आंगन में बैठे सभी बातें कर रहे थे । गजेन्द्र चार पाई पर लेटकर आकाश को निहारते हुए बोला “कितना सौभाग्यशाली है ये सौर परिवार जिसमें सितारे, सप्तर्षि मंडल, ग्रह, नक्षत्र सब साथ रहते हैं, न किसी से ईष्या और न किसी से द्वेष! सब अपनी मर्यादा और कर्तव्य निष्ठा के प्रति प्रतिबद्ध ! आपस में मिलजुल कर रहना तो कोई इनसे सीखे ! रात में खुला आकाश तो मैंने कई वर्षों बाद देखा है । ” माँ बोली “इस जमाने में सबके इक्कट्ठे होने की फुर्सत किसे है, रे! फिर महानगरों में बहुमंजिले मकानों में झूलती झालर, चमचमाती झूमर, तेज रोशनी के रंगीन बल्बों के सिवा और दिखता ही क्या होगा ?”
खजान का छोटा बेटा भोजराज खेती बाड़ी का कार्य संभालता था, उसे बचपन से ही अपनी जमीं व परिवार से लगाव था । एग्रीकल्चर में डाक्टर उपाधि लेने के बाद प्रत्येक शनिवार को दूरदर्शन पर ” खेती बाड़ी” कार्यक्रम में उसकी वार्ता का सीधा प्रसारण होता था । उसने अपने खेत में पैदावार बढाने के लिए केई नवाचार भी किये थे । वह बोला “खेतों में लहलहाती फसलों पर लदे फूलों की सुगंध, ठंडी ठंडी बयार, कीट पतंगों की सुरीली व कंपायमान ध्वनि से गुंजित वातावरण भी तो प्रकृति का अनुपम उदाहरण है, भैया!”
“तुम्हारे बड़े भाई ने जब से समझ पकड़ी है, तब से ही परिवार का पालन पोषण के लिए कभी बैंगलोर, चण्डीगढ़, अहमदाबाद तो कभी गाजियाबाद में बेचारे को घूमना ही पड़ रहा है ।” माँ ने कहा ।
भोजराज बोला “हम कौनसा यहाँ राजनीति कर रहे हैं, खेतों में काम ही करते हैं । भाई साहब को तो खेतों का रास्ता भी नहीं पता ।” भाभीजी ने कहा “हाँ, हाँ , हमें सब पता है जमीन के बारे में ! मेरे बाप के कोई गोलगप्पों की दुकान नहीं थी । शहतूत वाले खेत की रकम तो तुम्हारे भैया ने ही दी थी, वो तो हमारा ही है, लेहसुओं के पेड़ वाले खेत में पांचों भाइयों का बराबर हिस्सा है । समझे!”
“नहीं दोनों खेतों में सबका बराबर हिस्सा है ।” भोजराज ने अपनी दबी जबान से कहा । भाभीजी चिल्लते हुए बोले “सुन रहे हो! “
गजेंद्र बोला “सुनाई तो सबको देता है, पर बोलता कोई नहीं । अगर पिताजी के सख्त बीमार होने का मैसेज नहीं आता तो मैं अभी गाँव ही नहीं आता!” माँ ने कहा “हाँ गज्जू सही है, मेरी मानो तो एक खेत तो इनके नाम ही है और दूसरे खेत में भी अपने भाई को बराबर का हिस्से दार रखना, ताकि तुम सभी एक खेत में साथ रहो ।” माँ ने कहा । माँ की बात को काटने की हिम्मत किसी में नहीं थी ।
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खजान ने करवट बदलते हुए दर्द के मारे आह भरी । पवन ने कहा “दवाइयाँ तो सभी प्रकार की दे दी फिर भी दर्द नहीं मिटा, सांसें भी अटक अटक कर आ रही है । बार बार पैरों में झटके आ रहे हैं, न तो किसी के आने पर खुशी और न ही किसी के जाने का गम!”
