कद्र – अर्चना सिंह : Moral Stories in Hindi

अपना जीवन मैंने हमेशा दूसरों के लिए जिया है । स्वभाव अच्छा होते हुए भी न जाने मुझे शायद हर वक़्त अच्छा सुनने की आदत  या यूँ कहें लत लग गयी थी । नाती – नातिन, पोते – पोतियों से भरा घर, बेटी- बहुएँ, जेठानी – देवरानी । कहने को घर में अथाह लोग लेकिन मेरा दुःख भी उतना ही अथाह । रिश्तों से तो मुझे कभी कोई सुख, कोई आराम नहीं मिला लेकिन शायद अब ईश्वर और मेरा शरीर दोनों ही मुझे सदा के लिए आराम देना चाहते हैं। 

दोनों बेटा – बहु पोती के साथ  छुट्टियाँ बिताने यहाँ हमारे पास आए हैं ।बहु ने कहा…”मम्मी जी ! आप कितना अच्छा मसाज करती हैं बालों में, कर दीजिए न । और वो हाथ में तेल की कटोरी पकड़ाती मेरे ह्रृदय के पास अपना सिर टिका ली । मसाज लगभग पूरा ही होने को आया तब तक अचानक मेरे शरीर में अनजानी सी हलचल हुई और जीभ लड़खड़ाने लगी । मैं खुद नहीं समझ पा रही थी ये मेरे साथ क्या हो रहा है । ऐसा लग रहा था

मेरे शरीर पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं , बोल कुछ रही और निकल कुछ रहा है । बहु रुचि को भी बातें करते – करते थोड़ा आभास हो रहा था । उसने मुझे पलट कर देखा और अपने पति आकाश को आवाज़ लगाई । आकाश दौड़ा – दौड़ा आया और अस्पताल ले जाने की तैयारी करने लगा तब तक शाम होते – होते मेरा एक तरफ का हिस्सा सुन्न हो गया और बहुत ज्यादा बुखार हो गया ।

अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने जांच करके बताया मुझे लकवा मार गया है ।  तीन दिन बाद जब लौट कर आई मुझे मेरे कमरे में बिस्तर पर लिटा दिया गया ।सबके चेहरे बिल्कुल भावहीन हो गए ये सोचकर नहीं कि माँ को दुःख हो गया बल्कि ये सोचकर कि एक चलती – फिरती नौकरानी अब हमें आराम कैसे देगी ।

अब ऐसा लग रहा था सारे रिश्ते सगे होकर भी सौतेले जैसा व्यवहार कर रहे थे ।

बिस्तर पर पड़ी असहाय, लाचार कावेरी आँखों को बंद करके अतीत में डूब गई ।

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शुरू से ही शौक रहा था मेरा की सब तारीफ करें मेरी अच्छी बहु के रूप में शादी के बाद । मैं ससुराल पहुँचकर अपने कामों में पहले दिन से ही लग गयी । पति और सास ननद को भला क्या चाहिए ? मेरी जेठानी रेणु दीदी । मैंने उनका भी काम आसान कर दिया  । मम्मी जी और रेणु दीदी के सगे – सम्बन्धी पास में ही रहते थे । अब ये सप्ताह में दो दिन का रूटीन हो गया था । खूब तरह – तरह के व्यंजन बनाती मैं और भर – भर के तारीफें

बटोरती । घर में कामवाली नहीं लगी थी, कमी किसी चीज की नहीं थी अगर जरूरत पर खर्च किया जाए तो  ।और फिर मैंने तो अकेले ही सबका काम सम्भाल रखा था तो कभी किसी को काम वाली की जरूरत ही नहीं हुई।मन इतना खुश हो जाता था कि इतने सारे काम के बाद भी थकान का आभास ही नहीं होता । मेरे पति शिशिर खाने में एक नम्बर चटोर । हर दिन ऑफिस के लंच के लिए नई फरमाइश करते  ।

