“भैया, रुद्रप्रयाग चलोगे क्या”? इस आवाज ने देविका को पलट कर देखने पर मजबूर कर दिया ।यह वह आवाज थी जिसे वह लाखों में भी पहचान सकती थी । एक आड़ में छुप कर वह उसे देखने लगी। टैक्सी वाले के मना करने पर वह आगे बढ़ने लगा ।उसने देखा…” हाँ वही है ।आज भी वही तीखी आवाज। चाल में वैसी ही तेजी ।आँखों पर चश्मा।
ऊपर कुर्ता और नीचे पैजामा जो उसे बेहद पसंद था ।उसे याद आया वे जब भी साथ होते वह कहती …..”तुम चश्मा मत पहना करो। वह कहता…..” क्यों “?……”वह इसलिए कि फिर तुम्हारी आँखों में मैं चाह कर भी डूब नहीं पाती”। ….”अच्छा। पर बिना चश्मे के मैं तुम्हारी खूबसूरती और शरारतों को पढ़ नहीं पाता”। देविका ख्यालों से बाहर आ गई।
सोचने लगी….. दिनकर रुद्रप्रयाग क्यों जा रहा है? इतने समय बाद उसे देख कर प्यार नमी बन कर उसकी आँखों में मचल गया, पर उसने खुद को संभाल लिया।वो अब दिनकर के पीछे-पीछे चलने लगी ।मंजिल दोनों की एक ही थी…. “रुद्रप्रयाग” तभी उसने देखा दिनकर ने टैक्सी वाले से बात की और उसमें बैठ गया। उसे भी तुरंत ही एक टैक्सी मिल गई और वह भी उस में बैठकर यादों के सफर में खो गई ।
दिनकर और वह दोनों एक प्रोग्राम में मिले थे। प्रोग्राम का संचालन देविका ने किया था। देविका की आवाज और बोलने का अंदाज दिनकर को इतना भा गया कि प्रोग्राम के अंत में वह उससे मिलकर ही गया।
दूसरे दिन से फोन पर बातें और फिर मुलाकातें जो शादी पर आकर समाप्त हुई। शुरू- शुरू में सब कुछ बहुत अच्छा चला। दिनकर के आई-बाबा उसके साथ नहीं रहते थे। देविका ने उन्हें कई बार बुलाया,पर हर बार वे टाल गये क्यों? यह उसे बहुत बाद में पता चला ।दिनकर को हर छोटी-छोटी बातों में बहुत गुस्सा आता था ।गुस्से में वह सारी मर्यादा लांघ जाता था ।यही देविका साथ भी रोज होने लगा। शुरु-शुरु में देविका ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की ,लेकिन फिर उसने खुद को खामोश कर लिया। उसे लिखने का शौक था ।
उसने फिर से लिखना शुरु कर दिया। कागज और कलम के साथ उसका सफर खयालों के आसमान को छू लेता । तनहाई में उसके शब्द उसके साथी बन गए। पर एक दिन हद हो गई ,जब दिनकर ने गुस्से में उससे कहा ….”कौन है वह जिसके साथ हँस-हँसकर बातें हो रही थी”? उसने हैरानी से उसे देखा और कहा…” कब “?तभी उसे याद आया कि वह कल शरद बाबू से मिली थी। उसने कहा ….वे शरद बाबू है ।हमारे पड़ोस में रहते हैं “।
….”ओह ,तो यह बात है। पराए मर्दों का चस्का लग गया है तुम्हें ।इसीलिए घर का मर्द अच्छा नहीं लगता”। यह सुनते ही देविका बुत बनकर रह गई ।दिनकर जिसे उसने अपने दिल में बसाया था ।वह दिनकर जो उसे ब्याह कर लाया था ।सातों वचन में से एक भी वचन निभाने की जिसने जरूरत नहीं समझी ।
बल्कि आज उस पर यह आरोप लगाकर उसने साबित कर दिया था कि उनके प्रेम की नींव कितनी कमजोर थी । उसकी खामोशी को समझने के बजाय उसने उस पर यह आरोप लगाया ,सोचकर वह बिखरती चली गई ।दो दिन तक उससे कुछ खाया पिया ही नहीं गया। तीसरे दिन उसने अपना सामान पैक किया और कहा ……”मैं जा रही हूँ। अगर तुम्हें कभी अपनी गलती महसूस हो तो चले आना ।वरना मुझसे मिलने की कोशिश भी मत करना”।
