जो साथ देंवे  हैं मान उनका होंवे है…. – रश्मि प्रकाश 

“ अब बस भी करो…. सब मिलकर कितना खरी खोटी सुनाओगे उसे … मीना चल जा बेटा… इन सबकी बात दिल पर ना लेना… सबऐसे ही है क्या करूँ !” कहती हुई अम्मा दमयंती देवी आँगन में रखे खाट पर बैठ गई 

मीना चुपचाप जाकर रसोई में काम करने लगी।

“ अम्मा ये तुमने सही नहीं किया…. इतना सिर चढ़ाकर रखने की क्या ज़रूरत है… है तो काम वाली ही ना… उसके लिए हमें ही डाँटदिया…. और कस्तूरी ने क्या ही गलत कहा…. वो अपनी थाली का खाना कैसे कुश को खिला सकती है….?” छोटे बेटे मोह ने अम्मा सेग़ुस्से में कहा

“ और नहीं तो क्या अम्मा ….  मैं बस आ ही तो रही थी ।” मोह की पत्नी कस्तूरी ने  भी ग़ुस्सा करते हुए कहा 

“ तुम दोनों को भी कुछ बोलना है तो बोल लो…. ।”अपने बड़े बेटे बहू की ओर मुख़ातिब होकर अम्मा ने कहा 

“माँ क्या ही गलत कह रहे हैं सब…. जब जानती ही हो हम अपने बच्चों की परवरिश कैसे करते हैं…. इतनी हिफ़ाज़त से उनका ध्यानरखते हैं और मीना ने अपना जूठा उसे खिला दिया ।” बड़े बेटे ने भी थोड़े रोष में बोला 

“ ठीक है बेटा मीना से गलती हो गई…. तुम लोग कब वापस जा रहे हो….. अपनी तैयारी कर लो और हाँ भंडार से अपनी ज़रूरत केमुताबिक़ जो अनाज बाँधना बाँध कर ले जाना…. और एक बात इस बार जो खेत के पैसे आए हैं वो तुम दोनों को नहीं दे सकती हूँ…. तुम्हारे बाबूजी की दवाइयाँ मँगवाने के लिए मीना के बापू को पैसे दे दिए थे ।” अम्मा एक लंबी दीर्घ श्वास ले बोली 

“ हम कल सुबह की ट्रेन से निकल जाएँगे ।” बड़े बेटे ने कहा 

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“ मैं भी कल निकल जाऊँगा…. सुबह सुबह हम दोनों को ऑफिस भी जाना है…. अम्मा तुम भी चलो हमारे साथ…. कभी कभी कुश कोलेकर बड़ी दिक़्क़त हो जाती है…. सब पूछते रहते हैं कुश की दादी नहीं है क्या … यहाँ रहती तो कुश को सँभाल लेती।” मोह ने बिनाकुछ सोचे समझे कहा 

“ बेटा चल तो सकती हूँ पर तेरे बाबूजी को शहर का हवा पानी कहाँ जमता पहले जब भी हम गए वो बीमार हो कर ही लौटे…. ।” अम्माखाट पर अपने हाथों को ठकठकाते बोल रही थी मानो मन में कुछ और चल रहा था ज़ुबान पर कुछ और ही था 




“ तो बाबूजी यहाँ रह लेंगे…. ये मीना का पूरा परिवार है ना यहाँ उनकी देखभाल को…. पैसे काहे का लेते ये लोग फिर जो देखभाल भीना करें ।” मोह नाम के विपरीत निर्मोही जैसे बोला

“ इस उम्र में तेरे बाबूजी को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली…. चलो तुम लोग जाकर अपना सामान बाँध लो देखना कहीं कुछ छूट ना जाएनहीं तो मीना के परिवार पर चोरी का इल्ज़ाम लगाते देर ना करोगे।” अम्मा के मन में बच्चों के लिए कड़वाहट भर गया था 

बच्चों के उधर से हटते अम्मा मीना को बाबूजी को गर्म दूध दे कर आने बोली और खुद वही खाट पर लेट गई…

कितना अच्छा वक़्त था जब उनके दोनों बेटे और एक बेटी से घर गुंजायमान रहता था अब तो ये साल में दो से तीन बार आते है औरहंगामा कर जाते है….. आज भी वही हुआ….. मीना बेचारी सबको खाना खिलाकर बैठी ही थी कि दो साल का कुश चलते चलते उसकेपास गया और उसकी थाली से रोटी उठाकर खाने लगा….. मीना लाख उसके हाथ से छीनने की कोशिश करती उतना कुश रोने लगा…. सब उधर इकट्ठे हो मीना पर इलज़ाम लगाने लगे कि इसने अपना जूठा कुश को खिला दिया…. मीना सफ़ाई देती रही पर कोई काहेउसकी बात सुनता ….. दमयंती जी जानती थी मीना गलती से भी ऐसा ना करेंगी पर उनके शहरी बच्चों की आँखों पर पट्टी जो पड़ी थी ।

तभी उन्हें अपने पैरों पर किसी के हाथों का दबाव महसूस हुआ….. देखा तो मीना पाँव दबा रही थी….

