Moral Stories in Hindi : शहर के सबसे बड़े शिक्षण संस्थान का भूमि पूजन समारोह हो रहा था अविनाश पिछले दस दिनों से दिन रात इसके लिए जुटा था गुड्डी के साथ सभी बड़े कार्यालयो में भागदौड़ करके सारे कागज दस्तावेज भली भांति तैयार करवाए थे उसने …आजकल छोटी सी दुकान खोलना कितना कठिन है और फिर यह तो शिक्षण संस्थान था सबसे पहले तो शिक्षण संस्थान खोलने वाले की शैक्षणिक योग्यता मायने रखती है फिर भूमि का चुनाव शहर के बीचोबीच की इस जमीन को खरीदने के लिए भी बहुतेरे पापड़ बेलने पड़े थे …और फिर व्यापार जैसा कोई वित्तीय लाभ ना पहुंचने वाले शिक्षण संस्थान को खुलवाने में किसी नेता को कोई दिलचस्पी भी नही हो रही थी।
सम्मोहित था वह शांत सरल सी दिखने वाली जुझारू दृढ़प्रतिज्ञ लड़की गुड्डी की निष्ठा से …साधारण से मकान में रहने पर भी अपना पक्का शानदार सर्वसुविधायुक्त घर बनवाने के स्थान पर वह वर्षो से जोड़ी एक एक पाई को इसी संस्थान में लगाने पर कृतसंकल्पित थी…..शायद गुड्डी की शिक्षा के प्रति इसी निश्छल निष्ठा के वशीभूत वह उसके कार्य में बिना बोले ही सहयोगी बन गया था गुड्डी के साथ कार्य करते हुए उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो उसका खुद का कोई पुनीत कार्य है।
भूमिपूजन करवाते समय पंडितजी ने जल लेने हेतु गुड्डी को अपना हाथ आगे करने के लिए कहा और ज्योही गुड्डी ने अपना हाथ आगे कर खोला एक गहरी लाइन हथेली पर देख अविनाश चौंक गया ..यह क्या है गुड्डी कोई चोट लगी थी क्या बरबस ही उसके मुंह से निकल पड़ा था और गुड्डी बस मुस्कुरा कर रह गई थी ।
उसकी मुस्कान में एक गहरा राज छुपा था….
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पंडित जी मेरा हाथ भी देखिए ना… नन्ही अबोध गुड्डी ने अपना नन्हा सा हाथ फैला कर कहा तो पंडित जी भी खिल खिलाकर हंस पड़े .. अरे नन्हीं गुड़िया लाओ भई सबसे पहले तुम्हारा हाथ ही देख लेते हैं…..पूछो क्या पूछना चाहती हो क्या जानना है तुझे पंडित राम किशोर जी ने नन्ही हथेली को थाम कर पूछा।
मैं तो खूब खूब सारा पढ़ना चाहती हूं आप देख कर बताइए कित्ती सारी पढ़ाई मेरे हाथ में लिखी है….बहुत उत्साह से गुड्डी ने पूछा तो पंडित जी के साथ गुड्डी की मां रम्मो झाड़ू लगाते लगाते आश्चर्य से ठिठक गई थी।
बताइए ना पंडित जी गुड्डी की उत्सुक आवाज से पंडित जी चकित थे अरे गुड़िया रानी अभी से पढ़ाई की इतनी चिंता काहे कर रही हो अभी तो खूब खेलो खाओ अच्छे अच्छे सुंदर सुंदर कपड़े पहनो ….ठीक से बड़ी तो हो जाओ फिर अच्छा सा दूल्हा मिल जाए शादी करके बढ़िया घर जाओ पढ़ाई कर लेना….इतनी पढ़ाई करके क्या करना है तुम्हें….
आप जल्दी से बताइए कित्ती पढ़ाई लिखी है मेरे हाथ में…गुड्डी ने पंडित जी बात काटते हुए तेजी से कहा।
उसकी अधीरता देख राम किशोर जी ने उसकी नन्ही हथेली अपने हाथ में लेकर ध्यान से देखना शुरू कर दिया….”बिटिया सच बात यह है कि तेरे हाथ में विद्या की रेखा है तो पर ज्यादा लंबी नही है गहरी भी नहीं है …!
