अपनी पसंद से शादी की थी। बड़ा बेटा बेंगलुरु में और छोटा बेटा मुंबई में सेट हो गया था। सुकन्या ने पहले ही प्रयास में नीट की परीक्षा पास कर ली थी।

दिल्ली एम्स में ही डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए उसे प्रवेश भी मिल गया था। शंकर दयाल जी की दोनों बेटे अपनी अपनी गृहस्ती में व्यस्त हो चुके थे कभी-कभी फोन करके माता-पिता का हाल-चाल पूछ कर उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाया करती थी। सुकन्या अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दोनों का बहुत ध्यान रखती थी। धीरे-धीरे शंकर दयाल जी बेटों की बेरुखी की वजह से मन ही मन बहुत परेशान रहने लगे थे और उन्हें डिप्रेशन की बीमारी लग गई थी।

 वह बिल्कुल चुप रहने लगे थे। धीरे-धीरे यूं ही समय गुजर गया सुकन्या की भी शादी हो चुकी थी। उसके पति भी दिल्ली में ही डॉक्टर थे। सुकन्या चाहती थी शंकर दयाल जी और पार्वती जी उसके साथ ही रहे। सुकन्या कहती थी अपनी बुआ से अगर आप ना होती पता नहीं मुझ बिन मां बाप की लड़की का क्या होता मेरा रोम रोम आप दोनों का ऋणी रहेगा मां? उसने बुआ को कब अपनी मां कहना शुरू कर दिया उसे भी याद नहीं? कुछ फर्ज मुझे भी निभा लेने दीजिए आप मेरे साथ चलो।

लेकिन उन्हें अपने घर में ही सुकून मिलता था , बेटी के घर जाकर नहीं रहना चाहते थे।एक दिन बिना किसी सूचना के अचानक अपने दोनों बेटों को आया हुआ देखकर शंकर दयाल जी और पार्वती जी चौंक गए बिना किसी भूमिका के उनके बच्चों ने कहा पापा अब आप दोनों हमारे साथ रहेंगे और आपको यह घर बेचना पड़ेगा

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क्योंकि हमें पैसों की सख्त जरूरत है आपके सामने ही बटवारा हो जाए तो अच्छा है। हम दोनों ने निश्चय किया है कि 6 महीने आप मेरे पास रहेंगे और 6 महीने सौरभ के पास। उनकी बात सुनकर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ यही उम्मीद थी उन्हें अपनी औलाद से। उन दोनों ने अपने बेटों के साथ जाने को मना कर दिया।

सुकन्या उन दोनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी शादी के बाद भी।अच्छे से निभाती थी। एक दिन शंकर दयाल जी को पैरालाइसेंस का अटैक आ गया, वो तो ईश्वर की मेहरबानी थी कि उस समय सुकन्या और उसका पति वहीं पर थे उन्होंने तुरंत अस्पताल में ले जाकर उनका इलाज शुरू कर दिया जिसकी वजह से वह ठीक हो गए थे

लेकिन अब शरीर कमजोर हो चुका था। सुकन्या ने उन्हें अकेले रहने से साफ मना कर दिया और अपने घर लेकर आ गई थी। दोनों भाइयों को सुकन्या ने खबर भी की थी लेकिन वह अपने पिता को देखने के लिए भी नहीं आए

  पार्वती शंकर दयाल जी से बोली, ऊपर वाले ने सुकन्या से हमारा मन का रिश्ता बांध दिया है। आज इस रिश्ते के सामने खून के रिश्ते भी बेकार लग रहे हैं।

 सुकन्या जो उन दोनोंकी बातें सुन चुकी थी पीछे से आकर बोली, फूफा जी, आप नहीं जानते आपने मुझे क्या दिया है, आपकी ही वजह से आज मैं डॉक्टर बन पाई हूं, आपकी सेवा करना मेरा फर्ज है। मुझे अपने से दूर करके पराया मत बनाइए। अब मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। इतना तो अधिकार है ना मेरा आप पर।

 हां बेटा, तेरे सिवा हमारा भी कोई नहीं है अब। अब तू मुझे फूफा जी नहीं पापा कहेगी। सुकन्या शंकर दयाल जी के गले लगकर रोने लगी और शंकर दयाल जी की आंखों से भी अविरल आंसू बहे जा रहे थे।

 किसी को क्या पता था कभी पार्वती का बनाया ये मन का रिश्ता उनके जीने का सहारा बन जाएगा। सुकन्या के लाख मना करने के बाद भी शंकर दयाल जी ने अपने घर का अब अस्पताल बनवा दिया है,।

 दोनों बेटों के साथ रहने से उनका जीवन कैसे गुजरता है यह तो पता नहीं लेकिन अपनी बेटी के साथ अब दोनों सुकून से जिंदगी जी रहे हैं? 

 पूजा शर्मा स्वरचित।

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