( रोबोट नही इंसान हूँ मैं )-  संगीता अग्ग्र्वाल

” नीति ये क्या है यार कैसे तैयार हुई हो तुम पार्टी के लिए ?” निकुंज अपनी पत्नी को तैयार हुए देख बोला। ” क्यों क्या खराबी है इसमे क्या मैं अच्छी नहीं लग रही ?” नीति हैरानी से बोली। ” सिर्फ अच्छा लगना जरूरी नहीं मेरे साथ मैच भी तो होनी चाहिए ना ..देखो नीति ये तुम्हारा बुलंदशहर नहीं ये मुंबई है जहाँ चेहरे की खूबसूरती से ज्यादा उसके पहनावे ,

उसके मेकअप वगैरह को भी देखा जाता है और जो तुमने ड्रेस पहनी है वो यहाँ की पार्टी के हिसाब से ठीक नहीं है !” निकुंज खीज के बोला। ” पर निकुंज इसमे खराबी क्या है तुमने बोला था वेस्टर्न थीम है मैंने वेस्टर्न पहना है फिर क्यों प्रॉब्लम है तुम्हें !” नीति को भी गुस्सा आ गया था। ” अरे तो वेस्टर्न का मतलब ये 4 गज का थान ही होता है क्या लाया था ना वो मिड्डी तुम्हारे लिए क्यों नहीं पहनी वो !” निकुंज चिल्लाया।

” क्योंकि मैं उसमे कम्फर्टेबल नहीं हूँ और जिसमे मैं कम्फर्टेबल नहीं उसे पहन कर पार्टी में कैसे जाऊं । तुम्हे इस ड्रेस में दिक्कत है तो तुम अकेले चले जाओ समझे वैसे भी ये आज का तो है नहीं तुम्हें तो मेरी हर ड्रेस से दिक्कत है !” नीति ने सैंडल खोले और बैठ गई। ” ठीक है नहीं जाना मत जाओ तुम अपनी मिडिल क्लास मेंटिलिटी मत छोड़ना ऐसा करो साड़ी पहन कर पल्लू ड़ाल कर रहा करो तुम !” ये बोल निकुंज जोर से गेट बंद करतेे हुए बाहर निकल गया। ” हर बार का यही है ये पहनो वो मत पहनो , ऐसे रहो वैसे मत रहो , इससे बात करो उससे मत करो ।

अरे मैं इंसान हूँ कोई रोबोट तो नहीं जो तुम जैसा फीड कर दोगे वैसे चलूंगी। मेरी अपनी मर्जी मेरा अपना स्वाभिमान कोई मायने नहीं रखता क्या !” नीति रोते हुए खुद से बोली। काफी देर रो लेने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और लेट गई। क्या एक औरत अपनी इच्छा से जी नहीं सकती क्यों हर बार उस पर अपनी मर्जी थोंपता आया है

ये पुरुष प्रधान समाज। और अगर औरत खुद को बदल भी ले तो कौन सा खुश होता है तब भी तो बात बात पर औरत के स्वाभिमान को छलनी ही किया जाता है। सोचते-सोचते नीति सो गई। निकुंज रात को देर से आया चूंकि उसके पास घर की चाभी रहती है उसने गेट खोला ओर आकर सो गया। सुबह दोनों के बीच अबोला रहा

नीति ने नाश्ता बना मेज पर रख दिया। निकुंज ने चुपचाप नाश्ता किया और तैयार होकर चला गया ना वो नीति से कुछ बोला ना नीति उससे। नीति को बुरा तो बहुत लगा पर आज उसका स्वाभिमान बहुत आहत हुआ था आज उसका मन बगावत करने का कर रहा था। उसने नहा धोकर अपनी पसंद की साड़ी पहनी ( निकुंज को साड़ियां बिल्कुल पसंद नही इसलिए नीति ने साडी पहनना ही छोड़ रखा था ) फिर उसने अपनी पसंद का खाना बनाया गट्टे की सब्जी और परवल ( ये दोनों सब्जियाँ निकुंज को बिल्कुल पसंद नहीं तो नीति ने बनाना ही छोड़ दिया था )