कभी कहते चार लोगों का या छः लोगों का अधिक खाना बना देना । इतने जोश और उमंग में काम करते रहती की दिन भर मुझे किसी के लिए सोचने का कोई फुर्सत ही नहीं रहता । शिशिर जब शाम को घर लौटते और मेरी तारीफें सुनाते तो फिर अगले दिन के लिए मैं नई ऊर्जा बटोर लेती काम करने के लिए । छुट्टियों के दिन वो अपने पड़ोस के दोस्तों के साथ मग्न हो जाते मुझे आर्डर देकर की आज पकौड़ी, आज कबाब, आज ब्रेड रोल

आदि बना लेना । तैयारियों में दिन निकल जाता पूरा । मेरी ननद शिवानी उनके कॉलेज के लिए लंच बनाना , पति के लिए अलग स्वाद फरमाइश के लंच बनाना, मम्मी पापा जी और रेणु दीदी  के लिए अलग नाश्ता बनाना । फिर ऊपर से शिवानी की भी नित नई फरमाइश ..भाभी ! आज सहेलियों के लिए ये बना देना वो बना देना । बस मेरी रोजमर्रा की यही ज़िन्दगी थी । 

अब घर में मेरे देवर विकास की शादी के चर्चे चल रहे थे । तीन दिन बाद हम सब लड़की देख आए । दीप्ति बहुत ही पसंद आई हमें ।  विकास और उसकी होने वाली पत्नी दीप्ति की बातें आखिर दिन भर काम करते हुए चलते – फिरते कानों में टकरा जाती । फिर मुझे आभास हुआ शादी के साल तो मैंने यूँ ही गुजार दिए । हनीमून के लिए बाहर जा ही नहीं पाए ।

फिर एक शाम मैंने शिशिर से कहा…”हमलोग भी हनीमून के लिए मसूरी या ऊटी कहीं चलें क्या ? आकाश और दीप्ति तो गोआ जाने वाले हैं । शिशिर विदक कर बोले…”पहले नहीं गए तो अब क्यों जाना । मैंने भी बड़बोलेपन से कहा..”नहीं गए तभी तो अब जाना है अभी तो जब तक बच्चा नहीं हम भी घूम कर आ सकते हैं ।

फिर शिशिर ने शायद मेरा दिल रखने को बोल दिया ..”पैसों की दिक्कत है अगले महीने देखता हूँ । अगले महीने फिर से याद दिलाया तो बोले..”किसी बात को पकड़ लेती हो तुम, पक्का छः महीने बाद  ले जाऊँगा विकास की शादी से फ्री हो जाने दो ।

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विकास की शादी दो महीने बाद हो गयी ।मुझे लगा अब थोड़ा आराम करूँगी । मैं बड़ी बहू वाले आदर्शों का पालन करूँगी बस दीप्ति को सबकी पसन्द का खाना और काम सिखा दूँगी तो मुझे आराम मिलेगा । पहले तो एक सप्ताह मैंने उसे शौक से बिठाकर खिलाया । फिर धीरे – धीरे  उसके साथ रसोई में काम पर लगने लगी तो एक दिन देखा…”

विकास पीछे से आकर उसके कमर में हाथ डालते हुए और उसका दूसरा हाथ पकड़ कर कहा..”अरे दीप्ति ! तुम चलो, खाना बनाने की तुम्हें जरूरत नहीं । मुझे तो भाभी के हाथ का ही खाना पसंद है । अवाक देखते रह गयी मैं दोनों का प्रेम व्यवहार । अगले दिन पोछा लगा रही थी तो अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ी । फिर जाँच कराने पर पता चला मैं गर्भवती हूँ । सास सिर्फ बैठकर बोलतीं सारे कामों के बाद..”आराम कर लो, सो जाओ ।

मैं बस चकरघिरनी बन कर सुबह उठने से लेकर रात सोने तक लगी रहती । कुछ महीने बाद शिवानी की शादी हुई, विदा होकर अपने ससुराल गयी वो तो लगा अब चार रोटियाँ कम सेकनी पड़ेंगी । बस ऐसे ही देखते देखते दिन निकल रहे थे । आखिर डिलीवरी का दिन आया । मेरी नन्हीं सी गुड़िया ने जन्म लिया, उसका नाम स्नेहा रखा । ऐसे समय बीतते हुए दो बेटे और एक बेटी हुई । 

