Moral stories in hindi : पुस्तक विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि ने माधुरी से कहा -आप की इस सफलता पर आपको बहुत -बहुत बधाई,इस उम्र में आपकी लगन काबिले – तारीफ हैं। कुछ अपने बारे में बताये क्योंकि आप हम सब की प्रेरणा स्रोत हैं।आपके क्या ख्वाब थे। किस तरह आप सफलता के सोपान पर आई, क्या आपके पति -बच्चों ने आपको सपोर्ट किया।
एक लम्बी कहानी हैं, एक मिडिल क्लास परिवार की छोटी बेटी थी मै।पढ़ -लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना सबसे बड़ा ख्वाब था मेरा,ये वो उम्र थी जब सूरज की तपिश भी वर्षा की शीतल फुहार लगती हैं।पर पिता ने मेरा विवाह कर गंगा नहाने की सोची। तमाम विरोधों के बाद भी मेरी एक ना सुनी गई।
आत्मनिर्भर बनने की बात तो ये कह उड़ा दिया गया, अब अपने घर में पढ़ना लिखना और आत्मनिर्भर बनना। मै आवाक रह गई, फिर ये किसका घर हैं, जहाँ मैंने जन्म लिया।महज़ सत्रह साल की उम्र में विवाह हो गया। टूटे ख़्वाब और अधूरी पढ़ाई संग जब पिया के घर आई तो एक बार ख्वाब फिर सर उठाने लगे।
पति से कहा तो बोले – हाँ तुम पढ़ाई शुरु कर सकती हो। मन खुश हो गया, शायद अब ख्वाब पूरे हो जाये। पर मंजिल इतनी आसानी से कहाँ मिलती, फॉर्म भरने का समय आया तो पता चला मै माँ बनने वाली हूँ।
एक तरफ खुशी तो दूसरी तरफ टूटे ख़्वाबों की किरचें…। मै समझ गई राह आसान नहीं हैं, शायद हार भी गई। कुछ समय बाद जब मै दूसरी बार माँ बनने वाली थी तो पति ने प्यार से समझाया -बच्चों को बड़ा हो जाने दो, फिर तो समय ही समय हैं तुम सारे ख्वाब पूरे कर लेना। और मै तब माँ, बहू और पत्नी का किरदार अच्छे से निभाने लगी।
एक भारतीय नारी की तरह अपने परिवार की खुशी में अपनी खुशी देखने लगी। पति का प्रमोशन मुझे अपना प्रमोशन लगता, बच्चों की सफलता मुझे अपनी सफलता लगती। हाँ एक बात तो मन में ठान ली थी, अपनी बेटी को आत्मनिर्भर जरूर बनाउंगी। बेटी पर मै हमेशा नजर रखती। जो राहें मेरे लिये बंद थी, मै उसके लिये खोलती गई।
जब वो पढ़ कर जॉब में आई, मेरा सबसे बड़ा ख्वाब पूरा हुआ, क्या हुआ जो मेरा ख्वाब पूरा ना हुआ पर बेटी को आत्मनिर्भर बनने का ख्वाब भी तो मेरा ही था।
इस कहानी को भी पढ़ें:
समय बीता, सबके ख्वाब पूरे करने की मै सीढ़ी बनी थी, पर मेरा भी कोई ख्वाब हैं किसी ने जानने की कोशिश नहीं की।एकबार मै बाजार जा रही थी, कहीं से मुझे -माधुरी.. की आवाज सुनाई दी,मुझे लगा मेरा वहम हैं,मै ना रुकी तब किसी ने जोर से पुकारा, तब मै रुकी, ओह ये तो मुझे ही पुकारी हैं, देखा मेरी बचपन की सहेली और सहपाठी रत्ना खड़ी थी।
तुझे आवाज दे रही थी तो रुकी क्यों नहीं उसने उलाहना दिया। एक्चुअली मुझे माधुरी से अब कोई बुलाता नहीं, अब तो मिसेज शर्मा या मिसेज विनय या फिर शर्मा बहू या फिर रिंकी -बबलू की मम्मी कह कर ही पुकारता हैं।
यही मेरी पहचान रह गई,माधुरी तो आज मै ना जाने कितने साल बाद सुन रही हूँ। क्यों तेरे पति तुझे नाम से नहीं पुकारते। ना, वे भी “सुनो “कह कर काम चला लेते पर नाम से नहीं बुलाते।
चल पास के मॉल में चल कर बैठते हैं। मॉल पहुँच हम एक रेस्टोरेंट में बैठे।रत्ना ने बताया,वो यहाँ के डिग्री कॉलेज की प्रिंसपल बन कर आई हैं। बच्चे सब सेटल हो गये हैं।चल सुना तू क्या कर रही, शादी से पहले तो तेरे बड़े ख्वाब थे, क्या -क्या ख्वाब पूरे हुये।रत्ना के ये पूछते ही, मुझे लगा मै नींद से जागी हूँ, सच हैं ढेरों ख्वाब थे इन आँखों में, पर अब तो जीवन घड़ी की सुइयों से चलने लगा।
ख्वाब देखने का वक्त कहाँ, अब मेरे ख्वाब देखने की उम्र बीत गई।मेरे ये कहने पर रत्ना भड़क उठी, क्यों अभी कौन सा समय बीत गया।बंद आँखों से नहीं खुली आँखों वाले ख्वाब ही सफलता दिलाते हैं।उस वख्त जो ना कर सकी इस समय पूरा कर। बाहर निकल कर ही आत्मनिर्भर नहीं बना जा सकता, तू घर बैठे भी आत्मनिर्भर बन सकती है, अपनी पहचान बना सकती हैं।
कितना अच्छा लिखती थी, अब क्यों नहीं लिखती।” बहुत समय हो गया रत्ना “मै मायूसी से बोली। देख माधुरी जब जागो तभी सवेरा, अब भी तू कर सकती हैं, और हो सकता तुझे पहली बार सफलता ना मिले पर तू डटी रहना, क्योंकि मेहनत करने वालों की हार नहीं होती।
इस कहानी को भी पढ़ें:
बस वो समय, और आज मेरी किताब “ख़्वाबों की मंजिल “आपके हाथ में हैं।अगर सही से कोई मेरी प्रेरणा स्रोत थी, तो वो रत्ना ही हैं। ना वो मुझे मिलती,ना मै माधुरी सुनती, और ना मुझे अपने वजूद की पहचान की तड़प उठती।ना मेरे ख़्वाबों को पँख मिलते।हाँ अब भारतीय नारी की छवि भी बदल गई, वो परिवार के साथ -साथ स्वयं के लिये भी जीना सीख गई हैं।अपने ख़्वाबों के प्रति जागरूक हो गई हैं।
हॉल तालियों से गूंज उठा। सच हैं जहाँ चाह, वही राह भी मिलती हैं, बस हौसलों को कम ना होने दे। ना जाने कितनी प्रतिभा, पारिवारिक जिम्मेदारी तले दब जाती।जरूरत हैं उनका उत्साह वर्धन कर उन्हें दिशा देने की।
…. संगीता त्रिपाठी
गाजियाबाद