कहां से होएगी पंडित जी हम गरीबों के हाथ ही ऐसे ही होते हैं…हमारे हाथ में भी नहीं थी यह रेखा हम भी नहीं पढ़े कुछ हमारी अम्मा के हाथ में भी विद्या की रेखा नहीं थी वह भी नही पढ़ लिख पाई थी जाने हमारी बिटिया के दिमाग में पढ़ाई लिखाई की बात कैसे आ रही है…..थोड़ा बहुत जितना हो सकेगा हम पढ़ा लिखा देंगे अपने समान अनपढ़ तो नही बनायेगे लेकिन आगे बहुत ज्यादा पढ़ाई कैसे कर पाएंगी….इसीलिए विद्या की रेखा भी छोटी सी ही है एकदम सत्य बता रहे हैं महाराज आप चल गुड्डी आजा ये कचरा उठा कर बाहर फेंक आ….. जा जल्दी कर अभी दो और घरों में काम करने जाना है कहती रेमो बर्तन धोने अंदर चली गई थी।
लेकिन गुड्डी टस से मस नहीं हुई…!!पंडित जी आप मेरी इस पढ़ाई वाली लाइन को बड़ा कर दीजिए मुझे बहुत पढ़ना है नौकरी करना है और अपनी मां का ये काम बंद करवाना है उसकी आंखों का दृढ़ निश्चय पंडित जी को अंदर तक हिला गया।
बेटा यह रेखा तो किस्मत की रेखा होती है मैं तो केवल हाथ देख कर जो तेरी किस्मत लिखा है वही बता सकता हूं किसी रेखा को छोटा बड़ा करना यह हमारी सामर्थ्य से बाहर की बात है किसी का भाग्य हम पढ़ सकते हैं बदल नही सकते ।
तो क्या मेरी किस्मत में पढ़ाई नहीं लिखी है केवल इस रेखा के छोटी होने से ..!!अत्यधिक दुखी गुड्डी अंदर गई और एक नुकीली लकड़ी से अपने हथेली की रेखा को गहरी करने लग गई थी…इस कोशिश में उसकी नन्ही हथेली रक्त से भर उठी थी मां सारा काम छोड़ उसे हॉस्पिटल ले गई थी।
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पागल हो गई है ये लड़की एकदम अपना भाग्य इस लकड़ी से नुकीला कर रही थी आप ही इसे समझाइए बहनजी…..सरकारी स्कूल में गुड्डी की टीचर से रो रो कर सारी घटना बताते हुए रम्मों के स्वर में दुख और हताशा दोनो समाई थी।
हथेली पर पट्टी बांधे शांत खड़ी अबोध गुड्डी को बहुत स्नेह से अध्यापिका अपने साथ ले गईं थीं और पास में बिठाकर समझाया था।
देखो गुड्डी ये सच है कि रेखाएं होती हैं व्यक्ति की किस्मत उसके साथ चलती है लेकिन यह भी सत्य है कि कर्म करने की कोई रेखा नहीं होती है ईश्वर ने सबकी किस्मत लिखी परंतु कर्म करने की कोई सीमा रेखा नहीं बनाई यह व्यक्ति पर छोड़ दिया जो जितना कर्म करेगा अपनी खुद की रेखा बनालेगा अगर तुम भी चाहो तो जो करना चाहती हो उसमे जुट जाओ आगे का रास्ता अपने आप दिखने लगेगा तुम तो बस कर्म करती जाओ….समझी और खुद अपने आपको चोट पहुंचाना अच्छी बात नहीं है ना ही अपने हाथ पर ना ही दिल पर कहते हुए उन्होंने एक नया पैन गुड्डी के हाथ में रख दिया था।
टीचर की बात गुड्डी के जख्म का गुड्डी की चोट का इलाज बन गए थे….कर्म करने की राह उसे पता चल गई थी जिसमे हाथ में खिंची रेखा को बदलने की शक्ति होती है दृढ़ विश्वास और आशा से उसकी आंखे चमक उठीं थीं।
उस दिन से तो मानो उसने अपना कर्मक्षेत्र तय कर लिया था दिन रात पढ़ाई करना जहां से भी ज्ञान मिले उसे ग्रहण करते जाना मां के कार्यों में हाथ बंटाना और अनवरत पढ़ते जाना बढ़ते जाना ही उसकी जिंदगी बन गए थे।
छात्रवृत्तियों की भरमार होने लगी थी उस पर उसकी मेधा से प्रभावित होकर शहर के कई दान दाताओं ने उसकी आगेकी पढ़ाई के लिए बढ़ चढ़ कर दान दिया प्रोत्साहन दिया …वह पढ़ती गई विदेश भी गई ढेरो नौकरियां भी की उसने ।
लेकिन इतना पढ़ने के बाद भी उसे संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी तब उसने अपने कर्मक्षेत्र में विस्तार करते हुए एक ऐसा शिक्षण संस्थान खोलने का फैसला लिया जहां उसके जैसे ही पढ़ने के इच्छुक आर्थिक धनाभाव झेलते प्रतिभाशाली बच्चे सहज होकर पढ़ाई कर सकें।
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अब उसका कर्मक्षेत्र पढ़ना नहीं वरन पढ़ाना हो गया था खूब पढ़ाना खूब पढ़ाना ताकि किसी और गुड्डी को अपनी हथेली की रेखा को खोद कर गहरा ना करना पड़े ।हमारे कर्म ही वह नुकीली धार होते हैं जो हमारी कुंद पड़ी किस्मत को धारदार बना देते हैं।
अविनाश उसकी कर्म गाथा सुनकर हैरान हो गया था और गहरे सम्मान और अपनत्व से उसकी हथेली पकड़ कर खुद से खींची चमकती विद्या की रेखा किस्मत की रेखा देख रहा था जो आज उसकी कर्म की अनदेखी असीमित रेखा के साथ मिलकर सजीव हो गई थी।
#किस्मत
लतिका श्रीवास्तव