विमल जी का मन आज ऑफिस में लग ही नही रहा था…वो बार बार घड़ी देख रहे थे…उनके घर में दीपावली पर घर के सभी सदस्यों के नए कपड़े बनते हैं…सभी लोग नए वस्त्रों को धारण करके ही पूजा पर बैठते हैं।
अम्मा कई दिनों से हल्ला कर रही हैं। आज तो उन्होने अनशन तक करने की धमकी दे दी थी।
“अरे बेटा, त्योहार सिर पर है। आज सबको बाज़ार लेकर जा और सबकी पसंद से बढ़िया कपड़े दिला कर ला”
दोनों बेटों और बहुओं का तर्क था…अभी बहुत कपड़े हैं…केवल चारों बच्चों को दिला देते हैं।”
सुन कर भड़क गई थीं,”मेरे बाद तुमलोग मनमानी करते रहना पर मेरे जीते जी ये परंपरा जीवित रहेगी। तुम्हारे बाबूजी को होली दीपावली पर नए वस्त्रों का बहुत शौक था…अपनी सीमित आय में भी वो सबको नए वस्त्र जरूर दिलाते थे। आज सबको लेकर जाओ।”
उनकी पत्नी माधुरी बोली थी,”अम्मा, आप भी चलना। इस बार आपको भी अपने लिए बढ़िया साड़ी लेनी होगी।”
पर वो राज़ी नही हुई…”मैं तो तुम्हारे बाबूजी की लाई हुई वो गुलाबी बूटियों वाली साड़ी ही पहनूँगी… मुझे लगता है… वो सामने बैठे सबको आशीर्वाद दे रहे हैं।”
सब सोचते सोचते विमल जी की आँखें गीली हो गईं।बगल की टेबुल वाले गुप्ता जी देख रहे थे। उत्सुक होकर पूछने लगे…सब जानकर बेतहाशा हँसने लगे,”अरे मिश्रा जी, बच्चों तक तो ठीक है पर आप सब इतने बड़े हो गए हो…नए कपड़े ऐसे क्या जरूरी हैं… आपकी माँ आप सबको भी अभी तक बच्चा ही समझती हैं।”
वो बहुत गर्व से बोले,”जी सर, हमारी माँ पुरानी परंपराओं को बहुत मानती हैं और फिर हम कितने भी बड़े क्यों ना हो जाए…रहेंगे तो उनके बच्चे ही।”
नीरजा कृष्णा
पटना