थकान बहुत होती थी पर काम से जी नहीं चुरा पाती थी मैं । 

अब मम्मी – पापा जी भी बूढ़े हो गए थे वो भी हमारा साथ छोड़कर परलोक सिधार गए । 

फिर से चार गुनी जिम्मेदारी और बढ़ गयी । बाहर घूमने का शौक अंदर ही दफन कर लिया । बोलते हुए भी सोचना पड़ता था कि इन्हें ऐसा न लगे कि घर की स्थिति देख रही है फिर भी इसे बाहर घूमने की पड़ी है । 

अब पच्चीस सालों बाद…

बेटे – बेटी सबकी शादी कर दिया है । नाती – नातिन, पोते – पोतियों से भरा घर – परिवार है । पर कहते हैं न कि अगर जीवन साथी आपको नहीं समझता तो सब व्यर्थ है   । बेटी तो पराया धन ही है, उससे कोई उम्मीद नहीं रख सकती , बस वो आकर औपचारिकता निभाकर दो दिन में चली गयी ।  दोनो बेटों को मैंने देखा बहु की परवाह करते हुए एक दूसरे के लिए प्यार जताते हुए तब मुझे एहसास हुआ

अच्छा बनने की चाह में मैंने अपना क्या खो दिया । मेरी बहु नव्या रसोई में हाथ बंटाने आयी तो बेटे ने कहा..चलो नव्या ! टी. वी पर कोई फ़िल्म देखते हैं, खाना तो मुझे मम्मी के ही हाथ का पसन्द है । दोनो बेटे – बहु  आपस में ही लड़ने लगे खुद से काम करना पड़ा तो …फिर शिशिर ने आकर कहा. . कावेरी ! इनलोगों ने कभी काम नहीं किया अपने मायके में, क्यों न कामवाली रख लें ?

आज मैं हैरान थी शिशिर की बातें सुनकर । ये वही शिशिर हैं जिन्हें एक बार भी ख्याल नहीं आया मेरी परेशानी देखकर की कामवाली रख लेते हैं।

सबको देख – देखकर महसूस हुआ कि कितने अरमान मैंने अपने भीतर दबा रखे थे । छोटी बहु अनु ने कहा..”तार पर कपड़े मैं डाल देती हूँ मम्मी जी ! तो बेटे ने रोकते हुए कहा..मम्मी मेरी हर काम में कुशल हैं तुम छोड़ दो तुमसे नहीं होगा । अब ये अच्छाई मुझे अंदर – अंदर खोखला बना रही थी । मैं अपने कमरे में लेटी थी सब बच्चे आकर मिल रहे थे और मेरे पति को तो तब भी समय नहीं था

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कि दो घड़ी मेरे पास बैठ के मेरी स्थिति देखें । एक दिन दोनो बेटे मेरे पास आकर बोले..”बहुत मुश्किल है माँ आपको अभी अपने पास रखना । बच्चों की पढ़ाई भी चल रही है   बड़ा बेटा छोटे पर थोप रहा था और छोटा बड़े पर ।ऐसा लग रहा था मैं घर की बेकाम की वस्तु हूँ, सब अपना पल्ला झाड़ने में लगे थे ।

अब भी समझ नहीं आ रहा है मुझे की क्या मैंने गलती कर दी सबकी सहायता करके या सही मायने में इंसान का यही मतलबी वाला रंग है । जब काम रहे तो उसके साथ साथ नहीं हो तो फेंक दो । यही स्थिति हो रही है मेरी । सोचती हूँ कहीं न कहीं मेरी भी गलती है मैंने खुद की कद्र नहीं की तो कौन करेगा । 

खैर..सबके लड़ाई झगड़े अब मेरे लिए नहीं होंगे। ऐसा लग रहा है ईश्वर अपने आगोश में मुझे लेना चाह रहे हैं । अब मेरे जीवन रूपी संध्या की लीला यहीं खत्म…और   कावेरी की आँखें बंद हो गईं ।

मौलिक, स्वरचित

अर्चना सिंह

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