विभा इधर काफ़ी दिनों से महसूस कर रही थीं…उनका सात वर्षीय पुत्र अनुपम बहुत उदास और सुस्त सा हो गया है। खाना पीना भी कम हो गया है। आज तो हद ही हो गई। स्कूल से आकर सीधे अपने कमरे में जाकर रोने लगा था। वो व्याकुल होकर उसके पास गई और उसे गोद में बैठा कर कारण पूछने लगीं।
“क्या बात है अनु बेटा? तुम बहुत उदास रहने लगे हो। आज तो रो भी रहे हो। मुझे बताओ तो बेटा।”
वो झिझक रहा था। उससे आँखें चुराने की कोशिश कर रहा था। वो उसका चेहरा हाथों में लेकर सीधी बैठ कर उसे प्यार करने लगी। वो रो पड़ा,”मम्मी, स्कूल में सब मुझे चिढ़ाते हैं और कहते हैं कि मैं आप दोनों का बेटा नहीं हूँ।”
वो बुरी तरह चौंकी थी। उसे वो दिन याद आ गया …वो और कमल बाबू रात में किसी पार्टी से लौट रहे थे। रास्ते में एक पेड़ के नीचे एक थैले से बच्चे के रोने की आवाज़ से वो रूक गए थे।उन्हें मामला समझने में देर नहीं लगी। कोई मजबूर माँ उसे वहाँ छोड़ गई थी। वो जरूर बहुत मजबूर होगी ,तभी तो अपने जिगर के टुकड़े को वहाँ फेंक गई थी वर्ना लड़के को कौन छोड़ता है। लड़कियां तो बहुत छोड़ी जाती हैं। दोनों ने एक दूसरे को देखा था और कमल बाबू के मौन समर्थन ने उसको हिम्मत दे दी थी। घर पर अम्माजी थोड़ा भड़की थीं पर बाद में वो उनका अनुपम बन गया था… उनकी प्यारी बेटी आस्था का छोटा प्यारा भाई।
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पर आज तो बड़ी विकट स्थिति आ गई हैं। वो अपने स्वप्नलोक से बाहर आ गई थी। वो उन्हें झिंझोड़ कर पूछ रहा था,”मम्मी,क्या आपने मुझे अपने टमी में नहीं रखा था। क्या मैं आपका गोद लिया बेटा हूँ?”
वो चुप बैठी रह गई थीं। वो पुनः पूछने लगा,”सब कहते हैं…तेरी शक्ल बिल्कुल अलग हैं। मैं दीदी की तरह गोराचिट्टा भी नहीं हूँ। “
वो थोड़ा सम्हल कर कहने लगी,”सब झूठ बोलते हैं। तुम मेरे राजा बेटे हो। कन्हैया जी भी तो साँवले सलोने थे ना।”
तभी अम्माजी अंदर आ गई। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,”हाँ बेटा, तुम्हें तुम्हारी मम्मी ने अपने टमी में तो नहीं रखा था पर अपने ह्रदय में रख कर अपने स्नेह के लहू से जरूर सींचा है।”
बेचारा बच्चा क्या समझता, बस अपनी माँ से लिपट गया था। वो भी उसे अपने सीने से लगा कर सुबकने लगी थी।
नीरजा कृष्णा
पटना