मेरा नाम कोमल है । मैं जबसे शादी करके ससुराल आई थी हमारे घर में लक्ष्मी ही काम करती थी । सब उसे नौकरानी कम घर का सदस्या ज़्यादा मानते थे । मेरे पति प्रकाश बचपन से हॉस्टल में रहते थे इसलिए उनका लक्ष्मी के साथ बातचीत कम था ।
लक्ष्मी का पति ऑटो चालक था । उनकी एक छोटी सी बच्ची थी जिसका नाम अमला था ।
शादी के चार साल में हमारे दो बेटे हो गए थे। सास ससुर की मृत्यु हो गई थी । मेरी चाह थी कि मेरी भी एक बेटी हो परंतु प्रकाश इसके लिए तैयार नहीं थे ।
उनका कहना था कि इस ज़माने में इतनी छोटी सी नौकरी में तीन बच्चों को पालना बहुत मुश्किल है । इस तरह से मेरी चाहत पूरी नहीं हो पाई थी।
लेकिन मैं अमला को ही बेटी के समान देखने लगी थी । हमारे बच्चे भी उसे दीदी कहकर पुकारते थे और उसके साथ खेलते थे । वह भी इन दोनों की बड़ी बहन के समान बहुत फ़िक्र करती थी ।
लक्ष्मी चार दिन से काम पर नहीं आ रही थी क्या हुआ है मालूम नहीं है । घर में मेहमान आए हुए हैं सारे काम मुझे अकेले को ही करना पड़ रहा था इसलिए ग़ुस्से में कई बार मैं लक्ष्मी को मन ही मन गाली दे रही थी ।
मेहमानों के जाने के बाद एक दिन दोपहर को मैं लक्ष्मी के घर गई तो उसके घर पर ताला लगा हुआ था । आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि लक्ष्मी ,पति और अमला का एक्सिडेंट हो गया है । पति ऑन द स्पॉट गुजर गए हैं माँ बेटी अस्पताल में हैं ।
मैं सीधे अस्पताल पहुँची तो अमला को ज़्यादा चोट नहीं आई थी पर लक्ष्मी की हालत नाज़ुक थी । मुझे देखते ही उसकी आँखें चमक उठी बोल तो नहीं पा रही थी पर आँखों से अमला की तरफ़ इशारा कर रही थी । शायद उसे उसकी फ़िक्र थी मैंने उसे दिलासा दिलाया था कि मैं अमला की देखभाल करूँगी ।
वहीं पर एक नर्स को अपना फोन नंबर दिया और घर आ गई । जब मैंने घर आकर प्रकाश को लक्ष्मी के बारे में बताया था तो कहने लगे कि क्यों बेकार के झमेलों में पड़ती हो अस्पताल वाले सब देख लेंगे। अब तुम्हें वापस वहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं है ।
इस कहानी को भी पढ़ें:
मैंने जब कहा कि अमला को हम पाल लेते हैं तो बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा हो गए थे और कहने लगे थे कि ऐसा कभी नहीं हो सकता है।
दूसरे ही दिन नर्स का फोन आया था तो मैं अस्पताल पहुँच गई देखा लक्ष्मी गुजर गई है । थोड़े से पैसे वहाँ जमाकरके अमला को लेकर मैं घर आ गई ।
अमला ऐसे अकेले छोड़ नहीं सकती थी प्रकाश से धीरे से इसके बारे में बात करूँगी ऐसा सोचकर अमला को घर ले आई । अमला को अपने घर में देखने के बाद प्रकाश ने ना तो हाँ कहा और ना ही ना कहा था । वह हमारे साथ रहने लगी । मैं सोचती थी कि उसे पढ़ा लिखा कर अपने पैर पर खड़ा होने के लायक़ बना दूँगी तो बस है और कुछ नहीं ।
मेरे बेटे दोनों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की । अमला ने एम एसी किया और यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की नौकरी करने लगी थी । उसने शादी करने से इनकार कर दिया था इसलिए हमने बेटों की शादी करा दी थी ।
