” पापाजी…मिनी…।”
” क्या हुआ मिनी को संदीप..बताओ..क्या हुआ..।” फ़ोन पर अपने दामाद की घबराई आवाज़ सुनकर मनोहर चीख पड़े।
” वो मिनी…।” कहते हुए संदीप ने जो कुछ कहा, उसे सुनकर उन्हें कुछ होश नहीं रहा।उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई,” मनोरमा..ज़ल्दी से एक थैले में चार कपड़े रखो..हमें तुरंत शहर जाना है।”
” शहर!..मिनी ठीक तो है…आप दामाद जी से…।” मनोरमा की बात पूरी होने से पहले ही मनोहर बोले,” रास्ते में सब बता दूँगा..अभी चलो..।” दोनों बेटी के ससुराल जाने वाली बस में बैठ गये।मनोरमा बार-बार अपने पति से पूछती रही कि क्या हुआ है..हम क्यों जा रहें हैं लेकिन मनोहर खामोश रहे।
बस स्टाॅप आते ही मनोहर पत्नी का हाथ पकड़कर बस से उतरे और ऑटोरिक्शा लेकर हाॅस्पीटल पहुँचे।संदीप और उसके पिता दरवाज़े पर ही खड़े थे..संदीप मनोहर का हाथ पकड़कर रोने लगा…उसके पिता बोले,” बहन जी..हमने मिनी को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन आग तेजी से…।”
” क्या!..मिनी जल…मिनीssss।” रोती हुई मनोरमा वार्ड की तरफ़ भागी।मिनी को आईसीयू में रखा गया था।दरवाज़े के शीशे से ही अपनी नाज़ों से पली बेटी के नाक-हाथ में पाइप लगा देखकर वो फूट-फूटकर रोने लगी।मनोहर ने अस्पताल के बेड पर मिनी को देखा तो उनका हृदय रो उठा।एक पल को उन्हें लगा जैसे मिनी अभी कहेगी, पापाsssss
गाँव में मनोहर की परचून की दुकान थी।शाम को घर आते हो वो बेटी को पुकारते और दो साल की मिनी पापा कहकर उनके गोद में चढ़ जाती थी।कभी वो अपनी माँ मनोरमा के आँचल में छिप जाती तो कभी अपने पिता के जूतों में अपने नन्हें पैर डाल देती और बेटी का बचपना देखकर वो दोनों निहाल हो जाते।
इस कहानी को भी पढ़ें:
भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती – मंजू ओमर : Moral Stories in Hindi
चार साल की होने पर मिनी स्कूल जाने लगी।घर आकर वो पहले अपने स्कूल के किस्से सुनाती फिर खाना खाती।मनपसंद चीज़ें न मिलने पर तो वो घंटों मुँह फुलाकर बैठ जाती।
एक दिन मिनी ने अलमारी से गुलाबी रंग की फ्राॅक निकाली और पहनकर पिता के पास जाकर बोली,” पापा..देखिये ना…मेरी फ्राॅक छोटी हो गई।” कहते हुए वो हाथ से अपनी फ्राॅक खींचने लगी।मनोहर हँसते हुए बोले,” तेरी फ्राॅक छोटी नहीं हुई..तू बड़ी हो गई है..।”
” ओफ़्फ…#पापा मैं छोटे से बड़ी हो गई क्यों? मेरी नीली-बैंगनी फ्राॅक भी छोटी हो गई…और..।” मिनी और मनोहर में बहस होने लगी और दूर खड़ी मनोरमा पिता-पुत्री के स्नेह-संवादों का आनंद लेने लगी।
समय के साथ मिनी का गाँव भी तरक्की कर गया था।वहाँ नये स्कूल-काॅलेज़ खुल गये थे।इसलिये बारहवीं की परीक्षा पास करके उसने वहीं के काॅलेज़ में दाखिला ले लिया।
एक दिन जब मिनी काॅलेज़ से घर आई तो दरवाज़े पर एक बड़ी गाड़ी देखकर चौंक गई।अंदर गई तो माँ ने खुश होकर उससे कहा कि बड़ा अच्छा रिश्ता है..शहर में उनका बहुत बड़ा कारोबार है…लड़का भी बहुत अच्छा है.. आकर एक बार सबसे मिल ले…।
” माँ…मेरी पढ़ाई तो पूरी नहीं हुई।
” सयानी हुई बेटी को एक दिन ससुराल तो जाना ही पड़ता है..जैसे मैं आई।वैसे उन लोगों ने कहा है कि तेरी पढ़ाई पूरी करवा देंगे।” पास खड़े मनोहर ने भी मनोरमा की बात पर अपनी सहमति जताई तो फिर मिनी भी मान गई।उसने संदीप और उसके पिता को प्रणाम किया..थोड़ी बातचीत हुई और फिर दस दिनों के बाद ही संदीप दूल्हा बनकर आया और मिनी को ब्याह कर ले गया।
ससुराल में मिनी का खूब आदर-सत्कार हुआ।संदीप भी हर वक्त उसके पल्लू से बँधे रहते थे।उसे सब कुछ एक सपना-सा लग रहा था।
