मानू जब घर में आया तो घर में मानो बहार आ गई, हो भी क्यों नहीं? वासंती जी और रवींद्र जी के बड़े बेटे अमित की पहली संतान जो था। कविता भी अपने बेटे को सास-ससुर और देवर सुनील के द्वारा मानू को हाथों-हाथ रखने से बहुत खुश थी।
मानू को पलकों में सहेज कर पाला जाने लगा। प्यारा सा छोटा सा तीन साल का मानू घर भर में घूमता जो चाहता बस इशारे भर कर में मिल जाता। मानू कभी रसोई के बरतन बिखेर जाता तो कभी अलमारी बिखेर देता। दादा-दादी का लाड़ला मानू, उसको कोई कुछ कह नहीं सकता था।
लाड़-प्यार तो समझ में आता है पर अब मानू को थोड़ा दूसरों को भी समझना होगा ऐसा सोचकर कविता मानू को जिद करने पर कभी टोकती तो मानू दादा, दादी, चाचा या पापा की पनाह पा जाता।
नतीज़ा यह हो रहा था, मानू की अगर ज़िद पूरी न की जाए तो वह पैर पटक पटक कर जमीन पर लोट जाता, चिल्लाने लगता या रो रोकर अपनी बातें मनवाने की कोशिश करता।
तीन वर्ष का होने पर मानू अब स्कूल जाने लगा है। कविता के साथ साथ अमित को भी लगने लगा कि बेटा जिद्दी बन गया। अमित ने अपने मम्मी पापा से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, ” बच्चा है, हमारा लाड़ला है । थोड़ा बड़ा होगा तो अपने-आप सब ठीक हो जाएगा।”
स्कूल से मानू के बच्चों से हल्की फुल्की मारपीट की शिकायतें आम हो गईं थीं।
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तीन साल बीत गए इस बीच मानू के चाचा सुनील की शादी हो गई। सुनील की पत्नी माया ने मानू के ज़िद को देखते हुए कुछ कहने की कोशिश की पर सास-ससुर को पसंद नहीं आने पर उसने इस बारे में बोलना छोड़ दिया।
मानू माया के रूम में जाकर उसका सामान उलट पुलट कर देता। कुछ कहने पर दादा दादी पक्ष लेने आ जाते।
माया ने सुनील का स्थानांतरण दूसरे शहर में करवा लिया। माया के दो साल बाद बेटी हुई और इधर कविता के भी दूसरा बेटा हो गया। माया दो महीने बाद अपनी बेटी के साथ चली गई।
मानू जो अब तक आठ साल का हो चुका था उसे अपने भाई गोलू पर सभी का ध्यान देना अधिक नहीं भाया। जब तब वो चाहता कि सभी का सेंटर ऑफ अट्रैक्शन वहीं रहे पर अब यह इतना सरल नहीं था। कविता गोलू के काम करती तो वह चिड़ जाता दादा-दादी को भी गोलू के पास जाने से मना करता था। दादा-दादी की भी उम्र होने लगी अब तो वे मानू के साथ इतना खेल नहीं पाते।
अब सभी अमित और खासतौर पर कविता को कहने लगे कि कैसा बच्चा है! अपने छोटे भाई को भी सहन नहीं कर पा रहा है। दादा-दादी की भी डांट मानू को पड़ने लगी।
कविता का दिमाग खराब हो जाता मानू की घर-बाहर की शिकायतें सुनकर, नतीज़ा ये हुआ कि कविता का हाथ मानू पर उठने लगा मानू पर। जो दादा-दादी हर गलती पर मानू को शह देते थे वहीं अब मानू की हरकतों को देख अमित से शिकायत करते। अमित का गुस्सा भी कभी कविता तो कभी मानू पर निकलता। कविता गोलू पर ज्यादा ध्यान देने लगी वह मानू की तरह गोलू को जिद्दी नहीं बनाना चाहती थी।
इन सब में मानू घर से दूर होने लगा, कारण ये था कि मानू जो इतने लाड़ से पला था , हमेशा सभी की आंखों का तारा था कभी मार तो छोड़ डांटा भी नहीं गया था हर समय गलतियों पर पर्दा डाल कर उसे जिद्दी बना दिया गया उसके अपनों के द्वारा। उसे एकदम से किनारे कर दिया गया , दादा-दादी भी प्यार की जगह गलतियां गिनाने लगे। मम्मी पापा को देख कर भी मानू को यही लगता कि वे भी गोलू से ही प्यार करने लगे हैं।
ऐसे ही पांच साल बीते, गोलू पांच साल का हो चुका था। अब हर आने जाने वाला गोलू और मानू की तुलना करता । गोलू को हर बात में मानू से अधिक अच्छा बताया जाने लगा। मानू पर इन सब बातों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव होने लगा।
धीरे-धीरे मानू का घर से मोह कम होता गया। एक दिन आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला मानू स्कूल तो गया परन्तु फिर कभी वापस घर नहीं लौटा।
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कविता और अमित ने सब जगह मालूम किया, पुलिस कम्पलेंट भी दर्ज की पर मानू के बारे में कुछ नहीं पता चला।
साथ पढ़ने वाले बच्चों से पता चला कि मानू कहता था , “अब घर में उसे कोई प्यार नहीं करता है, उसका मन नहीं लगता है घर में। पहले दादा-दादी का प्यार था अब वे भी मुझे बदतमीज कहते हैं पहले जिन बातों के लिए कोई डांटता नहीं था अब दिन पर दिन उन्हीं बातों के लिए कहते रहते हैं। गोलू अब सबका प्यारा बेटा है उसी को रखें, मैं बहुत दूर चला जाउंगा।”
इस बात को दस साल हो गए हैं आज भी कविता मानू को याद कर रोती है अपने को कोसती है कि काश मानू को शुरू से ही रोका होता। बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं पर उनको सही ग़लत का ज्ञान तो बड़े ही कराते हैं। दादा-दादी भी अपनी गलती समझकर अपने पर शर्मिंदा रहते हैं, न उन्होंने इतना मानू को उसकी गलत बातों पर बढ़ावा दिया होता न वो इतना जिद्दी बनता। अमित के दिल पर मानू के जाने का इतना गहरा असर हुआ कि उसे हाई ब्लडप्रेशर रहने लगा। कविता समेत परिवार के सभी सदस्यों की ऑ॑खें पछतावे के ऑ॑सुओं से लबालब भरी रहती हैं।
लेखिका की कलम से ⬇️
दोस्तों, हर लड़की जब पहली बार माॅऺ बनती है तो उसको अनुभव न होने के कारण वो बहुत लोगों की बातें सुनकर उलझन में पड़ जाती है कि क्या वो सही कर रही है या परवरिश और बेहतर हो सकती है?
बच्चों को प्यार करें पर साथ ही उन्हें सही ग़लत में अंतर करना भी सिखाएं इसके लिए यदि थोड़ा सख्त रवैया भी अपनाना पड़े तो करें। अनावश्यक तौर पर बच्चों को ग़लत करने के लिए नहीं उकसाएं। बच्चे घर से, घर के बड़ों से ही सीखते हैं तो संतुलित व्यवहार से बच्चों में अच्छी आदतों का समावेश करने का प्रयास करें।
जैसा आप सिखाएंगे वैसा ही बच्चा सीखेगा; इसी लिए तो कहावत है कि “जैसा बोओगे वैसी ही फसल तो काटोगे।”
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-प्रियंका सक्सेना
(स्वरचित व मौलिक)
#पछतावे_के_ऑ॑सू