कंधों का होना   –  डॉ अंजना गर्ग

तनु को इस शहर में नौकरी ज्वाइन किए 2 साल होने को थे। मां बाबा के साथ वह तब से ही फ्रेंड्स कॉलोनी के फ्लैट में रह रही थी उसकी दुनिया दफ्तर और स्मार्टफोन तक सिमटी हुई थी। कई बार तनु की मां जय श्री उसे कहती कि आसपास वाले लोगों को कभी कभी मिला कर , सोसाइटी की मीटिंग्स में जाया कर और सब लोग मिलकर सोसाइटी में त्योहार मनाते हैं उसमें भी हिस्सा लिया कर। 

तुम तो गाती भी इतना अच्छा हो । ऐसे ऐसे लोग वहां गाने को खड़े हो जाते है जिनको न सुर का पता है न ताल का। तनु साफ मना कर देती। कहती मम्मी मेरा अपना फ्रेंड सर्कल है ।एक हजार से ज्यादा लोग मेरे साथ फेसबुक पर है ।एक घंटे में मेरी पोस्ट पर सैकड़ों लाइक्स और फोटो पर ढेरों कमेंट आ जाते हैं । जय श्री कहती वह तो ठीक है पर जिस समाज में हम रहते हैं वहां भी आना जाना और मिलना जुलना जरूरी है। तनु कहती मम्मी यह मोबाइल पर भी समाज के ही लोग हैं जो आपके समाज से बहुत बड़ा है।

 जय श्री चुप हो जाती क्योंकि उसे अच्छी तरह पता था कि आज के बच्चों से मां-बाप तर्क में नहीं जीत सकते ।पर सुबह उठने के साथ , खाते पीते ,सोते जागते तनु का मोबाइल से चिपके रहना जय श्री को समय की बर्बादी और अपनों से कट जाना लगता था ।

               एक दिन रात को 8:00 बजे के करीब जब वह तीनों डिनर टेबल पर बैठे थे तनु के पापा मिस्टर पवन को दिल का दौरा पड़ा । किसी तरह दोनों मां बेटी मुश्किल से मैनेज करके उन्हें हॉस्पिटल लेकर गई। तनु ने जल्दी से सब फेसबुक पर डाल दिया। डॉक्टरस इलाज कर रहे थे। तनु इधर से उधर भाग रही थी। फेसबुक पर लगातार दुआओं के कमेंट आ रहे थे गेट वेल सून, स्पीडी रिकवरी ,भगवान उनको जल्दी से स्वस्थ करें वगैरह वगैरह ।

आखिर तनु और जयश्री की सारी दुआए बेकार गई। डॉक्टरस मुंह लटकाए बाहर आकर कहने लगे , “वैरी सॉरी, हम मिस्टर पवन को बचा नहीं सके।” तनु को कुछ समझ नहीं आ रहा था ऐसा तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। एक पल में उसकी जिंदगी बदल चुकी थी। आज तक पापा के कारण उसने कभी किसी जिम्मेदारी को लिया ही नहीं था ।

 नौकरी करना, खाना पीना और मस्ती यही उसकी जिंदगी थी। मां जय श्री जो सामने बेंच पर बैठी थी सुनकर सन्न रह गई उसे लगा पूरी दुनिया बहुत तेजी से घूम रही है। वह तो बैठी भगवान को याद कर रही थी और प्रार्थना कर रही थी कि हम बस थोड़ी देर में तनु के पापा को घर ले जाए उन्हें यहां एडमिट ना करना पड़े। ऐसा तो उसकी कल्पना से बाहर था पर तनु की हालत देखकर उसने किसी तरह अपने आप को संभाला और तनु के साथ डेड बॉडी को घर लेकर आई ।

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 तनु फटाफट बाथरूम में घुसी और यह सैड न्यूज़ फेसबुक पर शेयर कर दी। कुछ उन लोगों को व्हाट्सएप किया जो उसको सबसे पहले बड़े सुंदर सुंदर कमेंट करते थे। मां जयश्री  के कहने पर तनु ने दूर पार के सभी रिश्तेदारों को फोन किया। सब अगले दिन ही आ सकते थे। जो आसपास की दो चार महिलाएं जय श्री के कारण आई थी उनमें से रश्मि उठ कर गई और अपने घर से चाय और बिस्किट ले आई ।जय श्री और तनु बिल्कुल   भी पी नहीं रही थी। दोनों के आँसू लगातार बह रहे थे जैसे ही सरोज आंटी ने कहा,” थोड़ी सी चाय पी लो, तुम लोगों ने तो डिनर भी नहीं किया।

” तनु की बुरी तरह रुलाई फूट पड़ी, कहने लगी,” मम्मी ने आज पापा की पसंद का गाजर का हलवा बनाया था। हलवा खाना तो दूर रहा। पापा के हाथ में तो सूप का चम्मच ही रह गया वह भी अंदर नहीं गया। किसी तरह सब ने समझा बुझा कर थोड़ी सी चाय और एक आध  बिस्किट दोनों को खिलाया ।अब उन सबको जयश्री ने कहा,” तुम सब लोग अब घर जाओ। सुबह आ जाना।

