ममता का रिश्ता – सीमा प्रियदर्शिनी सहाय : Moral Stories in Hindi

सुधाकर जी ने अपने रिटायरमेंट से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह रिटायर होने के बाद अपने पैतृक आवास में ही जिंदगी के बाकी दिन गुजारेंगे।

इस बात से किसी को कोई आपत्ति भी नहीं थे।उनकी पत्नी मिनाक्षी को भी इस बात पर खुशी थी कि अब वे लोग अपने गांव अपने घर में रहेंगी।

उनकी सारी जिम्मेदारी लगभग खत्म थी  दोनों बेटियों की शादी हो गई थी और वे दोनों अपनी जिंदगी में खुश थीं। 

देखते देखते  सुधाकर बाबू रिटायर हो गए और फिर अपने सारे साजो सामान के साथ अपने गांव चले आए।

शुरू-शुरू में उनकी पत्नी और उनको गांव का माहौल उतना रास नहीं आ रहा था। जिन्हें शहर की आदत हो गई थी और एक लंबे अरसे तक लाइफस्टाइल की जीने की आदत हो गई थी।

पर उन्हें अपने दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि देने का यही तरीका सबसे अच्छा लगा था। उनका यह कहना था कि मेरे पिता ने पाई पाई जोड़कर इतनी बड़ी संपत्ति इकट्ठी की है। इससे मैं नहीं बेचूंगा।

मैं खुद ही जाकर गांव में रहूंगा ।उनकी दो बेटियां थी। दोनों की शादी हो गई थी। वे दोनों अपने-अपने ससुराल में खुश थीं। 

अब शहर से एकदम गांव के इस माहौल में एडजस्ट करने में  उन दोनों को समय लग रहा था।

ऊपर से गांव का माहौल कभी लाइट गोल कभी पानी।

मच्छर मक्खी का आतंक।ना डॉक्टर ना अस्पताल की फैसिलिटी।

लेकिन गांव की आबोहवा में जो कुछ खास था, वह शहर में ढूंढने पर भी नहीं मिलता। 

वह अपनापन, प्यार जो हर किसी में था और हर समय उड़ेलने के लिए तैयार रहता था। 

सुधाकर बाबू और मीनाक्षी को गांव में देखकर उनके जान पहचान, पड़ोसी और खेत खलियान सभी में काम करने वाले लोग इतने खुश हुए थे ।

उनकी खुशी देखते ही सुधाकर बाबू अपनी सारी दुख तकलीफ भूल जाते थे ।

यह अपनापन का रिश्ता था ।गांव की मिट्टी से जुड़ा हुआ रिश्ता, वहां की मिट्टी से जुड़ी हुई ममता थी जो उन्हें खींचकर गांव तक ले आई थी। 

एक दिन सुधाकर बाबू के खेतों में काम करने वाला रामदीन  एक दिन उनसे किसी काम से घर आया।

उसने मीनाक्षी से कहा “मालकिन अगर हमारे बेटे को थोड़ा पढ़ा दो तो अच्छा रहता।”

“वह स्कूल जाता है ना?”मिनाक्षी जी ने पूछा।

“हां मालकिन जाता तो है मगर ई गांव घर के स्कूल में का पढ़ाई करेगा? आपहों थोड़ा पढ़ा दीजिए ताकि अच्छा नौकरी चाकरी कर ले अब खेत खलिहान में कुछो ना रखा है।”

 “हां ठीक बोल रहे हो तुम रामदीन।”

तब से मीनाक्षी जी जन्मदिन के बेटे किसना को पढ़ाने लगी थीं।

धीरे-धीरे मीनाक्षी जी के दिल में किसना बसता चला गया।

वह पढ़ाई में भी मन लगाकर करता था ।घर के छोटे बड़े काम भी कर जाता था।

“मालकिन हम बड़े होकर दीदी लोग जैसे नौकरी करेंगे।”

“ हां हां बिल्कुल करना! हम तुम्हें इतना पढ़ाएंगे ना तुम देखना दीदी लोग से भी ज्यादा अच्छा नौकरी करेगा।

