जज्बा – कंचन श्रीवास्तव

आव भगत में लगे लोगों को देखकर रिचा हैरान है सोचने पर मजबूर हैं कि क्या ये वही लोग हैं जिन्होंने वर्षों पहले नमक मांगने पर नहीं दिया था।

दरअसल हुआ ये कि उन दिनों उसकी हालत पतली थी सास ससुर का देहांत हो गया था और कहते हैं ना कि औलाद चाहे जैसी हो जब तक मां बाप रहते हैं कलेजे से लगाके रखते हैं।

बस वही यहां भी हुआ,शादी के बाद हमें उसे कभी भी किसी बात की कमी नहीं अखरी ।

सच बहुत अच्छे थे वो पता नहीं कैसे लोग सांस ससुर की बुराई करते हैं पर उसके तो बहुत अच्छे थे।

क्योंकि उसे कभी भी मां बाप को छोड़ना नहीं अखरा, पर जैसे ही उनकी मृत्यु हुई सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया लोगों ने ये जानते हुए भी की पति बेरोजगार हैं और मेरी नौकरी छोटी है उतने में काम नहीं चलेगा।अलग कर दिया।

और जब अलग कर दिया तो मैंने भी बिना चू चा किए स्थिति को स्वीकार लिया।

इस बीच पति ने भी कहीं काम ढूंढ लिया ,दोनों ही कमाने लगे ।

घर अपना रहा इसलिए गृहस्थी चलाना आसान रहा।हां वो बात अलग है कि  तंगी रहन सहन, कपड़े आदि से समझ आ जाता। उसकी कभी किसी से कुछ न मांगने की आदत ने उसका सर कभी किसी के सामने  झुकने ना दिया।


पर एक दिन इसके घर में नमक नहीं था और  इसने बगल वाली चाची से मांग लिया।

इस पर उन्होंने साफ मना कर दिया ये कहके कि आज ही खत्म हुआ है।

और दरवाज़े से ही वापस भेज दिया।

और इसे नमक की शख्त जरूरत थी क्योंकि बेटी का वी पी लो  था। उसे नमक नींबू चीनी का घोल देना था।

जो कि आंधी रात में संभव न हुआ क्योंकि दुकानें सारी बंद थी

तो इसने कैसे भी करके रात बिताया। और सबेरे तक स्थिति ज्यादा खराब होने के कारण एडमिट करना पड़ा।ऐसे में मदद के लिए कोई भी आगे न आया ।जब कोई न आया तो इसने अपना जेवर बेच दिया।

और उसी समय इसने कुछ बनने की ठानी।

कहते हैं ना कि कुछ भी करने की कोई उम्र नहीं होती। हालांकि ये चालिस पार थी पर कुछ कर गुजरने का जज्बा जबरदस्त था।

इसने पढ़ाई की और उच्च पद पर कहीं कार्यरत हो गई फिर  स्थितियां धीरे धीरे संभलने लगी।

यहां तक कि नौकर चाकर हो गए।

इसकी भनक जब अपनों को लगी तो जलकर खाक तो हो गए।

पर मुंह देखी तो करनी ही थी।इसे काल किए पहले तो ये फोन न उठाई पर बच्चों के कहने पर कि अगर तुम भी वैसा ही करोगी तो फिर तुममें और उनमें अंतर क्या रह जाएगा,तो इसने उठा लिया।

उठाते ही आवाज आई।


बधाई

हो रिया तुम तो बहुत आगे बढ़ गई कभी घर आओ।

इसने ठीक कहके टालना चाहा तो वो पीछे ही पड़ गई।

अब पीछे पड़ गई तो इसे जाना ही पड़ा।

जाते ही जो तिहमतदारी मिली उससे वो हैरान कम सोचने पर मजबूर ज्यादा है  कि क्या ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी अपने बच्ची के लिए नींबू मांगने पर रहते हुए भी  मना कर दिया था।

और अपने से ही बतिया रही , आज इंसान  कैसा हो गया है  इंसान की नहीं उसके पद और धन दौलत की कद्र करता है

और खुश इस लिए की उसकी मेहनत रंग लाई और उन लोगों को झुका दिया जो उसको देखते दरवाजा बंद कर लेते थे कि कहीं कुछ मांग न लें।

इतने में हिलाते हुए

अरे कहां खो गईं चलिए खाना लग गया , मिलकर खाते हैं। सच आज वो सोचने पर मजबूर हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा जीवन ही नहीं बदलता बल्कि उन अपनों की सोच भी बदल देता है जो आपके बुरे वक्त में आपके हाल पर  छोड़ देते हैं । उठी और डाइनिंग टेबेल की ओर बढ़  गई।

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