एक दो तो जाना ही चाह रही थी, दूसरी दोनों को जयश्री ने थोड़ा जोर देकर कहा तो वो भी सुबह आने की कह कर चली गई।  तनु और जय श्री पवन के पार्थिव शरीर के पास बैठी थी, दोनों चुप थी।अपने अंदर ही अंदर अपने आप से बातें कर रही थी,झगड़ रही थी।अपने आप को संभालने की कोशिश कर रही थी पर जैसे ही मोबाइल की टोन बजती तनु फटाक से देखती उसे लगता जरूर कोई उसके घर का एड्रेस पूछ रहा होगा आने के लिए ।जब एक घंटा बीत गया कोई ऐसा फोन और मैसेज नहीं आया तो उसे लगा सब संस्कार पर आएंगे।अब पूछेंगे तो समय और श्मशान घाट का नाम बता दूंगी। फिर मोबाइल टोन बजी उसने इस उम्मीद में फोन देखा कि कोई पूछ रहा होगा की संस्कार का क्या समय है ?किंतु हर बार की तरह वही फेसबुक की भाषा वैरी सॉरी, वेरी सैड,  आर .आई .पी,  मे द डिपार्टेड सोल रेस्ट इन पीस, भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और आपको यह दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करें वगैरह-वगैरह।सुबह तक फेसबुक पर यही सिलसिला चलता रहा। तनु के आँसू हर मैसेज के बाद और बढ़ जाते थे ।

 उसकी उम्मीद अब बिल्कुल टूट चुकी थी। मां जय श्री अपने आप को काबू में रखते हुए उसे सांत्वना दे रही थी। सुबह 8 बजे तक चाचा चाची और उनका बेटा आ गए। साथ ही रात वाली जयश्री की सहेलियां जिनके साथ वह कभी-कभी चाय का कप शेयर कर लेती थी आ गई ।दो तीन  मि. पवन  के साथी जो पार्क में उनके साथ सैर करते थे वह भी आ गए । 



एक-दो घंटे में दो चार रिश्तेदार भी पहुंच गए जिनसे जय श्री कभी कभी फोन पर बात कर लिया करती थी जो तनु को तब बहुत बुरी लगती थी कहती थी पता नहीं मां तुम ऐसे रिश्तेदारों से इतनी लंबी बात कैसे कर लेती हो जिनसे हमारी नेचर ही नहीं मिलती या जो हमेशा बस क्रिटिसाइज करना ही जानते हैं या ऐसे रिश्तेदार जिनको हमसे जेल सी है कि मैं इतनी जल्दी इतनी अच्छी सेटल हो गई इतनी अच्छी नौकरी में । मां जय श्री तब तनु को कहती थी बेटा रिश्तेदार , रिश्तेदार ही होते हैं जैसे भी हो वह हर दुख सुख में मन से या बेमन से आएंगे ही। तनु को तब लगता था यह पुराने जमाने की सोच है । यह लोग आज की इंटरनेट की दुनिया और सोशल मीडिया को क्या जाने ।

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 जहां सेकंडो, मिनटों में सैकड़ों लोगों से आप जुड़ जाते हो वह भी आपकी पसंद के। जय श्री से पूछ पूछ कर तनु की चाची सब तैयारी कर रही थी। उन्होंने मिस्टर पवन के कपड़े निकाले , जो उनको पहनाने थे, उनको नहलाने की तैयारी की , घर में गंगाजल नहीं था चुपचाप पड़ोस से  गंगाजल ले आई। यह वही चाची थी जो तनु को एक आंख नहीं सुहाती थी कहती थी क्या अनपढ़ सी, छोटे शहर की, बिल्कुल बोलना नहीं आता। आज वही सब संभाल रही थी। जैसे तैसे संस्कार कर आये।

 लोग चौथे का पूछ कर विदा हो गए। चाची जो श्मशान घाट जाने से पहले ही गीजर ऑन कर गई थी जय श्री के लिए बाल्टी में पानी बनाकर जय श्री को बोली, “भाभी जी आओ नहा लो” फिर तनु से नहाने और कपड़े बदलने को कहा। खाना खिलाया, सर दर्द की गोली दी। कहने लगी दोनों रजाई में बैठ जाओ कहीं आप लोगों की तबीयत खराब न हो जाए। फिर जयश्री से बोली भाभी जी फूल तो कल ही चुने जाएंगे । 

तनु के चाचा, मोनू (चाची का बेटा )और तनु हरिद्वार जाकर फूल प्रवाहित कराएंगे। मैं और आप यही रुकते हैं। मोबाइल टोन अब भी  लगातार बज रही थी पर अब तनु को वह बहुत ही बुरी लग रही थी  क्योंकि उसे समझ आ गया था की आत्मा की शांति के लिए तो शब्द काफी है लेकिन आत्मा जिस शरीर को छोड़कर जाती है उसको समेटने के लिए और अपने दुख में आंसू बहाने के लिए कुछ कंधों का होना कितना जरूरी है।

              डॉ अंजना गर्ग

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