“आपका दिमाग तो ठिकाने पर है ना मां जी”——-? 50000 का चेक आप हर 6 महीने में अनाथालय भिजवाती हैं— हमने कभी कुछ नहीं कहा परंतु आज तो आपने हद ही कर दी पूरे 5 लाख का चेक काटा है•••• प्रॉपर्टी आपकी है इसका मतलब यह नहीं कि हमारा कोई अधिकार नहीं•••••! शीतल ऊंची आवाज में ‘शांति देवी’
जो की दमा की वजह से खांसते जा रही थी इस वजह से वह जवाब देने की स्थिति में नहीं थीं, से बोली—। तभी शांति देवी का हेल्पर आता है जिसे 500000 का चेक देते हुए वह हाथ जोड़ लेती हैं और उसे जाने का इशारा करती हैं वह उन्हें प्रणाम कर वहां से चला जाता है—।
” बेटा मेरा इनहेलर कहां है”—?
‘माजी— हम कोई आपके दुश्मन नहीं बेटे-बहु हैं—आपको इतना समझाया फिर भी आप अपना धन दूसरों पर लुटाए जा रही है—- लगता है मरते- मरते सारा धन दान दे कर जाएंगी—!
पाआआआआ—नीइइइ—! कराहते हुए ।
जिनको धन दे रही है उनसे पानी मांगिये मुझसे नहीं—कहते हुए वह वहां से चली गई।
“शांति जी 8 साल की थी तभी उनके पिताजी की मृत्यु हो गई– बचपन से ही वह काफी होशियार थी मां के साथ “सिलाई-बुनाई” का काम करती तो मां-बेटी का गुजारा हो जाया करता।
18 साल की हुई तो उनकी मां कमला जी ने बेटी की शादी 30 साल के गैराज मालिक’ मनोहर’ से कर दी।
‘ मनोहर जी के घर में शांति के अलावा उनका अपना कोई नहीं था । पर यहां भी शांति जी की खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक पाई— “किडनी फेल” हो जाने से मनोहर जी की मृत्यु हो गई पति की बीमारी में इलाज के दौरान उनको गैराज भी बेचनी पड़ी। इधर असमय दामादजी की मृत्यु से एक दिन शांति जी की मां कमला भी चल बसी।
“ससुराल और मायका” इन दोनों ही जगह से शांति जी अब अनाथ हो गई घर में भी धीरे-धीरे पैसों की कमी होने लगी एक दिन ऐसा आया कि खाने के भी लाले पड़ने लगे ।
तभी उनके दिमाग में अपनी हुनर का ख्याल आया— फिर उन्होंने अपने आसपास एकाध पड़ोसी के कपड़े लेकर सिलने का काम शुरू किया— बुनाई-सिलाई में तो वह शुरू से पारंगत थीं ही।
अगर कोई एक बार उनसे कपड़े सिल्वा लेता तो वह फिर से लौट कर उन्ही के हाथों से सिलवाना पसंद करता ।
” धीरे-धीरे गांव भी अब शहर” का रूप ले रहा था।’ शांति जी का काम भी अच्छा चलने लगा— फिर क्या महिलाएं अपने-अपने ऑर्डर देकर जाने लगी•••• पर ऑर्डर्स ज्यादा आ रहे थे और एक अकेली होने की वजह से उन्हें दिक्कत महसूस होने लगी—।
फिर इनके दिमाग में लड़कियों को “प्रशिक्षित “करने का आइडिया आया••• लेकिन इसके लिए उन्हें “भारी पूंजी” की आवश्यकता थी सो उनके ही एक कस्टमर जो ग्रामीण बैंक में काम करते थे••• उनकी सहायता से उन्होंने ,”लघु उद्योग” के लिए बैंक से लोन लेकर”सिलाई तथा बुनाई” की मशीनें ले लीं—
जगह इनके पास तो थी हीं फिर’ ट्रेनिंग सेंटर’ खोल औरत तथा मर्द सभी को प्रशिक्षित करने लगी— साथ ही साथ सिलाई तथा बुनाई का काम भी । कुछ ही साल में उनके पास काफी मात्रा में ऑर्डर्स आने लगे और और उनका माल तैयार होकर बाहर जाने लगा। उनके द्वारा तैयार कपड़ों की डिमांड भी दिन पर दिन बढ़ने लगी ।
“शांति लघु उद्योग “में वर्कर्स प्रशिक्षित भी किए जाते तथा ऑर्डर्स भी तैयार किये जाते। इस तरह एक तीर से दो निशान—! कुछ ही सालों में “शांति जी एक प्रसिद्ध” महिला के रूप में जाने जाना लगी।
लेकिन जब रात में अकेली होती तो उनको यह अकेलापन काफी खलता । कभी-कभी सोचती मैं किसके लिए इतना सब कुछ कर रही हूं इसे आगे देखने वाला भी तो होना चाहिए।
“कोई तो इन्हें दोबारा शादी करने की सलाह देता” परंतु मनोहर जी के अलावा वह अब किसी को भी अपने’ पति का दर्जा ‘नहीं दे सकती थी—- ।
