इस बार भूल नहीं…. – पूर्णिमा सोनी : Moral Stories in Hindi

“आशी…कब से बाहर धूल में खेल रही है… भीतर आओ”

नीलिमा जोर से चिल्ला रही थी… चिल्लाते चिल्लाते,गला सूख सा आया… और जोर से खांसी उठी, खांसते खांसते बिस्तर के एक किनारे लटक सी गई।

घबराकर अनिमेष की नींद टूट गई। फ़ौरन उठकर बगल की टेबल पर रखे जग में से गिलास भरकर पानी  नीलिमा की पीठ सहलाते हुए उसे पिलाया। पता नहीं कैसे आज आंख लगी रह गई। वो तो बस नीलिमा की ही नींद सोता है और उसी की नींद जगता है।

कितने बरस बीत गए, यूं ही उसे  अपनी पत्नी ( नीलिमा) की देखभाल करते। दिन, महीने और साल बीतते गए मगर उसकी हालत में कोई सुधार नहीं दिखाई पड़ता। मगर अनिमेष जैसा गज़ब जीवट वाला, शायद ऊपर वाले ने बड़ी फुर्सत में बनाया था। देखने वाले अपनी पत्नी के प्रति उसका स्नेह ( और समर्पण) देख कर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।सच ही है उसने तो अपनी ( लगभग अर्धविक्षिप्त,या अर्ध तंद्रा में) रहने वाली पत्नी की देखभाल मेंअपनी पूरी उम्र ही दे दी।

तो सबसे पहले नीलिमा और अनिमेष की विवाह के शुरुआती वर्षों में  आपको ले जाते हैं……..

विवाह के साल भर भी नहीं पूरे हुए थे कि नीलिमा की गोद में नन्ही सी गुड़िया जैसी बेटी आशी आ गई। अनिमेष आफिस को निकल जाता तो, घर में नीलिमा और आशी ही बचते।अब तो आशी

अपने पैरों पैरों चलने भी लगी थी। नीलिमा उसके आगे पीछे घूमती मगर कभी कभी बाहर निकल जाती खेलने, अभी उसके घर के बाहर पक्की सड़क नहीं बनी थी, पगडंडी ही थी। मुख्य मार्ग से अंदर गली तक का रास्ता कच्चा ही था। ज्यादा वाहनों की आवाजाही नहीं थी, मगर नीलिमा उसे बाहर जाने न देती, क्यूंकि बाहर मिट्टी में खेलने लगती।

और उस दिन…

नीलिमा काम में लगी थी, पता नहीं कब आशी बाहर निकल गई और नीलिमा बाहर चिल्लाते हुए निकली

आशी कब से बाहर खेल रही है , भीतर आओ

मगर,… बाहर निकलने पर, पता नहीं कब उस सूनी गली से कोई गाड़ी गुजर गई और,आशी उसकी चपेट में आ गई।

पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया,आशी को तो नहीं बचाया जा सका …. और नीलिमा भी इस हालत में आ गई।उसकी दिमागी हालत स्थिर ना रही। उसके लिए दुनिया और समय वहीं ठहर गया जब वो घर के भीतर काम कर रही है और आशी खेलते हुए बाहर निकल गई।

अनिमेष ने भी, अपनी नौकरी छोड़ कर घर के बाहर ही दुकान खोल ली। अब उसकी दुनिया बस नीलिमा की देखभाल करना, उसे समय से दवाएं देना ही था। नीलिमा को किसी चीज, किसी बात की सुध-बुध ना रहती, अनिमेष के सहारे नहा धो कर बैठती तो घंटों बैठी ही रहती, दीवार से टिके शून्य में देखा करती,

अनिमेष भीतर आता तो लिटा देता, उसे तो खुद सोने का भी होश ना रहता। शरीर में कोई रोग नहीं था,बस डाक्टर ने कहा था कि जबर्दस्त दिमागी सदमा लगा है, इन्हें बस खुश रखिए,मन किसी और तरफ़ मोड़िए। अनिमेष ने आशी की सारी फोटो  एलबम छिपा कर रख दिए थे।

यूं तो बगल के ही घर में ही बड़े भैया भाभी का परिवार रहता था, मगर इस दुनिया में कौन किससे मतलब रखता है ?वो भी मानसिक  रूप से बीमार स्त्री से??

