कुछ फर्ज तुम्हारे भी – रत्ना साहू  : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : रोहन मॉर्निंग वॉक कर घर आया तो देखा अवनी बाहर जाने के लिए तैयार हो रही थी।

“अवनी, हाॅस्पिटल जा रही हो?”

“हां रोहन! और मैंने चाय नाश्ता बना दिया है। पीहू ने नाश्ता कर लिया है। तुम चाय पी लो और अपना टिफिन पैक कर लेना। मैं चलती हूं देर हो रही है। मम्मी, आप भी समय से नाश्ता कर लीजिएगा।”

“लेकिन आज क्यों??अब तो तुम्हारे भैया-भाभी आ गये।”

“हां, आ गए। लेकिन दोनों एयरपोर्ट से सीधा हॉस्पिटल आए, और रात भर वहीं थे। तो थक गए होंगे। मैं जाऊंगी तब वे दोनों घर जाएंगे, फ्रेश होकर थोड़ी देर आराम कर वापस आएंगे। वैसे भी मां शाम तक डिस्चार्ज हो ही जाएगी। तो मैं चली जाती हूं।”

सुनकर रोहन कुछ नहीं बोला।

कल अवनी के मां का पैर फ्रैक्चर हो गया। चाचा-चाची ने हॉस्पिटल ले जाने के बाद कॉल किया। उसके भैया-भाभी जो कि दूसरे शहर में रहते हैं उन्हें भी फोन किया। तो दोनों तुरंत निकल गए, अवनी भी यहां से हॉस्पिटल पहुंची।

अवनी के हाथ में लंचबॉक्स देखकर रोहन ने फिर पूछा, “ये लंच बॉक्स कहां लेकर जा रही हो? तुम वापस नहीं आओगी?”

“मैं आऊंगी और ये लंचबॉक्स भैया भाभी के लिए है। उन्होंने रात में भी खाना नहीं खाया, अभी घर जाकर खाना बनाने में समय लग जाएगा। इसीलिए मैंने उन दोनों के लिए भी परांठे सब्जी बना लिया।”

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“ठीक है लेकिन जाने से पहले तुम जरा फटाफट मेरा टिफिन पैक कर दो, और मेरे कपड़े सब निकाल कर रख दो। नहीं तो मुझे देर हो जाएगी।”

“देर तो मुझे भी हो रही है भैया भाभी वेट कर रहे होंगे।”

“अरे मुश्किल से 5 से 10 मिनट लगेगा फटाफट कर दो ना प्लीज!

अवनी बैग रख टिफिन पैक करने लगी।

“रोहन, तुम भी फटाफट तैयार हो जाओ और अपनी बाइक से मुझे हॉस्पिटल तक छोड़ दो। सुबह का समय है ट्रैफिक मिलेगी।”

“अरे यार, तुम मुझे क्यों परेशान कर रही हो? अभी ऑफिस जाना है, हॉस्पिटल छोड़ने जाऊंगा तो देर हो जाएगी। तुम ऑटो रिक्शा जाकर लेकर जा सकती हो ना।”

 सुनकर अवनी को गुस्सा आया क्योंकि कल भी हॉस्पिटल छोड़ देने के लिए कहा तब भी उसने कुछ यूं ही जवाब दिया था। फिर भी वो बिना कुछ बोले चुपचाप जाने लगी।

“अरे अवनी रुको! अरे, आज तो मम्मी को लैब लेकर जाना है, ब्लड टेस्ट कराने। फिर शाम को मम्मी को डॉक्टर के पास भी ले जाना है तुमने अपॉइंटमेंट लिया?”

अवनी जब तक कुछ बोलती उससे पहले रोहन ने फिर पूछ लिया, “अरे! तुम्हें याद भी है या बेटी का फर्ज निभाते-निभाते बहू का फ़र्ज़ भूल गई?”