ऐसे समय पर पुश्तैनी धन के बंटवारे की बातें करने पर सभी को ग्लानी आने लगी ।
पहली बार आज बहन वर्षा व दोनों भाइयों के मन में फर्क देख कर माँ की आंखें नम हो गयी । माँ ने पिताजी को झकझोरते हुए पूछा “आपके बेटे, बेटियां आई हुई है, कुछ कहना है क्या…….!” वे कुछ नहीं बोले…नाड़ी चलना बन्द! आंखें एक ही जगह ठहर गयी । बेटियों,बहुओं, बेटों और पत्नी के सामुहिक मातमी स्वरों से गाँव की गलियां गुंजायमान हो गयी । खजान चल बसे!
बंटवारा तो जैसा माँ ने कहा वैसा ही हुआ परन्तु पांच भाइयों के साथ दो बहन का नाम और जुड़ गया । किसी को कम हिस्सा मिला, किसी को अधिक, तो कोई लेना ही नहीं चाहता था । सबके मन में उलझन ही उलझन ।
दो साल बाद हवा बहन व जीजा जी निमंत्रण पत्र लेकर सभी भाईयों के तिलक निकालने आई । पांच दिन बाद जीजी की बड़ी बेटी का विवाह था । भोजराज ने गजेन्द्र को आने के लिए फोन किया, पवन ने प्रहलाद को समाचार किया ” छोटे भाई हरी को साथ लेकर आज ही आएं । हवा के घर बिटिया की शादी है, इन्हें ज्यादा रोकना ठीक नहीं । जो दस्तूर करना है, उसकी तैयारी करो ।”
हवा के सभी भाई अनमने मन से हां में हां मिला रहे थे । पवन ने पत्नी से कहा “शादी में ननिहाल पक्ष के दस्तूर हम क्यों करें! हवा ने तो भाइयों की तरह पिताजी की जमीन से बराबर हिस्सा लिया है । “
रवीना ने कहा “क्या कह रहे हो? मैंने और बच्चों ने तो हवा बहन के यहाँ जाने की पूरी तैयारी कर ली है । तुम जानो तुम्हारा काम जाने ।
हवा की पांचों भाभियों ने अपने पास से थोड़े थोड़े सोने चांदी के आभुषण, श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, साड़ियां इकट्ठी करके पैकिंग करने लगी । विवाह के गीतों की राग, ढाळ का एक साथ अभ्यास करने लगी ।
गजेन्द्र अपनी पत्नी सपना व बच्चों के साथ आ गया था ।
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सपना ने सभी को आंगन में बुलाकर कहा “देखो देवर जी! अगर पिताजी आज संसार में होते तो वो आपकी तरह ही करते? स्वर्ग में
उनकी आत्मा अपने घर की टूटती एकता, परम्परा और आपसी मनमुटाव को देख कर रो रही होगी । माँ जी के दिल पर क्या बीतेगी? हवा रो रो कर अंधी हो जायेगी । अगर कोई मनमुटाव है हमारा हिस्सा भी तुम सब रखलो । नहीं चाहिए हमें ऐसा धन जिस पर बहन बेटी गर्व न कर सके!”
माँ जी ने कहा “अच्छा करोगे तो अच्छा ही पाओगे बेटा! ” सभी बेटों से मां की बेबसी देखी नहीं गयी । माँ जी के चरणों में गिर कर पांचों भाई रोने लगे ।” लक्ष्मी ने कहा “आज मुझे मेरी बहुओं पर बेटों से अधिक गर्व है… ” आंखें डबडबा गयी । “बस भी करो माँ जी! अब इन्हें बाजार जाकर अच्छे वस्त्राभूषण लाने दीजिये । देखें बाऊजी जितनी इन्हें परख है या नहीं ।” सपना यह कहकर हवा बहन की बिटिया की शादी में ननिहाल की तरफ से दिये जाने वाले उपहारों की सूची बनाने लगी ।
#टूटे रिश्ते जुड़ने लगे
नेमीचन्द गहलोत, नोखा (बीकानेर)