राधा एक सीधी सादी, माँ बाप की एकलौती संतान थी। बहुत होनहार औऱ खुद्दार थी। उसकी कालोनी का एक लड़का आकाश भी उसकी क्लास मैं था। दोनो बचपन से ही साथ साथ पड़ते हुए कॉलिज तक पहुचे थे। दोनों अच्छे दोस्त थे और दोनो में अच्छी अंडर स्टैंडिंग थी।
आकाश उसे दिल ही दिल चाहता भी था। उसकी क्लास में अशोक नाम का एक लड़का था जो पैसे वाले बिजनसमेन का इकलौता बेटा था। वो पढ़ाई में एवरेज पर जिद्दी था। फाइनल ईयर की बात है, वेलेंटाइन डे पर अशोक ने आशा का रास्ता रोक कर प्रपोज कर दिया।
आशा ने भी गुस्से में अशोक को थप्पड़ मार दिया ओर कॉलेज में हंगामा हो गया। बात प्रिंसिपल तक पहुँच गई और प्रिंसिपल साहब ने दोनों को ऑफिस में बुलाया ओर पूरा मामला जाना। अशोक ने अपनी गलती मान ली ओर माफी मांग ली। आशा ने प्रिंसीपल सर से बात आगे नहीं बढ़ाने की रिक्वेस्ट की।
दोंनो मे कोम्प्रोमाईज़ हो गया और बात को रफा दफा कर दिया। अशोक ने ये बात दिल पर लगा ली। दिन बीतते गए और फाइनल एग्जाम भी हो गए। एग्जाम के बाद अशोक अपने पिताजी के कारोबार में लग गया। ओर फिर रिजल्ट भी आ गया, दोंनो पास हो गए पर आगे बढ़ने का इरादा नही था,
पर आकाश ने एल एल बी में एडमिशन ले लिया। कुछ दिनो बाद अशोक के माता पिता आशा के घर पहुँचे ओर अपने बेटे के लिये आशा का हाथ मांगा। कुछ दिनों बाद जवाब देने का बोल दिया। लड़का आशा का देखा हुआ था, पढ़ा लिखा और पैसे वाला था, थोडी कोशिश करने पर माता पिता ने आशा को शादी के लिए मना लिया ओर धूम धाम से शादी हो गई।
दुल्हन के लिये शादी की पहली रात बहुत खास होती है, कई चाहते, कई खवाब, कई अरमान, पर आशा के सारे सपने एक ही झटके में चकनाचूर हो गए जब अशोक ने कहा, कि मैंने कालिज का अपना बदला लेने के लिये तुमसे शादी की है। तुम मेरी पत्नी जरूर रहोगी पर तुम्हें पति का सुख कभी भी नही मिलेगा, ओर दूसरे कमरे मे चला गया। दिन-हफ्ते-महीने बीतते गऐ पर दिनचर्या नही बदली। इसी तरह 4-5 साल बीत गए।
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चलो, जल्दी चलो, बांझ आ रही हैं, राधा को सब्जी बाली की दुकान पर आते देख उसकी पड़ोसन अपनी सहेली से बोली ओर वहाँ से चली गई। ये बात राधा के कानों में पड़ गई। ये शब्द नही बल्कि तीर थे जो कानो से होकर दिल पर लगे। कॉलोनी वालो की बातों ने आहत होकर वो घर वापस आ गई ओर
अपनी जिंदगी का फैसला लेने की सोचने लगी। उम्र के साथ साथ अशोक की भी पत्नी सुख पाने की इच्छा बढ़ती जा रही थी पर उसका अहंकार आड़े आ रहा था। कुछ ही दिन बाद आशा ने अशोक को अपनी माँ से बात करते सुना कि अगर अपना वंश आगे बढ़ाना है तो मेरी दूसरी शादी करवा दो, वर्ना आपको जो ठीक लगे।
ये बात सुनकर आशा को समझ आ गया कि अब फ़ैसला लेने का सही वक्त आ गया और अगली सवेरे अपनी सास को बोलकर मायके चली गई। मायके में कुछ ही दिन बीते थे कि अशोक का फोन आया कि मैं दूसरी शादी कर रहा हूँ, तुम चाहो तो साथ में रह सकती हो
ओर न चाहो तो तलाक दे सकती हो। अगर दोनों रास्ते मंज़ूर नही तो मैं तलाक दे दूँगा ओर कोर्ट मे प्रूव कर दूंगा की तुम बांझ हो ओर फोन बंद कर दिया। आशा अपनी ज़िंदगी के बारे मे सोच ही रही थी कि अचानक एक दिन आकाश उसके घर आया। वो उसका अच्छा दोस्त तो था ही और अब एडवोकेट भी बन चुका था।
आशा ने आकाश को अपनी सारी कहानी बताई और सुझाव माँगा। आकाश ने पूछा तुम क्या चाहती हो??? आशा बोली अशोक से छुटकारा ओर नई जिदगी की शुरूवात। ये सुनकर आकाश खुश होकर बोला अब तुम सब मुझपर छोड़ दो, मैं सब देख लूँगा। अगले दिन आकाश ने अशोक को फोन किया और बोला, आशा के बारे मे बात करनी है, कोर्ट मे आकर मिलो।
अगले दिन अशोक कोर्ट गया तो आकाश बोला, आशा को आपसी सहमति से तलाक ओर 30 लाख रु डाइवर्स सेटेलमेंट मनी दे दो वर्ना आशा का तलाक एप्पलीकेशन रेडी है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट तुम्हें नामर्द साबित कर देगी ओर तलाक हो जायेगा। उसके बाद दूसरी शादी को तो तुम भूल ही जाओ क्योकि ये सब जानने के बाद तुम्हें लड़की कौन देगा?? जल्दी सोच कर बता देना।
अगले दिन अशोक ने आकाश को फोन करके सहमति दे दी। जल्दी ही दोनो का तलाक हो गया। कुछ दिन बाद आकाश ने आशा को शादी के लिये प्रपोज किया और आशा ने हाँ कर दी। जल्दी ही दोनो ने शादी कर ली। आज आशा ओर आकाश का 5 साल का एक बेटा है ओर सकून की जिंदगी जी रहै हैं।
अशोक ने भी दूसरी शादी कर ली और 5 साल से औलाद को तरस रहा है। अशोक के पिता जी के गुजर जाने के बाद बिजनेस में घाटा होता चला गया और कर्ज़दार होकर शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। बूढ़ी मां दिनभर बेटे कोे समझाने ओर उसकी सेवा करने में लगी रहती हैं। सब कुछ जानते हुए भी बेटे के आगे चुप रही। अब बेटे का दर्द देखा नहीं जाता। जीवन मे कभी किसी का बुरा करोगे तो परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा।
शास्त्रों के मुताबिक, पत्नी को घर की लक्ष्मी माना जाता है. पत्नी को गृहलक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि जिस घर में गृहलक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, वहां धन-धान्य बना रहता है जहां गृहलक्ष्मी का अपमान होता है, वहां लक्ष्मी नहीं ठहरती. क्या आप इससे सहमत हैं??
लेखक
एम.पी.सिंह
(Mohindra Singh)
स्व रचित, अप्रकाशित