“ तेरी माँ आ गई मीना…. ?” दमयंती जी ने पूछा 

“ अभी तक नहीं आई है…. आ ही रहे होंगे आप सो जाइए अम्मा…. मैं हूँ ना दरवाज़ा खोल दूँगी…. अम्मा आप भी 

मुझसे ग़ुस्सा हो क्या ?” मीना उदास हो पूछी

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“ ना रे मीना…. कहने को तो ये मेरे बच्चे है पर कब हमारे काम आते है….. किसना और माला ना होते तो हम दोनों पति पत्नी का क्याहोता सोच कर दिल काँप उठता है…..तेरे दादू की तबियत ख़राब हुई तो कौन मेरे जने आ गए देखभाल करने…. उनकी दवा की फ़िक्र भीना होती इन्हें बस अनाज लेकर जाने आते है….. ।” अम्मा की आँखों में आँसू आ गए थे 




“ अम्मा कुश की ख़ातिर आपको छोटे भैया संग चले जाना चाहिए ।” मीना ने कहा 

“ ना रे मीना…. मैं जानूँ हूँ अपनी बहू को…. जो तेरे हाथ का बना खा सकते पर तेरी थाली की रोटी कुश के खाने से हल्ला मचा दे…. वोमेरे साथ अपने बेटे को कभी ना रहने देंगी….. देखती नहीं जब भी कुश के साथ बात करती हूँ कहती  अम्मा इससे घरेलू भाषा में बात मतकिया करो…. ये भी वैसे ही बोलना सीख जाएगा….. माना मेरा पोता है लगाव भी है पर बहू के ताने सुनने से अच्छा है यही गाँव में अपनेलोगों के साथ रहूँ फिर  तेरे दादू को अकेले छोड़कर कैसे जा सकती…..अब तो ज़िन्दगी का भरोसा नहीं है रे मीना जब तक रहूँगी साथ हीरहूँगी…..।” अम्मा आँखों पर हाथ धरे बोली 

“ माँ …. हमसे इतनी नाराज़ हो…. जो किसना के परिवार के साथ रहना मंज़ूर पर हमारे साथ नहीं….।” दोनों बेटे कब वहाँ आ उनकीबातें सुन कर बोले

 अपने चेहरे पर से हाथ हटाते अम्मा ने कहा,” बेटा कहने भर से तुम्हें कैसे मान दूँ तुम दोनों ही बताओं….. जब भी ज़रूरत पड़ी दोनों कामकी व्यस्तता जता घर नहीं आए….. जिन बच्चों के पास अपने माता-पिता के लिए वक़्त ही नहीं उन बच्चों के साथ रहने से अच्छा है उनकेसाथ रहा जाए जो हमारी तकलीफ़ समझते हो…. वो हमारे यहाँ तनख़्वाह पर काम ज़रूर करते हैं बेटा पर मेरे लिए मेरे बच्चों से कम नहींहै…. तुम लोगों ने मीना पर उँगली उठाते वक़्त एक बार भी सोचा वो बच्ची तुम सब की सेवा में लगी रहती …. उनके हाथ का खाना खासकते हो पर कुश ने खुद रोटी  ले लिया तो भी उसपर इलज़ाम लगाते रहे….. बेटा मैं बस यही कहूँगी जब भी यहाँ आओ ये सोच  करआना  कि इस घर में किसना का भी परिवार रहता जो मेरा अपना है  ..बेटा जो समय पर साथ देंवे , प्रेम मान सम्मान उसका ही होंवे है…. जो ये ना होते तो हम कैसे सब सँभाल सकते जरा सोच कर देखो ।” 

घर के दरवाज़े पर खड़े किसना और माला सामान का थैला थामे स्तब्ध खड़े रह गए…. एक गरीब के लिए अम्मा के मन में इतना प्रेम देखवो हाथ जोड़कर खड़े हो गए ।

“ मीना हमें माफ कर दे….. सच में माँ बाबूजी के साथ तुम लोग रहते हो …. हमें कोई हक नहीं जो यहाँ एक दो दिन के लिए आकर तुम्हेंकुछ बोले।” बड़े बेटे ने कहा 




” नहीं बड़े भैया ये तो आपका हक है आप मेरी गलती पर डांट सकते हैं….. मैं कुश बाबा का हाथ रोकती रही पर वो रोटी खा लिए…. हमेंमाफ कर दो।” सच में मीना ने हाथ जोड़ लिए 

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“ कोई बात नहीं मीना हमने कुछ ज़्यादा कह दिया तुम्हें…. अरे जब उसकी माँ ध्यान नहीं दे तो कोई तो रोटी खिलाएगा ही ना…..।” मोहने उसके जुड़े हाथ पकड़ हटाते हुए कहा 

अम्मा सब देख मन ही मन खुश हो रही थी चलो देर से ही सही जब बेटे समझ गए तो बहुएँ भी समझ ही जाएगी कि मीना और उसकापरिवार इस घर के लिए क्या है… वो है तभी हम यहाँ आराम से रह पाते हैं …. नहीं तो हर दिन की किंच किंच में शायद ना वो खुश रहसकती थी ना हम..!

 

बहुत जगह आज भी इस बात को तरजीह दिया जाता है कि काम करने वाले के साथ भेदभाव करते हैंपर जब वो आपके साथरहतेआपके लिए खाना तक बनाते हैं फिर उनके हाथ से या थाली से लिए जाने पर हंगामा क्योंये कुछ लोगों की मानसिकताहोती है जिसे बदला नहीं जा सकता पर जो मजबूर होते वो हर हालत से समझौता कर जीना सीख जाते…. आपके विचार मेरी रचनापर आमंत्रित हैं…. 

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धन्यवाद 

रश्मि प्रकाश 

# प्रेम 

1 thought on “जो साथ देंवे  हैं मान उनका होंवे है…. – रश्मि प्रकाश ”

  1. मां को छूने वाली कहानी आपने बिल्कुल सही कहा छोटा बड़ा कोई नहीं होता जो साथ दे वही सब कुछ है आखिर गरीब भी इंसान ही होता है व्यक्ति को जीने के लिए प्यार ही चाहिए चाहे वह अपने से मिले या किसी और से जिस भी मिले हमें उसका धन्यवाद करना चाहिए। काश यह चीज आजकल की पीढ़ी समझ सके

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