 एकाध बार नीलिमा ने उनके घर जाकर जिठानी जी के साथ बैठकर , बातें करके जी हल्का करना चाहा, मगर उन्होंने अनिमेष को काफी भला बुरा कहा… अपनी ये पागल स्त्री तुम्हीं संभालो

 आंखों में दुःख  और अपमान के आंसू भरे उसने नीलिमा को भी उसने बगल में जाने से मना कर दिया।

 अपना दुख बस अपना ही होता है 

 खुशियां बांटने तो सभी आ जाते हैं….. मगर दुःख..? .. वो घर के निपट अंधियारे में ही अपने साथ रहता है 

*****

बगल के घर में चहल-पहल है भैया के बेटे की शादी है, कहीं रिश्तेदारी में ब्याह में गई थीं तो एक (अनाथ) लड़की पसंद आ गई। माता-पिता के गुज़र जाने के बाद,मामा मामी ने पाल पोस कर बड़ा किया था। मंदिर में सादगी से विवाह हुआ बहू घर में आई अनिमेष नीलिमा को  भाभी के घर लेकर गया।दीवार के सहारे बेसुध बैठी  थीनीलिमा,बहू ने आकर झुक कर पैर छूने चाहे तो

बहू के चेहरे पर निगाह पड़ते ही नीलिमा बोल उठी

आशी…

जिठानीजी ने अनिमेष को इशारों में समझा दिया कि शायद तबियत बिगड़ने वाली है, घर ले कर जाओ।

घर आकर नीलिमा  को सुला कर अनिमेष ने बरसों बाद बक्से को खोलकर आशी की फोटो निकाल कर देखी, शायद आज आशी होती तो इतनी ही बड़ी होती,ऐसी ही दिखती, मुझे भी बहू के चेहरे में उसकी झलक सी दिख रही थी। बरसों से अथाह पीड़ा को दोनों हृदय में दबाए हुए हैं। अपना सारा जीवन दिया अनिमेष से इस अनिर्वच्य पीड़ा के साथ जिंदगी बिता दी।

पीर पर्वत सी हो गई है अब तो पिघलनी चाहिए…..

बगल में जिठानी जी का अतिशीघ्र ही सास रुप खुलकर सामने आ चुका था। दिन भर चक्की की तरह बहू को काम में पीसती मगर तानों की बौछार जारी रहती, क्या मिला हमें,… कहां से इस अनाथ को उठा लाए,इतने पैसे वाले घरों से रिश्ता आ रहा था, मेरी ही मति मारी गई थी।

सबको पता था कि उनके नालायक लड़के को ऐसी लड़की दिया लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलती, मगर कौन बोले?

आज रोज़ की तरह नीलिमा दीवार से सट कर बैठी है,खुले दरवाजे से बाहर शून्य में देख रही है।

ये क्या?

बगल के घर से जिठानी जी ने ज़ोर से धक्का मार कर बहू को बाहर निकाल दिया

अंदर से बड़बड़ाने की आवाज की आवाज आ रही थी

कहां से अनाथ लड़की को उठा लाए, हमारी किस्मत फूटी थी, निकल जा इस घर से बाहर… कौन है पूछने वाला

नीलिमा जैसे तंद्रा से जाग उठी, बाहर धूल में सनी बहू पड़ी थी,दूर से कोई गाड़ी आ रही थी।

नीलिमा जैसे तंद्रा से जाग उठी,वो भागती हुई बाहर आई और  जिठानी की बहू को सीने से लगाकर खींच कर अलग किया।और

आशी क्यूं धूल में पड़ी है, भीतर आ बेटा

वो गाड़ी धड़धड़ाते हुए निकल चुकी थी। नीलिमा आशी(बहू को) सीने से लगाए थर-थर कांप रही थी।

इस बार नीलिमा से कोई चूक नहीं हुई थी…. अबकि बार उसने अपनी आशी को बचा लिया था।

किसने कहा कि अनाथ है ये बच्ची है,ये मेरी बेटी आशी है,मेरा घर इसका घर है,हम हैं इसके माता-पिता, कोई अत्याचार ना होने दूंगी मैं अपनी बच्ची पर,…..

नीलिमा गुस्से से कांप रही थी,जोर से खांसी उठी , अनिमेष और पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया,

 रौद्र रूप धारण किए नीलिमा कहीं से भी मानसिक रुप से कमजोर, बीमार नहीं…. वरन् चेतना और चैतन्यता से जागृत लग रही थी!

पीछे रुका वक्त…. उसकी गलती सुधारते हुए, उसके मन मस्तिष्क से हट चुका था 

अनिमेष  नीलिमा और आशी(?) को  भीतर ले आया था। घर में एक बार फिर घर की बरसों पहले खोई बेटी लौट आई थी। बहू को उसके माता-पिता मिल गए थे।

और बरसों से तरसे माता-पिता को उनकी बेटी!!

जिठानी जी कुछ बोल नहीं पा रही थी।

नीलिमा और अनिमेष से खुल कर बोल दिया था….. अब से जिठानी जी उसे अनाथ ना समझे… वो उनकी बेटी है

 किसी की हिम्मत ना था, अब बहू को एक भी अपशब्द बोलने की

अब उनकी बहू के सिर पर उसके माता-पिता की छत्रछाया जो थी!!

 जिठानी के अपमान के आगे अब वो एक सुघड़ बेटी की मां के सम्मान का टीका मस्तक  पर सजाए… आज वो खड़ी थी 

 कोई अनाथ बच्ची भी इस रुप में मिले माता पिता से अभिभूत थी!!

पूर्णिमा सोनी

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# अपमान कहानी प्रतियोगिता, शीर्षक – इस बार भूल नहीं….

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