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आज उसको अच्छा लग रहा था अपनी पसंद के काम करके ऐसा लग रहा था शादी से पहले की नीति है वो …”शादी से पहले की ?” अचानक उसे कुछ याद आया और वो स्टोर रूम की तरफ गई और एक बॉक्स उठा लाई। दो साल से ये बॉक्स स्टोर रूम मे बंद था । उसने बॉक्स को झाड़ा पोंछा और उसमे से रंग , ब्रश ओर शीटस् निकाली। फिर रसोई में जाकर कड़क सी कॉफी बना लाई ( निकुंज को लाइट कॉफी पसंद थी तो नीति ने उसकी पसंद को अपनी पसंद बना लिया था ) कॉफी पीते हुए वो कागज पर ब्रश चलाने लगी ।

ब्रश चलाते हुए उसे वक़्त का होश ही ना रहा। ” ये सब क्या है ?” पेंटिंग मे खोई हुई नीति को अचानक निकुंज का स्वर सुनाई दिया। ” देख नहीं रहे मैं पेंटिंग कर रही हूँ !” नीति ने बिना उसकी तरफ देखे कहा। ” वो तो देख रहा हूँ पर दो साल बाद इन सबकी क्या सूझी ये साड़ी ये ब्रश ये सब है क्या ?” निकुंज तनिक गुस्से में बोला। ” ये असली नीति है जो कहीं खो गई थी पर अब मैं इसे ढूंढ लाई हूँ और अब खोने नहीं दूँगी ।”

नीति बोली। ” क्या बकवास कर रही हो?” निकुंज बोला। ” बकवास नहीं सच है ये काश तुमने समझा होता तुम्हारे लिए मैं कितना बदल गई पर तुम अपनी सोच ना बदल सके। हां हूँ मैं छोटी जगह से पर तुम्हारे लिए खुद को तुम्हारे सांचे में ढ़ाला। तुम्हारी पसंद को अपनाया भले मैं खुश नही थी पर तुम्हें खुश रखा पर उन सब में नीति कहीं खो गई

रात तुम्हारी बातों से एहसास हुआ खुद् को खोकर भी तुमको मैं पसंद नहीं तुम मुझसे खुश नहीं तो अब अपने आप को पाकर कम से कम खुद को तो खुश रख सकती मैं।” नीति ने कहा और जैसे ही पेंटिंग की तरफ देखा वो एक बेहद प्रसन्न औरत की तस्वीर बन गई थी जो बहुत सुंदर नज़र आ रही थी। निकुंज कुछ समझा कुछ अनजान रहा और मुंह हाथ धो खाने की मेज पर आकर बैठ गया। ” ये क्या बनाया है तुमने ?” नीति के खाना लगाने पर सब्जियाँ देख निकुंज बोला।

” ये मेरी पसंद की सब्जी है दो साल से मैं आपकी पसंद का खा रही पहन रही या यूँ कहो आपकी पसंद की जिंदगी जी रही हूँ क्या आप एक दिन भी मेरी पसंद का नहीं खा सकते !” नीति ने बेबाकी से कहा। निकुंज समझ गया इस बार नीति को उसकी बात कही गहरे से लगी है। ” देखो नीति जो कल हुआ उसके लिए मुझे माफ़ कर दो मैं वादा करता हूँ ऐसा दुबारा नहीं होगा!” निकुंज नीति के दोनो कंधे पकड़ बोला। ” अब मैं होने भी नहीं दूँगी क्योंकि मैं अब अपनी जिंदगी अपनी पसंद से और स्वाभिमान के साथ जियूँगी …अब तक तुम्हारी पसंद से जीकर देखी पर काश तुम समझ पाते एक औरत पत्नी बनने के लिए कितना कुछ त्याग करती है जो पुरुषों के लिए संभव ही नहीं । पर कोई पुरुष नहीं समझता एक औरत की क्या चाह होती है। खैर खाना खाओ ठंडा हो रहा है !” ये बोल नीति खुद भी खाना खाने लगी उसके चेहरे की दृढ़ता देख निकुंज चुप हो गया पर उसे आज स्वाद ले खाना खाते देख उसे बहुत अच्छा लग रहा था साथ ही उसे एहसास भी होने लगा था उसके लिए नीति ने खुद को कितना बदला है। दोस्तों हालांकि पति इतनी जल्दी नही बदलते पर आज नीति ने अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए खुद को वापिस पाने की शुरुआत तो कर दी थी इससे भले निकुंज खुश हो या ना हो नीति खुश थी। खाना खा बर्तन समेट वो फिर से ब्रश ले बैठ गई उसके चेहरे की चमक बता रही थी वो रोबोट नही सच मे इंसान है।

आपकी दोस्त

संगीता ( स्वरचित )

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