पति के बात करने करने  का लहजा देख अब की बार  अवनी को नहीं रहा गया। और उसने भी बोल दिया।

“जब तुम सवाल पूछते हो तो सामने वाले को उसका जवाब तो देने दो। भूली मैं नहीं, भूले आप हैं। अपने और अपनी मां के चक्कर में कि मैं सिर्फ इस घर की बहू और आपकी पत्नी नहीं किसी की बेटी भी हूं। मुझे सब याद है आपको बताने की जरूरत नहीं। मैंने लैब वाले को घर पर बुला लिया है, कुछ देर में आ जाएगा सैंपल लेने, डॉक्टर की अपॉइंटमेंट भी ले ली है, कल शाम को बुलाया है। और हां, रिपोर्ट लेने जाने की जरूरत नहीं, लैब वाले ही डॉक्टर के पास भिजवा देंगे। एक बात और आप हमेशा दूसरे को ही क्यों फ़र्ज़ याद दिलाते रहते हैं? कभी अपना फ़र्ज़ भी याद रखिए।”

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“तो तुम मुझे ताना मार रही हो, तुम्हारी मां से नहीं मिलने गया इसलिए। अरे यार, जब तुम गई थी, तुम्हारे भैया-भाभी भी आ ही गए तो मेरी वहां क्या जरूरत?”

“बात सिर्फ जरूरत की नहीं होती रोहन! बात मान-सम्मान की हो जाती है। हम किसी के दुख में जाकर उसका दुख-दर्द नहीं बांट लेते लेकिन हां, सामने वाले को थोड़ी हिम्मत बढ़ जाती है। पता है कल हॉस्पिटल जाते ही चाचा चाची पूछने लगे दामाद जी नहीं आए?  मुझे तो शर्म आ रही थी मैंने बहाना बना दिया कि वो व्यस्त हैं। “

“अच्छा! तो तुम बहाना बनाकर, झूठ बोलकर मेरा मान रख लिया। अरे तुम सच्चाई बता भी देती तो इसमें मेरा क्या जाता?”

“जाता किसी का कुछ नहीं लेकिन हम औरतें आप मर्दों के जैसे नहीं होते। हमें ससुराल और मायके दोनों के फर्ज और मान-सम्मान का ख्याल रहता है। जैसे मैं ससुराल में हमेशा इस कोशिश में रहती हूं कि मेरे मायके वालों को किसी चीज के लिए शर्मिंदा ना होना पड़े। उसी तरह मैं इस कोशिश में भी रहती हूं कि किसी भी चीज के लिए मेरे ससुराल वाले या मेरे पति पर कोई उंगली ना उठाएं, कोई हंसे नहीं। आखिर है तो दोनों मेरा ही परिवार और मैं दोनों की सदस्य हूं। सच कहूं तो मैं इसीलिए आपको हॉस्पिटल छोड़ने के लिए कहा। ताकि इसी बहाने आप मेरी मां से मिल ले। भले ही उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन कल को मेरे भैया भाभी या मां ने कह दिया कि दामाद जी मिलने भी नहीं आए। तो मुझे कितना बुरा लगेगा। खैर, मुझे इतना बोलने की जरूरत नहीं। आप ना तो आज तक समझे हैं और ना कभी समझेंगे।” बोल अवनी तेजी से बाहर निकल गई।

हॉस्पिटल पहुंची तो भैया भाभी मां के बगल में बैठे-बैठे नींद से झुक रहे थे।

भैया, आप दोनों घर जाइए, मैं रुकती हूं। और हां यह लंचबॉक्स लीजिए आप लोग खा लीजिएगा।”

अवनी मां के बगल में बैठे-बैठे सारी बातें याद कर आंखों में आंसू आ गए। कितना भी कर दो ससुराल वाले कभी अपने नहीं होते।

“अवनी, अवनी!!” कानों में आवाज पड़ते ही सिर उठाकर देखा तो सामने रोहन खड़ा था।

“रोहन तुम यहां!”

रोहन ने मां को प्रणाम किया और अवनी को साइड में बुलाकर कहा, “अवनी, मुझे माफ करो। तुमने बिल्कुल सही कहा, तुमने हमेशा अपना सारा फर्ज निभाया। भूल तो मैं गया सब कुछ। देखो तुम्हें अभी घर वापस जाने की जरूरत नहीं, और मैं भी ऑफिस नहीं जा रहा। हम दोनों यहीं रुकेंगे जब तक मम्मी डिस्चार्ज नहीं हो जाती है, तो भैया भाभी को कह दो कि आराम से आएं।”

सुनकर अवनी को बहुत अच्छा लगा। उसने रोहन को थैंक्यू कहा और मुस्कुराने लगी।

रत्ना साहू 

#मैं सिर्फ आपकी पत्नी नहीं किसी की बेटी भी हूं।

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