हां !मैं हाउस वाइफ हूं! – ज्योति आहूजा

 “कार्तिक उठो बेटा। उठो बच्चे। 6:30 बज गए। स्कूल नहीं जाना क्या?

“मां भूमिका ने बेटे कार्तिक को आवाज लगाई।

“उसे उठाकर बाथरूम में फ्रेश होने भेज दिया और खुद किचन में जाकर उसका नाश्ता और स्कूल का टिफिन तैयार करने लगी।

उसके बाद कार्तिक के कुछ और छोटे-मोटे कामों को निपटा कर उसे स्कूल भेजते ही अपने और पति आदित्य के लिए चाय बनाई और आदित्य को चाय देकर घर के कामों में व्यस्त हो गई।

आदित्य के लिए ऑफिस का टिफिन तैयार करके उसके लिए नाश्ता बनाया। जैसे ही नाश्ता देने लगी। तब आदित्य ने कहा। भूमिका तुम्हारी नाश्ते की प्लेट कहां है। आओ साथ बैठ कर नाश्ता करते हैं।

तभी भूमिका कहती है। आप नाश्ता करो। आपको ऑफिस के लिए लेट हो जाएगा। मैं आराम से कर लूंगी मुझे कोई जल्दी नहीं है।

इस पर तुरंत आदित्य कहता है। मुझे पता है तुम मेरे जाने के बाद ढंग से नाश्ता भी नहीं करोगी। तुम्हें सिर्फ दूसरों का ख्याल रहता है। खैर। वादा करो तुम खाने पीने कापूरा ध्यान रखो गी। ऐसा कहकर आदित्य ऑफिस के लिए रवाना हो जाता है।

कुछ इस तरह से है एक हाउसवाइफ और मां भूमिका की रोजमर्रा की जिंदगी।

आदित्य और भूमिका की शादी को 10 साल हो गए हैं। शादी से पहले भूमिका नौकरी करती थी। जब भूमिका मां बनने वाली थी तब न जाने उसके मन में कितने तरह के विचार,उमंगो व तरंगो ने जन्म लिया और  उसने मातृत्व के सफर को बखूबी तय करने का निश्चय किया। घर की जिम्मेदारियों से और बेटे की परवरिश में भूमिका कोई कमी नहीं रखती थी।

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एक दिन दोपहर के 2:30 बजे। बेटा कार्तिक स्कूल से आकर मां से कहता है। मम्मी मेरे सब दोस्तों की मम्मी काम पर जाती है। जॉब करती है।आप भी जाओगे?

क्यों आज स्कूल में कोई बात हुई क्या?मां ने पूछा!

वो स्कूल  में अंकित अपनी मम्मी के बारे में बता रहा था ना। इसलिए पूछा।बेटे कार्तिक ने कहा।

इस पर भूमिका प्यार से कस के उसे एक जादू की झप्पी देते हुए कहती है ।”तुम्हारे पापा के साथ-साथ अगर मम्मा भी काम पर चली जाएंगी तो प्यारे से कार्तिक  का ध्यान कौन रखेगा? इस लिए मै काम पर नहीं जाऊंगी।अच्छा।

ठीक है ।कार्तिक ने हंस कर कहा।

  तभी भूमिका बेटे से कहती है।आप हाथ मुंह धो लो ।मम्मा आपके लिए खाना लेकर आती है।

इतने में कार्तिक कहता है। “मम्मा आपको पता है मदर्स डे आने वाला है और गर्मी की छुट्टियां भी शुरू होने वाली है। तो क्लास टीचर ने कहा है । छुट्टियां शुरू होने से पहले इस बार हमारे स्कूल में मदर डे का सेलिब्रेशन किया जाएगा। उसमें सब बच्चों की मम्मी को बुलाया है।

आप आओगे ना ?कार्तिक ने पूछा।

“हां ।बिल्कुल बेटा मैं जरूर आऊंगी। ये भी कोई कहने की बात है। भूमिका ने बेटे से कहा।

“जल्दी ही मदर्स डे भी आ गया। उस दिन दोनों मां बेटा स्कूल में सेलिब्रेशन के लिए पहुंचे। थोड़ी देर में सेलिब्रेशन शुरू हुआ। उसमें स्कूल के अनेक बच्चों की माएं अाई हुई थी। उन्हीं बच्चों में से कुछ बच्चों की मां को स्टेज पर बुलाकर उनसे उनके  स्वयं के और उनकेमातृत्व के अनुभव  के बारे में पूछा जा रहा था। जिसमें भूमिका का नाम भी शामिल था।

