कभी कभी मनुष्य बडी ही खुशफहमी में रहता -कि वही कर्ताधर्ता है। उसने बिना एक पत्ता भी इधर से उधर नहीं होना चाहिए जो वह सोचता है वही सच है वाकी कि पूरे परिवार में सोचने समझने की औकात ही नहीं है।
सागर जी एक नौकरी पेशा, सुखी गृहस्थ थे। वे दो वेटी व एक बेटे के पिता होने के साथ साथ एक माँ के लाडले बेटे एवं सुघड पत्नी के पति भी थे। वे अपने परिवार से बहुत प्रेम करते थे। बच्चों की पढाई लिखाई का पूरा ध्यान रखते । परिवार में कभी किसी को दुखी नहीं देख सकते थे।
हांलाकि शादी से पहले पत्नी भी शिक्षिका थीं। किन्तु उन्होंंने यह कह कर मैं हूँ न कमाने वाला तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है। मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा, उनकी नौकरी छुड़वा दी।
समय के साथ-साथ जैसे जैसे गृहस्थरूपी कम्बली भीगने लगी वह भारी होने लगी। बच्चे होने के बाद खर्च बढने लगा और थोड़ा आर्थिक तंगी होने लगी। किन्तु उन्हें अभी भी यही गुमान था कि में सब कुछ ठीक से चला रहा हूँ। पत्नी , बच्चों की कोई भी बात या राय उन्हें फिजूल लगती सो कभी उस पर ध्यान न दे सिर्फ अपनी ही चलाते।
बड़ी बेटी का एडमिशन पोलीटेक्निक में
करवा दिया। कालेज घर से दूर था तो स्वयं उसे छोडने लेने जाते। बेटी का कहना कि पापा आप परेशान होते हैं, मुझे स्कूटी दिला दें में चली जाया करूंगी। सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें यह बात पसंद नहीं आती। एक तो बडी होती बेटी को अकेला नहीं भेजना चाहते थे दूसरे उन्हें दुर्घटना का भय लगता। बैटी सही से स्कूटी चला पायेगी इसका उन्हें विश्वास नहीं था।
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बेटे को रेल्वे के किसी प्रशिक्षण में दो साल के लिए प्रवेश दिला दिया वो बाहर चला गया उसके लिए भी चिन्तीत रहते सही से मैनेज कर पायेगा या नहीं। छोटी बेटी अभी स्कूल में ही थी।
हमारे घर उनका आना जाना था। अच्छे पारिवारिक सम्बन्ध थे। बेटी कई बार मेरे से कहती बुआ जी आप भी तो गाड़ी चलाती हैं पापा को समझाओ न मुझे भी दिला दें।
मेरे कहने पर सागर जी कहते दीदी में हूं न इनकी देखभाल करने के लिए डरता हूं कहीं कुछ हो न जाए। छोटे छोटे काम के लिए भी उन्हें किसी का विश्वास नहीं था कि कोई कर पाएगा। वे अपने को परिवार का भाग्य विधाता मानते सोचते मेरे बिना इनका क्या होगा ।
समय की मार देखिए एक दिन अनहोनी हो गई। ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहे थे कि ह्रदयघात हो गया और वहीं गिर गए। पत्नी एवं बेटियों ने पड़ोसियों की सहायता से अस्पताल पहुंचाया। किन्तु उपचार के दौरान दूसरा अटैक आने से मृत्यु हो गई।
परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। वे सब उन पर ही हर काम के लिए निर्भर थे सो वे अपना आत्म विश्वास खो चुके थे। कोई निर्णय लेने में हिचकते उनमें जैसे क्षमता ही नहीं थी।
खैर जो विधाता ने उनके लिए लिखा था वह तो हो कर रहा ।अब पत्नी एवं बच्चों ने हिम्मत जुटाई। बेटे के छः माह रह गए थे सो उनके पूरा होते ही उसे पिता की जगह अनुकम्पा नौकरी मिल गई। बड़ी बेटी की भी पोलीटेक्निक पूरी हो गई थी सो उसके लिए भी रिशता ढूंढ कर शादी करने की सोची। जो रिश्ता मिला वह परिवार भी हमारा परिचित था। सो हमें बुलाया कि आपलोग आ जाओ तो हमें थोड़ा विश्वास रहेगा। पहली बार निर्णय ले रहे हैं कुछ गलत न हो जाए । खैर बेटी की शादी हो गई ,फिर बेटे की भी कर दी।छोटी बेटी की पाढाई पूरी होने के बाद उसकी भी कर दी। इस बीच दादी का भी इन्तकाल हो गया।
अब मम्मी बेटे बहू,पोते-पोती के साथ खुशहाल जीवन जी रहीं हैं।
दोस्तों सागर जी को जो भ्रम था कि उनके बिना कुछ नहीं हो सकता क्या सही था ।
उनको परिवार का भाग्य विधाता समझना क्या उचित था।
किसी की कार्य क्षमता, निर्णय पर विश्वास न कर उनके आत्मविश्वास को कमजोर करना क्या सही था।
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पुरुष होने के नाते निर्णय लेने में केवल वे ही सक्षम हैं यह सोचना क्या सही था।
जबकि हकीकत तो यह है कि कोई भी किसी का भाग्य विधाता नहीं होता।समय हर किसी को कार्य करने की हिम्मत देता है जब सिर पर पड़ती है तो पलक झपकते ही बड़े बड़े निर्णय हो जाते हैं। वक्त के थपेड़े सबकुछ सीखा देते हैं। वक्त की लाठी में बहुत दम है जो अच्छे अच्छे को सबक सीखा देती है। इसलिए परिवार के भाग्य विधाता ने बन सहयोगी बने और परिवार की क्षमता को भी विकसित होने दें। हां समय-समय पर अपने अनुभव से उन्हें पोषित करते रहें , ताकि वे भी अपनी कर्मस्थली को लिए पूर्ण रूप से है तैयार हो जाएं।
भाग्य विधाता तो वह ऊपर वाला ही है जो इन्सान को अपने इशारे पर नचाता है और इन्सान सोचता है कि वह जो कुछ कर रहा है अपनी मर्जी से कर रहा है ।
शिव कुमारी शुक्ला
26-1-24
स्व रचित, मौलिक एवं अप्रकाशित