हम नहीं चाहते … – कंचन श्रीवास्तव 

कुछ दिनों , नहीं नहीं कई सालों तक यानि यही कुल तीन चार साल तक शब्बो ने देखा ,बहू सबके लिए चाहे वो खाना हो या नाश्ता सब कुछ बराबर से परोस देती है  ‘ और ये कहकर की हम बाद में का लेंगे ‘ खुद के खाने को टाल जाती है।

फिर कभी कम तो कभी नहीं या जरा सा खाकर उठ जाती ये कहकर की भूख नहीं है।’ इस तरह अपने हिस्से का नाश्ता या खाना वो रख देती ‘।

और पति या बच्चे के आने के बाद उन्हें गर्म करके खिला देती।

और खुद……………?

खैर ऐ हर स्त्री की आदत होती है कहकर सब टाल देते ।

पर दादी सास ने इस उम्र में उस तकलीफ को महसूस  किया ।

करती भी क्यों न आखिर हैं तो वो भी एक औरत ही ,और औरत के मन को जितना औरत समझती है उतना कोई नहीं ।

भले लोग दुश्मन कहते हो एक दूसरे की पर हकीकत भी यही है कि समझती भी वही है एक दूसरे को।

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समझे भी क्यों ना उसे अच्छे से याद है जब वो छोटी थी तो उनकी मां भी यही किया करती थी। यहां तक कि खुद भूखी रह जाती पर परिवार का पूरा ख्याल रखती।उसके बाद वो इस गृहस्थ जाल में फंसी तो वो भी यही करी ।

और बहू ने भी यही किया।जिसको खिला देती और खुद कम खाकर या आधा तीहा खाकर या पानी पीकर काम चला लेती रही कारण था कि वक्त से पहले चेहरे पर झुर्रियां पड़ गईं।उम्र झलकने लगी और तो और यदाकदा बीमार भी रहने लगी।




जिससे सब कुछ अस्त व्यस्त रहने लगा और जैसे तैसे पढ़ते बेटे की शादी करनी पड़ी।

क्या करें, ‘ घर को संभालने वाला जो कोई नहीं रहा’।

हल्का की बाद में बेटे ने नौकरी कर ली।पर वो नहीं कर सका जो वो चाहता था।

मजबूरी थी ,साल के भीतर ही एक बच्चे का बाप जो बन गया।

चार पीढ़ियों के इस संगम में  सब कुछ ठीक ठाक चल  रहा , पर इन सबके बीच उम्रदराज दादी ने जो महसूस किया।

वो अद्भुत था।

तभी तो नाश्ता लेकर आती नतपतोहू से कहा ‘ बेटा आज से नाश्ता सब लोग साथ करेंगे’।

इस पर सभी ने समझाया कि नहीं आप कर लीजिए हम लोग कर लेंगे।

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पर वो नहीं मानी और जिंद पर अड गईं, ‘ कि नहीं हम साथ करेंगे।

ऐसे में उनकी जिद्द के आगे सबको हारना पड़ा।और सब एक साथ बैठे।




फिर जब रीना ( नत पतोहू) नाश्ता लेकर आई तो उसका हाथ पकड़कर बैठा लिया और बोली तुम भी अपना नाश्ता लेकर आओ।

तो वो बोली दादी हम बाद में कर लेंगे।

इस पर उन्होंने कहा, ‘ नहीं बेटा अब से सब लोग बराबर से और साथ नाश्ता खाना करेंगे।

हम औरतों की आदत होती है कि जो है उसे तो सबको खिला ही दो साथ ही अपने हिस्से का भी खिला देते हैं।’

कभी थोड़ा,कभी कभी कम और कभी पानी पीकर काम चला लेते हैं ।

और यही हमारे उम्र से पहले ढलने का कारण होता है।

जो हम समझ नहीं पाते।

हमने दो एक पीढ़ी पहले और दो पीढ़ी बाद तक का हाल यही देख रही हूं

पर अब तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होने दूंगी।

क्योंकि मैं देख रहीं हूं कि जब खाने की उम्र थी तब अपनों को खिलाया और जब  खाने को मिल रहा तो पेट साथ नहीं दे रहा।

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इसलिए तुम भी साथ खाओ और स्वस्थ रहो वरना हम लोगों की तरह तुम्हारा भी हाल होगा।

हम नहीं चाहते वक्त से पहले झुर्रियां पड़ जाए,उम्रेदराज भी लगने लगो।

ये सुन रीना की आंखें भर आईं। गले लग कर बोली।कौन कहता है औरत औरत की दुश्मन होती है।

देखो ना दादी हमरा कितना ख्याल रखती है।

 

स्वरचित

कंचन श्रीवास्तव आरजू

 

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