“जब भूमिका की बारी अाई तब उसने अपने बारे में बताना शुरू किया।

उसने कहा “मैं एक हाउसवाइफ हूं और एक मां भी।जी हां एक हाउसवाइफ।

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उसने फिर कहा। “अपने पति के साथ साथ मैं अपने घर की भी पत्नी हूं।  जिस तरह से मुझे अपने पति से प्रेम है।  वह मेरे पति और मैं उनकी पत्नी। वैसे ही मुझे अपने घर से प्रेम हो गया है। शादी के अगले दिन गृह प्रवेश के वक्त रोली से रंगे हुए पैरों के अमिट निशानों को देख जो कि घर की चौखट से अंदर आ रहे थे उसी दिन मैंने घर से प्रेम करना सीख लिया था।  जीवन की हर कठिनाइयों में चाहे जो कुछ मर्जी हो जाए पति से  कभी अलग ना होयुं। कुछ एसा प्यार भरा रिश्ता पति पत्नी के बीच में होता है। घर के साथ भी कुछ ऐसा ही रिश्ता बन गया है।

फिर भूमिका ने अपनी मातृत्व के सफर के बारे में बताना शुरू किया। उसने कहा। “बहुत लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम पढ़ी लिखी हो। तुम नौकरी क्यों नहीं करती हो?क्या घर पर रहती हो। तुम घर पर रहकर बोर नहीं हो जाती। घर से बाहर निकलो गी ।खुद कमाओगी।तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा। शादी से पहले तो तुम नौकरी करती थी। तो अब क्यों छोड़ दिया।

कुछ लोग तो ऐसे भी कहते हैं “जो घर पर रहते हैं उनकी अहमियत कम हो जाती है। ऐसे बहुत से मशवरे मुझे समय-समय पर दिए जाते गए हैं।

परंतु मैं थोड़ा अलग सोचती हूं।  मुझे जो ठीक लगा मैंने वह किया। कार्तिक के पैदा होने के बाद जीवन ने मुझे  दो अवसर दिए। पहला अवसर अपनी नौकरी को जारी रखो। दूसरा नौकरी छोड़ अपने नन्हे शिशु के पालनपोषण में कोई कमी ना रखते हुए इसके सुंदर भविष्य के निर्माण में मुख्य भूमिका निभायू। बहुत सोच विचार करने के बाद मैंने दूसरा रास्ता चुना। क्योंकि यह मेरा अपना स्वयं का फैसला था।

“भूमिका ने फिर कहा। “जीवन में हर किसी की अपनी अपनी इच्छाएं ,अपने -अपने विचार होते है। सबको अपनी इच्छा को पूरा करने का अधिकार है। मुझे घर पर रहकर अपने दायित्व का, अपने मातृत्व का निर्वाह करना उचित लगा !सो मैंने  वह किया।

“मुझे अपने बच्चे और अपने पति के इर्द-गिर्द घूमती दुनिया का सफर करने में बड़ा मजा आता है। मैं इसका आनंद उठाने में बिल्कुल नहीं चूकती हूं। उदाहरण के तौर पर मैं इंतजार करती हूं  कि कब2:30 बजे और कार्तिक घर आए। उसके कदमों की आहट सुनते ही घंटी बजने से पहले मैं उसके लिए दरवाजा खोलती हूं। ऐसा करने पर जो बच्चे के चेहरे पर मुस्कान देखने को मिलती है। और वह कहता है। “अरे मम्मी आपको कैसे पता चला?वह मुस्कान इस दुनिया के सभी सुखों से बढ़कर है। स्कूल से आते ही उसे जोर से गले लगाती हू। मेरा ऐसा मानना है इससे बच्चे का मानसिक विकास तीव्र गति से होता है। मां और बच्चे में भावनात्मक संबंध बढ़ता है। बच्चे को भी लगता है कि घर पर कोई तो है जो उसका इंतजार कर रहा है। उसके हर एक सवाल का जवाब देने के लिए मैं हर पलउसके सामने होती हूं।  यह मेरे अंतर्मन को खुशी देता है। जो  अनमोल पल मैं घर रह कर अपने नेत्र रूपी कैमरे में कैद करती हूं  ।वे आने वाले भविष्य में याद रखने वाले पल होंगे। मैं घर रहती हूं इसीलिए यह सब देख पाती हूं।