सप्ताह भर बाद संदीप ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिये।देर से घर लौटना..हाथ में शराब की बोतल और कभी-कभी तो उसके साथ कोई लड़की भी होती।संदीप का बदला रूप देखकर मिनी चकित थी।
एक दिन उसने संदीप से कह दिया,” आप समय पर घर आ जाया कीजिये।” जवाब ने संदीप ने उसे भद्दी-सी गाली दी और कहा,” तुम्हें खाना-कपड़ा मिल रहा है..चुपचाप कोने में पड़ी रहो।” उसके सास-ससुर ने भी साफ़ कह दिया कि ये तुम पति-पत्नी का मैटर है।मिनी ने अपने पिता को सच्चाई बतानी चाही लेकिन फिर माँ की कही बात उसे याद आ गई कि संस्कारी लड़की अपने ससुराल की बात कभी बाहर नहीं करती तो उसने चुप्पी साध ली।
एक दिन घर के नौकर रामू काका ने मिनी को बताया कि संदीप बाबू तो ऐसे ही थे..।उनके इसी स्वभाव के कारण कोई अपनी बेटी देने को तैयार न था।तब उन्होंने गाँव की लड़की यानि आपको ब्याहकर लाये और बिना दान- दहेज़ का विवाह हुआ है तो लोगों की नज़र में वो महान भी बन गये।
इस कहानी को भी पढ़ें:
दिन गुजरते चले गये।एकाध बार मनोहर बेटी से मिलने भी आये…मिनी का कुम्हलाया चेहरा देखकर उन्हें कुछ गलत तो लगा लेकिन…सीधे-सादे मनोहर को अमीर लोगों का दाँव-पेंच समझ नहीं आया।
एक दिन संदीप किसी लड़की को लेकर बेडरूम की तरफ़ जाने लगे तो मिनी ने रास्ता रोक लिया।बस संदीप गुस्से-से पागल हो उठा…उसने लड़की को विदा किया और मिनी को घसीटकर रसोई में ले गया…।मिनी कुछ समझ पाती तब तक में उसने उसपर केरोसिन डालकर माचिस जला दी और रसोई का दरवाज़ा बंद कर दिया।
इत्तिफ़ाक से रामू काका जिसे संदीप ने सिगरेट लेने भेजा था, वो आ गये।उन्होंने तुरंत दरवाज़ा खोला..मिनी को कंबल में लपेटा और एंबुलेंस मँगवाकर अस्पताल ले गया।संदीप के माता-पिता किसी शादी में गये हुए थे..खबर मिलते ही दौड़े चले आये…पुलिस-वकील से बात करके केस को दुर्घटना का रूप दिया गया..रामू काका को गाँव भेज दिया गया।पैसे-पावर ने मीडिया को भी खरीद लिया।जब डाॅक्टर ने कह दिया कि समय बहुत कम है..तब संदीप ने मनोहर को फ़ोन किया और मगरमच्छी आँसू बहाने लगा।
मनोहर ने संदीप की आँखों में उसकी कुटीलता को पढ़ लिया था…वो इतना तो समझ गये थे उनकी मिनी जली नहीं थी..जलाई गई थी लेकिन ये बात वे किससे कहते…कौन उनकी सुनता? दहेज़ की माँग कभी हुई नहीं और घरेलू हिंसा का गवाह गायब था।अब तो उन्हें एक ही उम्मीद थी कि बेटी आँखें खोले तो उसे लेकर गाँव वापस चले जाये…।तभी डाॅक्टर ने उनके कंधे पर हाथ रखा तो वे हड़बड़ा-से गये।डाॅक्टर ने उनसे इतना ही कहा,” होश आ गया है..जाकर मिल लीजिये पर बात नहीं कीजियेगा।”
बेटी को देखकर भी कुछ न बोलना..मनोहर ने वो दुख का ज़हर भी पी लिया।अपनी अधखुली आँखों से पिता की ओर देखते हुए मिनी ने अपना दाहिना हाथ पिता की तरफ़ बढ़ाया जिसे मनोहर ने थाम लिया।उसकी आँखें मनोहर से एक ही सवाल कर रही थी,” पापा, मैं छोटे से बड़ी हो गई क्यों? मैं छोटी रहती…आपके कंधे पर बैठकर मेला घूमने जाती…माँ के साथ खेलती…ये सब तो नहीं…।” उसने अपनी माँ की ओर देखा…अपनी आँखें बंद कर ली और उसका हाथ पिता के हाथ से हमेशा के लिये छूट गया।
‘ मिनी…।” कहकर मनोरमा फूट-फूटकर रोने लगी।मनोहर के शरीर में तो जैसे जान ही नहीं रही हो…।उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनसे कहाँ चूक हो गई थी…वे भारी कदमों से अस्पताल की औपचारिकताएँ पूरी करने लगे।
यह सच है कि समय हर ज़ख्म को भर देता है लेकिन मनोहर-मनोरमा के लिये मिनी की असामयिक मृत्यु का घाव कभी नहीं भरेगा।वे दोनों मिनी की तस्वीर अपने हाथों में लेकर रोते रहते और एक ही बात कहते,” काश! तू बड़ी न होती…।
विभा गुप्ता
स्वरचित, बैंगलुरु
# पापा मैं छोटे से बड़ी हो गई क्यों