पर किसना तुम हमें मालकिन नहीं मां कहा करो।”

 “ठीक है मां !”अब से किसना मिनाक्षी को मां ही कहा करता था। 

समय बीतता चला गया ।मिनाक्षी जी अपनी बात पर अडिग रहीं ।

उन्होंने अपने दम पर किसना को शहर भेज कर पढ़ाया लिखाया ।

उसकी पढ़ाई लिखाई का सारा खर्चा खुद ही उठातीं थीं ।

पढ़ाई करने के बाद किसना ने बैंक की परीक्षा निकाल लिया।

उसने बड़ी खुशी से मिनाक्षी जी को यह संदेश सुनाते हुए कहा “मां हम बैंक की परीक्षा उत्तीर्ण कर गए हैं।

अब हमें पीओ की नौकरी मिल जाएगी।हम आपका आशीर्वाद लेने आ रहे हैं।”

मीनाक्षी जी अपनी दोनों बेटियों के कामयाब होने  और दोनों के अच्छे दामाद मिलने पर जितनी खुश नहीं हुई थी, उससे कहीं ज्यादा खुश किसना के पीओ बनने  की खबर से हो गई थी।

उनकी खुशी के मारे आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने बड़ी खुशी से किसना से कहा “ “बड़ी अच्छी खबर सुनाया तुमने बेटा।भगवान तेरा भला करे! जुग जुग जियो। जल्दी आओ तुम्हारी मां तुम्हारा इंतजार कर रही है।”

मीनाक्षी जी बड़ी खुशी से अपने पति को यह खबर सुनाते हुए कहा 

“हमारा बेटा पीओ बन गया जी! आप सुन रहे हैं ना! जाइए ना जरा भोलूहलवाई के यहां से मिठाई लेते आइए।

हमारे बेटे को लड्डू पसंद है।”

“हां हां अभी जाकर ले आते हैं। पहले उसे आने तो दो।”

 

“ बस वह आने ही वाला है। उसने हमें खबर किया था!”

मीनाक्षी जी जल्दी से जाकर आरती की थाल सजा लाईं ।

फूल और अक्षत रखकर बेसब्री से किसना का इंतजार करने लगीं ।

उन्होंने रामदीन और उसकी पत्नी लता को भी बुला लिया था ।

जैसे ही किसना घर में घुसा,

“रुको रुको ऐसे नहीं पहले तुम्हारी आरती उतार लेने दो!” मीनाक्षी जी ने किसना की आरती उतारी । उसके माथे पर रोली का तिलक लगाया।

कान के पीछे आंखों से निकाल कर काजल लगा दिया।

“ मेरे किसना तुम्हें किसी की नजर ना लगे!” किसना की आंखों में आंसू आ गए। वह रोता हुआ मीनाक्षी जैसे लिपट गया।

“ हम जो कुछ है आप ही की बदौलत हैं।

बस आपकी कृपा थी।”

“ कैसी बातें कर रहे हो बेटा! मां और बेटे के बीच एहसान और कृपा कहां से आ गया? यह तो हमारे बीच के मां बेटे का रिश्ता है ना!

तू मेरा बेटा है ना?”

“ हां मैं हूं तुम्हारा बेटा !”किसना ने मीनाक्षी जी के बगल में खड़ी हुई अपनी मां के पास  जाकर उनके पैर भी छू लिया और गले से लगा लिया ।

अपनी दोनों मांओं को गले से लगाते हुए कहा “जैसे भगवान कृष्ण की दो मांएं थीं वैसे ही में किसना की भी दो मां हैं ।

सभी लोग हंसने लगे।

“मुझे तो बेटा मिल गया और मेरी दोनों बेटियों को भाई भी!” मीनाक्षी जी बोलते हुए मुस्कुरा दी।

उनकी आंखों में खुशी के आंसू झिलमिलाने लगे थे। 

*

प्रेषिका -सीमा प्रियदर्शिनी सहाय 

नई दिल्ली 

#ममता का रिश्ता 

पूर्णतः मौलिक और अप्रकाशित रचना बेटियां के साप्ताहिक विषय के लिए।

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