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कई बार मुझसे आस पड़ोस की माएं कहती है कि उनके बच्चे घर बहुत बिखेर कर रखते हैं। और मैं कहती हूं कि मेरा बेटा कार्तिक घर को बिखेरे और मैं  सवारू। बच्चे के बड़े होने के बाद जब यह नौकरी करने बाहर चला जाएगा। तब कोई नहीं होगा घर को बिखरने वाला। फिर हम चाहेंगे कि घर में रौनक हो ।कोई तो आए । मैं हाउसवाइफ हूं। इसलिए यह पल देख पाती हूं और मजा उठाती हूं।  यकीन मानिए इन पलों को मेरे पति कई बार बहुत मिस करते हैं।

“भूमिका ने फिर कहा। “समय बहुत तीव्र गति से कब आगे बढ़ जाता है पता नहीं चलता। छोटा सा कार्तिक आज 9 साल का हो गया है। पता भी नहीं चला। ऐसे ही कब जीवन के 15 साल बीत जाएंगे और पंख लगा के एक पक्षी की भांति यह बच्चे भी उड़ जाएंगे।अपने जीवन में मस्त हो जाएंगे। हमें नहीं पता यह हमारे साथ रहेंगे या नहीं? जीवन किस दिशा की ओर मुख करता है हमें यह भी नहीं पता।तब यही आज के इनके साथ बीते हुए पल हमारेजीवन का आधार होंगे।मैं इन पलों को सहेज के रखना चाहती हूं।

“और ऐसा नहीं है कि मैं इन सब चीजों से कभी बोर नहीं होती। मैं भी कभी-कभी बोर हो जाती हूं। वही दिन भर का रूटीन। वही सुबह उठो। घर के काम करो। कभी-कभी तनावग्रस्त भी महसूस करती हूं। परंतु रूटीन में थोड़ा बदलाव करके फिर से अपने आपको एक नए दिन के लिए तैयार कर लेती हूं।

“आगे भूमिका फिर कहती है”कई बार नकारात्मकता मुझे भी घेर लेती है। उदाहरण के तौर पर नकारात्मक विचार जैसे कि मैं सारा दिन घर रहती हूं। किसी को मेरी क्या अहमियत? अहमियत तो उनकी होती है जो दूर रहते हैं । परंतु कुछ छोटी-छोटी बातों से मेरीयह नकारात्मकता दूर हो जाती है।  उदाहरण केतौर पर यदि मै बच्चे के स्कूल से आने के बाद घर पर ना मिलू । तो मेरा बेटा घर आसमान पर उठा लेता है। मम्मी कहां है? मम्मी दिखाई नहीं दे रही। ऐसी अनेक छोटी छोटी बातें मेरे अस्तित्व को और मजबूत कर देती हैं।

“जैसा एक हाउसवाइफ के साथ होता है। वैसा एक नौकरी पेशा मां के साथ भी होता होगा। उन्हें भी कभी-कभी अपने डेली रूटीन से बोरियत होती होगी। नौकरी पेशा मायों की जिंदगी आसान थोड़े ही होती होगी। उन्हें तो बल्कि दो-दो काम करने पड़ते हैं। ऑफिस के साथ-साथ थोड़ा बहुत घर की जिम्मेदारी तो हर महिला को निभानी पड़ती है। वे भी नौकरी करते समय अपने बच्चे के उन पलों को बहुत मिस करती होगी। और सोचती होंगी की कब काम खत्म हो और घर जाकर बच्चे के संग खेलें! उसके साथ समय बिताएं!आखिर मां तो मां होती है।ऐसा मेरा मानना है।

“तो हाउसवाइफ की भूमिका निभाते निभाते ऐसा है मेरा मातृत्व का सफर। भूमिका ने अंत में कहा।

भूमिका के इन शब्दों को सुनने के बाद तालियोंकी आवाज से पूरा स्टेज गूंज रहा था।

और दूर खड़ा अपनी मां को सुन रहा कार्तिक अपनी मां पर गर्व महसूस कर रहा था।

कहानी पढ़कर आपकी प्रतिक्रिया के इंतजार में।

ज्योति आहूजा।

 

 

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