दिल्ली के फार्म हाउस में बड़ी बेटी की शादी हो रही थी।
बाराती फ्रांस के पेरिस से आये थे। बेटी की सहेलियां भी देश विदेश से आईं थीं। हमारा परिवार और आत्मीय जन भी इस शादी में शरीक होने आये थे।
विदेशी थे इसलिए इस शादी के रीति-रिवाजों में बहुत ही दिलचस्पी ले रहे थे।
घराती,बराती दोनों ही एक-दूसरे को देख कर प्रफुल्लित हो रहे थे।
बड़े ही आश्चर्य से एक दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखे हुए थे।
चूंकि शादी दो देशों के परिवार के बीच थी, फोटोग्राफर के कैमरे एक एक पल की खूबसूरत तस्वीरें खींच रहे थे।
बरात आई,हम सबने उनका स्वागत तिलक, फूल माला और आरती से किया,हम सब आश्चर्य चकित हो गये जब देखा कि सभी पुरुष भारतीय वेशभूषा शेरवानी पहने हुए थे और सभी लड़कियां हाथों में मेहंदी , बालों में गजरा, खूबसूरत, रंग-बिरंगी साड़ी पहने हुए थीं।
अब एक एक करके उनके देश के रिवाज के अनुसार लड़के, लड़कियां एक दूसरे के गालों को चेहरा सटा कर पुच्च पुच्च कर रहे थे,यानि किस कर रहे थे।
मेरा भी स्वागत कुछ ने हाथ जोड़कर नमस्ते कह कर किया और कुछ ने गालों पर पुच्च पुच्च किया।
इतने में समधिन आगे बढ़ी और उन्होंने भी ऐसे ही किया, मैंने उनको हंसते हुए प्यार से गले लगा लिया।
अचानक मैंने देखा कि समधी जी आगे बढ़ कर मेरे पास आये और जैसे ही उन्होंने मुझे पुच्च पुच्च करना चाहा, “मैं शर्म से पानी-पानी हो गई “और अपना चेहरा दोनों हाथों से ढांक कर पीछे पलट गई,नो,नो कह कर। समधी जी मेरी इस हरकत से झेंप गये और वो बहुत शर्मिन्दा हुए।सब लोग खिलखिला कर हंसने लगे।
मेरी छोटी बेटी और अन्य लोगों ने समझाया, इनका स्वागत करने का ये तरीका है, ये आपको टच नहीं करेंगे,गाल भी नहीं छुएंगे,बस दांए बांए गालों को किस कर लेंगे।
पर मैं नहीं मानी । हमारे संस्कार ऐसे नहीं हैं। समधी जी खिसिया गये थे। वो भी शर्म से पानी-पानी हो गये थे।।उन्हें अपना अपमान भी सबके सामने लगा,पर इतने सालों बाद भी वो मुझसे दूर से ही नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ देते हैं।
मैं भी जब उन्हें देखतीं हूं, शर्म से लाल हो जाती हूं।
बच्चों की और महिलाओं की बात और है,पर समधी,हे भगवान, हमारे गांव में तो समधी जी को छूते भी नहीं और लंबा घूंघट उनके सामने निकाले रहते हैं।।
हम तो ऐसा नहीं करते,। पर मर्यादा का पालन तो करना चाहिए।
बेटी ने उन्हें समझाया कि हमारे कल्चर में ऐसा नहीं होता है। आप बुरा मत मानिएगा।
पर फोटो तो खिंच गई थी, उसमें अपना चेहरा छुपाये हुए हम एक यादगार तस्वीर बन चुके थे, हमारी उस अदा पर आज भी सब हंसते हैं, और हमारे चेहरे पर शर्म की लाली छा जाती है।
सुषमा यादव, प्रतापगढ़, उ प्र
मुहावरा आधारित लघुकथा
शर्म से पानी-पानी हो जाना