एक दिन :-
धन्यवाद आज से इन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी मेरी है•••” कागज पर हस्ताक्षर” करते हुए शांति जी बोलीं ।
समय का चक्का चलते गया । बच्चे भी बड़े होते गए•••••।
“बेटा प्रशांत एम बी ए कर अब मां की कारोबार को आगे बढ़ाने में लग गया—- । प्रशांत के ही कॉलेज में लड़की “शीतल” जिसको वह पसंद करता था—उसके साथ शांति जी ने बहुत धूमधाम से शादी करा दीं । बेटी माधवी की शादी शहर के “धनी व्यापारी” से हो गई। अब बेटा बेटी दोनों अपनी जगह सेटल हो गए थे।
पर यह आज अचानक शीतल क्यों शांति जी पर भड़क गई—- जानने के लिए आगे बढ़ते हैं :-
“शाम में प्रशांत घर आया तो “मां—! यह शीतल क्या कह रही है— आज आपने फिर से 5 लाख का चेक अनाथालय भेजा है—? तभी माधवी को देख– अरे माधवी तू कब आई– और सागर जी नहीं आए—-? नहीं भैया इनको अपने काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा । “मां की तबीयत खराब थी तो सोचा मैं अकेली ही चली जाती हूं— शांति जी को खाना खिलाते हुए बोली ।
अच्छा किया चली आई वैसे भी हम तुझे बहुत ही याद कर रहे थे••• अब आ ही गई है तो जरा मां को समझा हर 6 महीने में मां 50000 तो देकर आती ही थी साथ में महीने महीने अनाथालय जाकर कपड़े तथा मिठाइयां बांटतीं•••• लेकिन आज तो इन्होंने —- 5 लाख का चेक भिजवाया बता ऐसे क्या कोई पैसे लूटाते हैं—-?
बस भैया••• आज आप लोगों ने हद ही पार कर दी— मां—मुझे मत रोकना—!
चुप कर बेटा—! इनहेलर लेते हुए शांति जी बोलीं••••••मां कई साल से आपने मुझे चुप रखा—!
क्या मतलब है तेरा— प्रशांत बोला ।
“हम लोग के पास सब कुछ है, नहीं तो हम भी किसी की दया के सहारे जीते—! तभी शीतल भी वहां आ गई•••••” और हां भाभी—! आप जो बार-बार ये दावा करती हैं कि इस धन पर हमारा भी ‘अधिकार’ है तो सुनिए••• हम लोग अनाथ थे— और मां हमें अनाथालय से ही लेकर आईं। उनकी दया दृष्टि से हमारे पास—-
इज्जत, शोहरत, धन-दौलत सब कुछ— है —!इसका सिर्फ और सिर्फ कारण हमारी मां—-जिन्होंने हमें गोद लिया– हर महीने इसलिए वह जाती रहीं क्योंकि हम दोनों भाई-बहन की वजह से इनका “मन का रिश्ता “वहां जुड़ गया ।
प्रशांत हक्का-बक्का था ।
भैया ये सच है यह बात मुझे कभी पता नहीं चलता वो तो एक दिन मैंने रामू काका मां से हमारे बारे में बात करते हुए सुना– और जब मैंने ये बात मां से पूछी तो उन्होंने मुझे अपनी कसम दे दी कि ये बात मैं आपको कभी ना बताऊं ।
मां की इज्जत तो मैं करती ही थी तभु से मैं उनकी पूजा भी करने लगी•••••। आज मां ना होती तो पता नहीं हम कहां होते—? यहां आई तो भाभी को मां से बदतमीजियां करते हुए सुनी।
ये जो आज 5 लाख का चेक इन्होंने भिजवाई वो चेक हमारे तरह ही एक ‘अनाथ बच्ची’ जिसकी शादी की जिम्मेदारी आज से 10 साल पहले इन्होंने उठाई थी । कहते हुए माधवी रोने लगी ।
मां— हमें माफ कर दीजिए— हम तो आपसे माफी मांगने के काबिल भी नहीं प्रशांत ‘शांति जी’ के गोद में सर रखकर रोते हुए बोला — शीतल आज नि:शब्द खड़ी आंसू बहाए जा रही थी । शांति जी बेटे और बेटी दोनों के सर पर ममता का आंचल फैलाते हुए मुस्कुरा दी—-।
“दोस्तों कभी-कभी खून के रिश्ते से बढ़कर “मन का रिश्ता” होता है “अगर एक बार कहीं भी, किसी भी वजह से ये रिश्ता जुड़ जाए— तो हम चाह कर भी उस रिश्ते को खत्म नहीं कर सकते । अगर आपको मेरी कहानी पसंद आई हो तो प्लीज उसे लाइक्स कमेंट्स और शेयर जरूर कीजिएगा। धन्यवाद ।
लेखिका : मनीषा सिंह
# मन का रिश्ता