दिनकर उसे जाते हुये देखता रहा। देविका ने फिर से अपने पुराने काम को संभाल लिया ।पर अब उसकी वह चंचलता गंभीरता में बदल चुकी थी। खुद पर लगे आरोप की वजह से वह आहत और परेशान रहने लगी। एक दिन शरद बाबू उसके घर पर आए और उन्हें जब सारी बातें मालूम हुई तो वे हतप्रभ रह गए। वे देविका से बहुत प्रभावित थे और उससे बेहद स्नेह करते थे। दोनों की रुचि एक ही होने की वजह से उनकी बातों का दायरा कागज ,कलम व शब्द ही होते थे। उन्होंने देविका को हमेशा प्रेरित किया था क्योंकि वह देविका में छुपी प्रतिभा को पहचान गए थे।
देविका भी उन्हें गुरु मानती थी। उसी गुरु को लेकर जब दिनकर ने बिना कुछ जाने उस पर प्रहार किया तो वह सह नहीं पाई ।देविका बहुत स्वाभिमानी थी ।शरद बाबू ने उसे बहुत समझाया की वह दिनकर के पास लौट जाये,लेकिन उसने अपना इरादा नहीं बदला। हार कर शरद बाबू ने उससे कहा ….”ठीक है। तुम अपना शौक अभी भी जारी रख सकती हो। तुम्हारी कुछ रचनाएं मुझे दे दो “।कहकर वे चले गए। देविका की लिखी रचनाओं ने तहलका मचा दिया।
नारी मन की व्यथा हर किसी को झकझोर गई ।शरद बाबू उसे हर तरह से सपोर्ट करने लगे। हमारे समाज में अकेली औरत को लोग अपनी प्रॉपर्टी समझ लेते हैं ।यही कई बार देविका के साथ हुआ और फिर एक दिन देविका फिर से दुल्हन बनी और शरद बाबू के आंगन में चांद बनकर जगमगाने लगी ।शरद बाबू की वजह से साहित्य जगत में वह देविका से “देविका रानी” कहलाने लगी ।पर आज इतने सालों बाद दिनकर को देखकर उसकी सूखी नदी फिर से बहने लगी।
…..”रुद्रप्रयाग आ गया मैडम “।सुनते ही वह वर्तमान में लौट आई। थके कदमों से आगे बढ़ी और जिस काम के लिए वह आई थी उसे करके टहलने निकल पड़ी। सोच में भी नहीं था कि यह टहल उसकी जिंदगी में फिर से हलचल मचा देगी।….” अरे ,गिर जाओगे बेटा “।फिर वही आवाज ,लाखों में एक वाली ।पलट कर देखा तो वही था ।तभी दिनकर ने उसे देख लिया ।वह तेज कदमों से आगे बढ़ चली पर दिनकर ने आवाज लगाई
….”देविका रुको” कहते हुए वह उसके सामने आ खड़ा हुआ। ….”मुझे माफ कर दो देविका ।तुमने कहा था ना ।आज मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है, इसीलिए तुम्हारे सामने आने की हिम्मत कर रहा हूँ “।देविका चुपचाप उसे देखे जा रही थी। दिनकर ने फिर कहा….” मुझे शरद बाबू ने सब बता दिया है ।तुम्हारे जाने के बाद हर पल मैं घुटता रहा।
तुम देविका से देविका रानी बनी तब भी मैं कुछ नहीं कर सका क्योंकि यह मेरे गुनाहों की सबसे सही सजा थी। पर अब मैं सब सच जान गया हूँ ।कल शरद बाबू ने ही बताया कि तुम्हें इज्जत और मान देने के लिए उन्होंने तुमसे ब्याह रचाया। इसीलिए मैं रुद्रप्रयाग भी आया क्योंकि शरद बाबू ने यह बताया कि तुम रुद्रप्रयाग में मिलोगी”। देविका ने दिनकर को अपरिचित निगाहों से देखा और कहा…. “मैं देविका नहीं। आपको मैं नहीं जानती”। इतना कह कर वो तेज कदमों से आगे बढ़ गई क्योंकि अपने गुरु को गुरु- दक्षिणा देने का सही समय अब आ गया था।
विजया डालमिया