जैसे ही घर में बहुएँ आई अमला यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहने लगी । कुछ दिनों तक सब ठीक चला अचानक बेटों ने एक दिन कहा कि हम केनडा जा रहे हैं ऑफिस की तरफ़ से आप दोनों भी हमारे साथ आ जाओ । मैंने और पति ने सोचा था कि दोनों बेटे बहुएँ सब साथ में रहेंगे ऐसा सोचकर ही इतना बड़ा घर बनाया था । अचानक उनके केनडा जाने की बात सुनकर सकते में आ गए थे । जब उन्होंने हमें भी अपने साथ चलने की बात कही तो हमारे हलक से यह बात नहीं निगली गई थी । हम दोनों ने मिलकर यह फ़ैसला किया था कि इतने बड़े घर को छोड़कर उनके पीछे जाने के बदले हम दोनों यहीं रहेंगे तो अच्छा है । जब बच्चे मिलकर नहीं रहना चाहते हैं तो रिश्तों को बचाने का यही एक तरीका है कि हम उन्हें अकेले छोड़ दें ।
यह सोचकर बच्चों को अपना फ़ैसला सुना दिया और उनके साथ केनडा जाने के लिए मना कर दिया ।
उनसे एक बार पूछा जरूर था कि यहाँ अच्छी नौकरी है बड़ा घर है सबसे बड़ी बात हम सब साथ मिलकर रहते हैं फिर तुम लोग केनडा क्यों जाना चाहते हो । उनका कहना है कि यहाँ की सेलरी से वहाँ की सेलरी अधिक है ऐशो आराम है बच्चों के भविष्य के लिए अच्छा है । हमारी दोनों बहुओं को यहाँ सबके साथ मिलकर रहना पसंद नहीं आ रहा था । मैंने इस बात को भाँप लिया था मुझे लगा था कि आपस में मनमुटाव के आने के पहले ही सब राजी ख़ुशी अपना जीवन जी लें तो अच्छा है इसलिए मुझे लगा कि इन बेरंग रिश्तों में रंग भरने का समय आ गया है । सबको अपनी ज़िंदगी जीने दूँ तो रिश्ते रंगों में भर जाएँगे ।
बच्चे खुश थे कि हमने बुलाया वे नहीं आए हमारी गलती नहीं है । बस दोनों बेटे अपने परिवार को लेकर केनडा चले गए ।
मैं और पति अकेले ही घर में रहने लगे थे । इतने दिन बच्चों और बड़ों के कारण भरा हुआ घर अब काटने को दौड़ता था । उस दिन हम दोनों बैठक में टी वी देख रहे थे कि बाहर दरवाज़े पर बेल बजी ।
इस कहानी को भी पढ़ें:
मैं ही धीरे से उठकर गई दरवाज़ा खोला तो सामने अमला खड़ी थी । मुझे देखते ही मेरे गले लग गई और कहने लगी थी कि मैं कॉन्फ़्रेंस के लिए पूना गई थी बड़ी माँ आप दोनों कैसे हैं। कहते हुए अंदर आई । हेलो बड़े पापा कहते हुए बैठक में सिर्फ़ हम दोनों को ही देख कर कहा घर ख़ाली है बाकी सब कहाँ हैं ।
प्रकाश ने उसे सब कुछ बता दिया । उसने कहा ठीक है कोई बात नहीं है अब हम सब साथ में रहेंगे । मुझे यूनिवर्सिटी की तरफ़ से क्वार्टर मिला है आप दोनों मेरे साथ चलिए इस घर को किराए पर दे देते हैं । पहले तो हम दोनों ने कहा कि तुम यहाँ आकर हमारे साथ रहो तो अच्छा रहेगा । लेकिन वह नहीं मानी कहने लगी थी कि यूनिवर्सिटी के क्वार्टर में रहेंगे तो मुझे आने जाने में तकलीफ़ नहीं होगी हम वहाँ रहेंगे तो मुझे फ़िक्र भी नहीं रहेगी ज़रूरत पड़ने पर मुझे घर पहुँचने में समय नहीं लगेगा ।
उसने ही सारे काम किए थे । अपना घर किराए पर देकर हम अमला के साथ आकर उसके क्वार्टर में रहने आ गए थे ।
जब भी प्रकाश उसे आंटी अंकल कहते हुए हमारे आगे पीछे घूमते हुए देखते थे तो मुझसे कहते थे कि बेटियाँ हमेशा रिश्तों में रंग भर देती हैं। एक समय था जब मैं इसे घर लाने के लिए मना कर रहा था और विधि का विधान देखो आज हम उसके घर में आकर उसके साथ रह रहे हैं । एक बात मुझे आज भी खलती है कि बचपन से हमारे साथ मिलकर रहने पर भी उसने कभी भी हमें माँ पापा नहीं पुकारा । हमेशा ही बड़ी माँ बड़े पापा ही कहती थी ।
के कामेश्वरी
#बेरंग रिश्तों में रंग भरने का समय आ गया है