धन तेरस का दिन !शाम का धुंधलका छाने लगा था,कार्तिक मास की कुनकुनी सी ठंड देह को सिहरा रही थी !बीना जी खिडकी के पास बैठी आसमान पर चमकते तारों को देखती अपने ही खयालों में गुम थी कि “कहां हो? की आवाज देते मुकेश जी घर में घुसे!
“अरे!अंधेरे में क्यूं बैठी हो ?लाइट तक नहीं जलाई?,क्या बात है तबियत तो ठीक है तुम्हारी”कहते कहते माथे पर हाथ धर कर बोले बुखार तो नही है?”
“नहीं! मुझे कुछ नहीं हुआ “कहकर उठी तो मुकेश जी उनकी लाल आंखें देखकर समझ गए कि उनके पीछे बच्चों को यादकर अकेले जमकर गंगा जमना बहाई होगी!
“अभी तक तैयार नहीं हुई!धनतेरस पर कुछ तो ले लो?मुकेश बोले!
“किसके लिए ले लूं,किसी को आना जाना नहीं तो क्या सामान खरीद खरीद कर नुमाईश लगाऊं?दुखी मन से बीना ने जवाब दिया!
फिर गहरी सांस लेकर याद करने लगी !कितनी धूमधाम से मनाया करते थे हम दीवाली का त्यौहार! घर की सफाई,सजावट,रंगोली !फिर बच्चों के साथ मिठाइयां,फल,मिट्टी के लक्ष्मी-गणेश की शापिंग! और कैसे बच्चे बेसब्री से इंतज़ार करते 500रूपये के पटाखों का जिसकी लिमिट हमने बांध रखी थी!
सब मिलजुलकर पूजा की तैयारी करते, बिट्टो रंगोली बनाती ,संजू घर सजाता और बीना जी बच्चों की पसंद के पकवान बनाती ना थकतीं!
शाम को पूजा के बाद बच्चे मुकेश जी के साथ पटाके छुडाते और वे डरी सहमी एक तरफ बैठ अपने छोटे से संसार की खुशियां बटोरती!
बिट्टो बड़ी होगई ससुराल चली गई! संजू इंजीनियरिंग कर मुम्बई चला गया!फिर भी दीवाली पर जरूर आता रहा!
एकाध बरस तक तो बहू और बच्चों के साथ आता रहा!
पता नहीं क्या हुआ! पंद्रह दिन पहले बहू से बात हुई तो कुछ कहने से पहले ही कहने लगी”इसबार दीवाली पर हम गोआ घूमने जा रहें हैं!न उसने हमें वहां आने का मौका दिया न खुद यहां आने का!
एक बार सोच तो लेते हमारी उम्र का सूरज ढलते ढलते शाम की तरफ बढ़ रहा है ! हम तो पके फल हैं क्या पता कब टपक जाऐं!जब तक जिंदा हैं तीज-त्यौहार साथ मना लो !बाद में तो जैसे चाहोगे मनाओगे ही!क्या पता अगली दीवाली हम रहें ना रहें!
बिट्टो के पास जाने की सोची तो वहां उसके सास-ससुर आने वाले है!उसने कह दिया कि उसकी सास पसंद नहीं करती कि जब वे आऐं तो मेरा कोई रिश्तेदार आए!
बड़े जेठ जी तो बहुत प्यार दुलार से बुलाया करते थे इस बार वे भी टाल गए!
साल भर के त्यौहार पर अकेले क्या पका लें ,क्या मना लें बीना फिर सुबकने लगी!
फिर भी मुकेश उन्हें बाज़ार ले गए बेमन से वे एकाध बर्तन ले आई!
दरअसल बीना शुरू से ही अपने बच्चों को लेकर कुछ ज्यादा सी संवेदनशील थीं!उनकी दुनिया बस बच्चों के इर्द-गिर्द ही घूमती!
बच्चों के बड़े होने और अपनी अपनी गृहस्थी में मगन हो जाने पर वे अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगी!
मुकेश जी ने तो स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लिया पर बीना जी उससे उबर न पाई! उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें बच्चों की कमी बहुत अखरती!
उनका हर वक्त गुमसुम रहने से मुकेश जी को घबराहट होती!
घर में काम करने वाली शीला भी उनका बहुत ख्याल रखती और समझाती कि साल भर के त्यौहार पर दुखी ना हों!
दीवाली के दिन मुकेश जी ने बहुत लाड और जिद करके बीना जी को उडद की कचौड़ी,आलू का रसा,मीठा कद्दू,दही बड़े ,खीर बनवाई!
शीला ने रंगोली वगैरह बनाकर सब इंतज़ाम वैसे ही कर दिया जैसा हर साल होता था!
सरसों के तेल के दिये,रोशनी की लडियां, मोमबती सब मुकेश जी ने तैयारी कर दी!
शाम को पूजा से पहले मुकेश ने तैयार होकर बीना को भी जबर्दस्ती तैयार कराया!पूजा करने से पहले बीना फिर सुबकने लगी”बच्चों के बिना भी कोई त्यौहार होता है क्या?”तभी दरवाजे पर घंटी बजी बीना बोली लगता है बच्चे मुझे सरप्राइज देने आ गए!”
भागकर दरवाजा खोला तो शीला अपने और पड़ोसियों के बच्चों को सजाधजा कर लिए खड़ी थी सारे बच्चे चिल्लाए “हैप्पी दीवाली आंटी जी”और बीना जी के पैर छू कर उनसे लिपट गए!
बीना जी की आंखों से आंसू बह निकले!
मुकेश जी ने शीला को इशारा किया उसने किचन में से समोसे मिठाईयां,बर्गर चाऊमीन लाकर बच्चों में बांट दिया!
बच्चोंको चाव से नाश्ता करते देख बीना जी को अपने बच्चों की याद आ गई! ऐसे ही बिट्टो और संजू उनके हाथ की बनी मिठाई खाते थे!पड़ोस के बच्चों की आंखों की चमक देख बीना जी खुशी से मुस्करा उठी!
फिर मुकेश जी सबको आंगन में ले गए और बच्चों के साथ पटाके और फुलझडियां चलाने लगे!बच्चे बीना जी को भी खींचकर ले गए और बोले “आप डरो मत फुलझडी पकड़ लो !”
बीना जी को याद आया ऐसे ही छोटा संजू और बिट्टो उनको कहा करते थे जब वे पटाके छूने से डरती थीं!उन्होंने बच्चों को अपनी गोद में समेट लिया!
बीना जी के चेहरे की खुशी देखकर मुकेश जी और शीला ने चैन की सांस ली!
उनकी जीवन संध्या में उम्मीद के दिये तो जल उठे थे!